1 Oct 2013

मेला के मितानी

मेला म बधे हे मितान ते पाय के दूनो मितान बर मेला हर मितानी के चिन्हारी होगे हे। जइसे-जइसे मांघ लक_ाथे, पुन्नी तिरयाथे मितान संग भेट करे के खुशी बाड़हत जाथे। कोनो ह देव धामी के दरस करे बर जाथे, कोनो ह हाट बजार करे के मजा ले बर जाथे अउ कोनो-कोनो मन ह तो भीड़-भड़क्का के धक्का लेयेच बर जाथे। फेर सोहन अउ मोहन मन तो एक दूसर ले भेट करेच बर जाथे। सोहन अउ मोहन ह नाननान रिहिसे तब अपन-अपन दाई-ददा एक पइत संग मेला देखे बर गे रिहसे। उहें मेला म दूनों झन ल ओकर दाई-ददा मन मितान बधवाय रिहिसे। ऊंकर दूनों के परवार ह मेलाच म पहिली खेप संघरे रिहिस, आन-आन राज के रहवइया अऊ आन राज केे मेला। उदूप ले संघरिस, अउ अइसन नता गढ़हइस कि एके ठन चुल्हा म दूनों के जेवन चूरे। संघरे नहावय, संघरे देव धामी के दरस करे बर मंदिर देवाला किंजरे। मोहन अउ सोहन दूनों झीन के गाड़ी ह नदिया तिर एके जगा ढिलाय रिहिसे ते पाय के एक ठीन घर बरोबर नता-रिस्ता होगे। बने-बने मन मिले रिहिस के ओमन ल आन राज के मेला देखे बर आय हन किके गमे नी होत रिहिस। अइसे लागे जानो-मानो गांवे के मड़ई मेला म हावन। दू दिन के रहइया चार दिन रिगे। मेला तो चार दिन के रेला आय, बार नाहकिस ताहन उसलो-उसलो होगे। इकरो मन के समान के जोरा-जंगारी होय लगगे। संग छुटे के दुख होइस। कोन जनी अब के गे अउ कब भेंट होही, होही कि नहीं। तिर तखार के होतेन ते आवा जाही मेल-मुलाकात करतेन फेर दूर देस के डहरचला। दूनों झीन मन इही गुनते रिहिस के ठउका मित-मितान बधे के बिचार अइस। सियान मन ले जादा दूनो के लइका मन मनके संग नइ छूटत रिहिस, लइकाच मन ल मितान बधा देथन किके अउ सोहन-मोहन ल मितान बधवा दिस। मेला म रद्दा रेगत अभरे सही अभरिस। डहरचलती मनके मन ह अइसे मिंझरिस के मितानी नता होगे। अब तो सोहन अउ मोहन जवान होगे हाबे अपन-अपन घर के सियान होगे हे तभो ले एको साल मेला जवई नइ अतरिस। साल के साल जाथे, दूनों मितान मिलथे। घर दुवार अउ मया पिरित के गोठ होथे हाट बजार करथे अउ घर लहुट आथे।
ऊंकर मन के मितानी के किस्सा ह जतके मंदरस सही मीठ हे वोतके लीम सहिक करू घलोक हे। सोहन के ददा ह जे खा के अपन गांव ल गाड़ी फांदिस। दुरिहा के कारोबार किके ओकर दाई ह दिने मान सबो तियारी ल कर के राखे रिहिस। सबो कोनो जेवन पानी करिस अउ निकलिस। रात भर गाड़ी चलिस। सुकवा के उति होइस अउ गाड़ी के मेला पहुंचती होइस। अइसने मोहन के ददा मन घलोक जे खा के लिकले रिहिस ते पाय के उहू मन सुकवा उवत मेला म आगे रिहिसे। वोतका बेरा जादा गाड़ी-घोड़ा नइ पहुंचे रिहिस ते पाय के मेला म नंदिया के लक्ठाच म ओकर गाड़ी पहुंच गे रिहिस। नंदिया