12 Jun 2012

छोटकू के मुड़ म सियानी पागा: ननपन खुवार

बड़हर के लइका मन जेन उमर म स्कूल-किताब सिलेट पट्टी अऊ आनी-बानी के खेल-तमासा म रमे रिथे। गरीबहा के लइका ह अपन पेट बनि म जूझे रिथे। दूनो घर के लइका अपन उमर ले आगू से आगू के जुगत म लगे रिथे बड़हर घर के लइका ह नानपन म ही पढ़ई के जोझा म पर जथे उहे गरीबहा घर के लइका ह नान्हे उमर म परवार पोसे के बोझा ल बोह लेथे। एक उपर पढ़ई जोझा दूसर उपर बनि के बोझा, आखिर पेरावत तो लइकेच के उमर। पढ़ई अउ कमई के एक उमर होथे। ये जिम्मेदारी ओमन ल सगियान अउ चेतलक होय म दिये जाय तब उकरो मन म उमंग रही। ये बात सियान मन ल सोचना चाही।
बड़े-बड़े साहर के बड़हर मन लइका ल घातेच हूसियार बनही किके कोरा के लइका ल दूध छोड़ा के मास्टरिन घर पठोय के सुरू कर देथे। महतारी के मया लइका मास्टरिन के किताब ल पढ़ के जानथे। मया अउ दुलार ल आखर ले जाने अउ सउहे महतारी ले पाय म ओतके फरक हे जतका चंदा-सुरूज म। हमला घर के छानी के उप्पर दिखथे तो फेर हम ओला अमर नइ सकन। किताब म लिखाय गियान आखर लइका ल गियानवान तो बना देथे फेर गुन म कोनो परकार के खंगता रइ जथे। जेकर भुगतना महतारी-बाप बुड़हत काल म भोगथे। ले लइका मन सिरिफ अऊ सिरिफ अपनेच जिनगी सवांरे म लगे रिथे। महतारी बाप बने-बने हावय तब तो सब ठीक हे। थोरको देह ल जियान परिस ताहन मां बाप ल इही लइका मन वृद्धा आश्रम अमरा देथे। सबोच लइका अइसन नइ होवय कतको लइका सरवन कुमार घलो निकलथे, महतारी बाप के सेवा जतन करथे। भगवान करे सबो लइका सरवन कुमार सहिक हो जए अउ वृद्धा आश्रम के नाव भुता जाय। नानकुन बात म बतेक गड़ान निकाले के जरूरत नइ रिहिस फेर का करबे आजकाल के लइका मन के गतर ल देखत कहे ल परथे। पढ़ही लिखही तव लइका के जिनगी सवंरही फेर नान्हे उमर म कनिहा के नवत ले बस्ता के बोझा लदकना घलो बने बात नोहय।
अइसने उमर तो छोट फेर जिम्मेदारी रोठ, जेला ईमानदारी ले निभावत रिथे गरीब घर के लइका। गली के कबाड़ी दुकान होय चाहे सड़क तिर के होटल, हथेरी ले बड़े कप-पलेट अउ बर्तन-भाड़ा मांजत-धोवत नान्हे लइका दिख जथे। कोनो ह कतको बाल मजदूरी रोके बर, बालश्रम कानून बनालय फेर फलित होबे नइ करे। कानहून ले ककरो काम ला छोड़ा के मजदूर अउ मजदूरी करइया ल चेता देले ओ मजदूर के गुजारा कइसे चलही पहिली ये बात म विचार होना चाही। नानकुन बिभो के बड़का ढिड़ोरा पिटना तो सरकार के कामेच हे। लइका बनि के छोड़ाके भलमंशी कहइया मन एक पइत ओकर बनि करे के पाछू का कारन हे येहू ल समझना देखना चाही। पोसे के ओखी म का लइका मन ल धूत्कार के कमवइया मन के दुनियां म कमी नइये, कतको सियाने मन दरूवा-मंदवा रिथे येमन अपन लइका करा काम करवाथे। अइसना निर्लज बाप ल समझाना चाही। नइ माने म अइसन मन ल कानहून के डंडा पडय़। एमन ल यमराज जब चाबूक मारही तब मारही पहिली समाज के सोटा परना चाही। समाज म अइसन कुबाप के कोनो जगा नइये। फेर लइका बिचारा का करय किथे न परोसी बुती सांप नइ परे तइसने बरोबर अपन जिनगी चलाय बर मजूरी करथे अउ अपन जिनगी चलाथे। कतको के महतारी बाप नइ राहय तेनो मन कमाथे अउ खाथे। एमन के पोसइया तो अवतरे नही फेर अइसना लइका मन बर सरकार,समाज अउ पास-परोस वाला मन ल कोनो न कोनो रद्दा निकालेच बर परही। कुछ संगठन अउ संस्था वाला मन संहराए के लइक बुता करत हे, बिन दाई ददा के लइका अउ गरीबी भूखमरी म जियत लइका मन बर बालश्रमिक स्कूल चलाके। कारखाना अउ कंपनी म काम करइया लइका मन ल काम ले उबरे के बाद गियान देके उदिम करत हे। अब के दुनियां म कोनो ह कोनो ल चारा चराए के जिम्मा नइ लेवे अपन पेट बर सबो ल जूझे ल परथे। नानपन ले बनि के घानी म पेरावत लइका मनके भाग सवांरे के परयास म लगे संस्था मन ल देवता साहमत देवय, अऊ बिगाड़ करइया के नास होवय। नान्हे लइका के ननपन ल खुवार करे म बड़ेच मनके हाथ हे। छोट उमर म लइका के पीठ म बस्ता के बोझा बोहाना अउ रोजी मजूरी कराना दोनो म जादा फरक नइये। काचा पघई के पनिया घड़ी भर नइ ठाहरे,कुंभरा के मेहनत संग घईला घलो जात रिथे। अइसने बरोबर लइका के उमर ल जानव। लइका पन म लइका ह लइकेच राहय।

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