15 Sep 2011

आनंद अउ परमानंद

                                     दुनिया म हर घड़ी एक नवा जी के जनम होथे। इही ह चरावर जीव जगत के नियम आए। अइसन नइ होतिस त ये दुनिया म कांहिच नइ होतिस। एक महतारी ह अबक तबक चिचीयावत रिहीस असहनिय दरद म। अउ ये दरद म घलो मां बने के सुख के अहसास होवत रिहीस। जीव ह मुं सो आय लेवे त अइसे लागे जानो मानो महतारी ह लइका नइ बियावथे बल्की नरक भोगत हेे। फेर एक पल म ये पिरा ह खुसी म बदलगे जब अपन गरब ले अवतरे लइका ल मां ह एक नजर देखीस। ओ समय महातरी के ये जीवन के आनंद ल कोनो दुसर जीव कलपना घलोक नइ कर सकय आखर म गढ़ना तो दूर के बात ये।
               हांथ के मुंठा म भाग रेखा ल दबाय नान्हे लइका ह महतारी के कोरा मे किलकारी लेवथे। जब ओ मुठा ह छरियाही त काकर भाग म का निकलही तेन ल तो न लइका जाने अउ न महतारी जाने। फेर जनम होहे तेला तो उमर भर दुनिया ल झेले ल परही। सुख म राहय चाहे दुख म,राजा होवे चाहे रंक। सबला जुझना हे जीवन के आनंद बर। आज गली खोर म किंजरत कतको अइसन जीव देखे ल मिलथे जोन जीयत तो हे फेर जीवन म आनंद नइ हे। लोगन किथे घलो की जे दिन संसारी परानी आनंद ल पा लिही वो दिन तो जीव परमानंद के हो जही।
            जीव के आनंद अउ परमानंद के अनुभुति बर कुछ लोगन के जीवन यापन के सजीव चित्रण देखत मै दंग रही गेवं। संझा चार बजे के बेरा म रइपुर रेलवाही म ठाढ़हे रेहेवं। हमर नाटक मंडली के सबो सदस्य एके जघा जुरियाय रेल के अगोरा करत रेहेन। चिरो-बोरो कांव कांव म घलो सब अपन अपन गोठ बात म मगन हे। हमु मन एक कोरी तीन अक झन रेहे होबोन जेमा सात झन नारी परानी घलो रिहीस,ते पाय के हमर मन के हांसी दिल्लगी अलग चलत रिहीस। रेल तीस मिनट देरी म अवइया रिहीस जाना तो हे चाहे कतको बेर आवे। फेर ये बेरा के बिलमर्इ बड़ आनंद देवत रिहीस हांसी ठिठोली ले कटत रिहीस। तभे हमर आगु एक झन अस्सी पच्यासी बरस के डोकरी डब्बा ल हलावत मांगे बर आगे। मेहा बाजू वाला कोती टरकायेवं। बाजू वाला ह अपन बाजू वाला डहर टरकर्इस। हमर मन के गोठ बात चलते हे अउ वो डोकरी ह अइसे तइसे करके पंदरा झन करा किंजर डरिस। एको पइसा नइ पाइस। पंदरा जगा डोकरी ल नाचत देख-देख के हमला का आनंद अइस येला तो हमू नइ जानन। फेर हांसी मजाक ले टेम पास होवत रिहीस।
             ये टेम पास म डोकरी के तरवा के एको ठन लकिर नइ टेड़गइस। उहीच के उही मुं धरे हे। न असकटार्इस, न खिसीयाइस, न मुसकाइस, न कंझाइस पथरा कस जीव ठाड़हे रिहीस। आखिर म एक झन नोनी ह अपन पर्स ले एक के सिक्का निकाल के डोकरी के डब्बा म डारिस। डोकरी के मांथा के रेखा ठक ले टेढ़गा के जीव होय के अहसास करइस। ओकर थोथना के भाव देख के महू ल थोर थोर अहसास होइस की हमन तो सिरीफ आनंद लेवत रेहेन। वहू म एक भिखारन कर। भिख मांगत-मांगत डोकरी ह हमर सही कोन जनी अउ कतका झन ल आनंद देवात रिहीस होहीं वहू म बिना मांगे। फेर आखीर म जब सिक्का ह ओकर डब्बा म गिरथे त वो तो परमानंद ल ता लेथे। काबर की इही सिक्का ह तो आज के आनंद अउ परमानंद आय।


1 comment:

  1. बड़ सुघ्‍घर लागिस जयंत भाई, जय छत्‍तीसगढ़, जय छत्‍तीसगढ़ी.

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