तिर गाड़ी ल ढिलिस अउ बइला मन ल पानी पियाय बर लेगिस। बेर नइ उवे रिहिस ते पाय के सोहन के निंद नइ उमचे रिहिस। गाड़ी म लगे टट्टा के छांव म लइका बने सुते हे किके वोकर दाई ददा मन नंदिया नहाय बर चल दिन। बेर उवे के आगू बने नहा खोर के अइस लइका मन ल उठाबो अउ मंदिर देवाला दरस करे बर जाबो किके। गाड़ी मेर आगे लइका ल उठाय बर टट्टा म ढकाय कपड़ा ल उघारिस। भितरी म लइका नइ दिखिस। ओकर दाई हांक पारिस- अरे सोहन कहां हस बेटा। ओ कोति मोहन के दाई तको चिल्लाय लगे मोहन-मोहन किके। दूनो अपन-अपन गाड़ी ल उतरके कोन जनी कते कोति रेंगे देहे ते कोनो कोति ले आरो तको नइ मिलत हे। तिर तखार के अवइया-जवइया अउ आस परोस के गड़हा मन ल पुछिस। कोनोच नइ देखे पाइस के लइका मन कोन कोति अउ कतका बेर रेंग गे ते। दूनो झीन के डेरा म रोवा-राही परगे। कोनो काल के लइका मन के साध म मेला जाबो करिस ते साधो भुतागे। पूरा मेला भर छान मारिस। दूनो परवार के मन संघरे खोजइ बुता करे। आन राज अनचिन्हार अउ आन सगा के रिहिस फेर दूनो के उपर एके दुख परे रिहिस। इही पा के दूनो ह एक दूसर के सगा नता-रिस्ता बरोबर जिकर करके खोजई करे। मंदिर देवाला हांट बजार सबो कोति ल देख डरिस फेर कोनो कोति ले सोहन-मोहन मिलिस। कोन कोति गे हाबे तेकर आरो तको नइ मिलत रिहिसे। जेने मंदिर म जवे तेने म मनउती के मांगय। बदना बदय। का साधु का भटरी सबो करा बिचरवा डरे रिहिस। सबोच ह काहय आ जही तोर लइका ह। उंकर मन के मेला तो रोवा राही म कटगे। दिन बुड़ताहा फेर एक रपेटा खोजे बर निकलिस। हतास निरास होके मोहन सोहन के दाई-ददा मन अपन डेरा मेर लुहटिस। डेरा म मोहन अउ सोहन दूनो झन कांदा कुंसियार अउ ओखरा झड़कत बइठे राहय। दूनो लइका गाड़ी के छांव म गोड़ हाथ ल लमाये निसंसो बइठे। लइका ल देख ऊंकर दाई-ददा के जी म जी आईस। अपन-अपन लइका ल छाती म ओधा के रोइस। दूनो झन संखरे रिहिस ते पाय के अपन गाड़ी खोजत-खोजत उहू मन आगे। उसनिंदा म उठके दूनो लइका मन घर सहिक सूर-सूर म रेंग गे रिहिस। फेर भगवान के किरपा ले दूनो झन फेर बने-बने लहुट के आगे। ऊंकर दाई-ददा मन देव धामी म बधे बदना ल तूरते पूरा करिस। एकईस-एकईस ठन नरियर महादेव के मंदिर म चघाईस। सबो मंदिर देवाला म जाके अगरबत्ती अउ फूल-पान चढ़ाके देवी-देवता के जय जय गइस। अइसन रकम ले सोहन अउ मोहन मन संघरे रिहिसे। असल संगी उही आय जेन हा बखत म काम आवय। अउ ये मन तो अनबुद्धि रिहिसे तभो ले संग ल नइ छोड़े रिहिसे। तब ल देख ले अउ अब ल। वोमन साल के मेला म मिलथे। अउ मिले-बिछड़े किस्सा ला रई-रई के सोरियाथे।
जयंत साहू, डूण्डा, रायपुर

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