10 Mar 2016

2022 तक हर आदमी उद्यमी !

प्रधानमंत्री जी के छत्तीसगढ़ दौरा ह उम्मीद ले कम खुशी देने वाला रिहिसे। ऊंकर ले जेन बात के आस लगाय रेहेन वो पूरा जरूर होइसे फेर छत्तीसगढ़ के परिदृश्य म कुछ हद तक कोरा घलोक लागिस। जइसे के सबो जानथे के ओमन अपन हर भाषण म ये बात ल किथे-'युवा मन अइसन काम करव, जेमा कोनो मजदूर झिन राहय सबो मालिक बनव। हमर सरकार के कौशल विकास ले हुनरमंद होके नौकरी करने वाला नहीं नौकरी देने वाला बनव।Ó बात तो वाजिब हावय, कब तक पर के नौकरी करहू। फेर छत्तीसगढ़ के मामला म कुछ हद तक ये बने बात नोहय काबर के इहां तो सबोच किसान हाबे। आन राज सहिक कोनो कोइला कारखाना, कोनो फटाका कारखाना, कोनो लोहा कारखाना उक म मजदूरी तो करबे नइ करय कुछेक जिला, अउ नौकरीहा परवार ल छोड़ के। 
तइहा समय ल सुरता करे जाए तब इहां मजदूर अउ मालिक के बीच शोषण वाला कोनो मामला नइ आवत रिहिसे। गांव के बड़का किसान घर छोटे किसान मन बनि करय। मंझोलन किसान मन सापर म काम ल उरकावय। सबो के काम एके बरोबर। तब कहां के मजदूर अउ मालिक के शोषण। हां कमजोर किसान अउ रोठ किसान के बीच फरक जरूर रिहिसे। फेर ऊंकरो बीच म कारखाना के मालिक अउ नौकर कस बेवहार नइ होवत रिहिसे। खेत म काम के बखत दाऊ अउ साऊंधिया। आन बखत म एके खटिया म चोंगी-माखुर गठय। अऊ संग म जेकर घर खेत नइ रिहिसे तिहू मन आन घर बनि कमाके अपन गुजारा कर लेवय। मजदूर अउ मालिक के खेल तो तब शुरू होइसे जब परदेशिया मन छत्तीसगढ़ आके रोजगार जमाइस अउ इहां के खेती करइया किसान मनके जमीन ल बिसाके कारखाना लगाईस। उंकरे खेत ल बिसाके उहीच मनला बनिहार बना दिस। अब हालत अइसे होगे हावय के अपने खेत म खेत मालिक बनि करत हावय। सरकार के कौशल विकास के सपना म छत्तीसगढ़ के युवा मन अपन-अपन खेती-खार ल बेंच के उद्यम लगाके व्यापारी मन जही तव कोन छत्तीसगढ़ राज ल धान के कटोरा कइही।
अइसने आकब होथे केंद्र के चश्मा म छत्तीसगढ़ के नक्शा कुछ आन दिखत हावय। अऊ उही चश्मा ल राज सरकार ह पहिने के कोशिश करत हावय। मोदी जी के उद्बोधन म घेरीबेरी 2022 के गोठ निकलथे। किथे के देश म सबले जादा युवा मनके आबादी हावय। सब युवा मन कौशल विकास ले उद्यमी बनव। रोजगार मांगव झिन रोजगार पैदा करव। सिरतोन म जेन हिसाब ले अबही के युवा मन पढ़ई करे के बाद नौकरी के तलाश म दर-दर भटकथे उकर बर तो बनेच हे ये योजना। फेर देश के सबले जादा चाऊर, दार अउ गहंू उत्पादक राज के युवा मन उद्यमी हो जही तब का स्थिति होही अन्नपूर्णा छत्तीसगढ़ के? जिहां खेती किसानी म लोगन रमे हे उहां कारखाना अउ उद्योग के बात होवत हावय। मेक इन इंडिया, मेक इन छत्तीसगढ़ के जलसा होवत हावय। अऊ जिहा खेती के लायक भुइंया नइये उहां जैविक खेती के बात होथे। कभू-कभू तो अइसे लागथे के इहां के स्क्रिप्ट उहां अउ उहां स्क्रिप्ट इहां पढ़ागे। दार-चाऊर अउ तेल गहूं भर ले अब जिनगी के गुजारा नइ चलय। देश के अर्थव्यवस्था ल चलाये बर उद्योग घातेच जरूरी हावय, फेर छत्तीसगढ़ के उपजाऊ माटी म तो कारखाना नइ खड़ा होना चाही। परंपरागत व्यवसाय म ही नवा रोजगार के अवसर खोजे जाना चाही तब शायद हम 2022 तक पहुंच पाबो। * जयंत साहू*
JAYANT SAHU
DUNDA, RAIPUR CG
9826753304,

5 Mar 2016

कमाथन तेकर ले आगर तो गवांथन

देश म महंगाई ह दिनो-दिन सुरसा सही मुंह फारत हावय, आदमी के आमदनी तको उही मुताबिक बाढ़त हावय। जेन सामान चार आना म आवत रिहिसे वो अब चार कोरी म आथे। बिसइया तको तो पांच रूपिया रोजी नही तीन सौ पावत हावय। काम मिलत हावय अउ बरोबर रोजी पावत हावय तेकर बर तो अब के समे म तको परवार चलाना साहज हावय फेर जेकर कना काम नइये, मन माफिक मजूरी नइ मिलत हावय ऊंकर हालत ठीक नइये। लेदे के अपन गुजारा करत हावय। छत्तीसगढ़ म तो स्थानीय मजदूर के हालत अउ जादा खराब हाबे। आदमी के मुताबिक काम नइये, काम मिलथे भी तव मजदूरी कम देथे। मनरेंगा अऊ आन विकास के काम सिरिफ गांव कोति चलत हावय तव शहर के गरीब का करय? शहर मन म तको गरीबहा लोगन मन बसे हावय। इहां काम के कमी नइये फेर स्थानीय मजदूर ल मिलय तभे तो। इहां तो बाहिर के मजदूर मन आके कम दाम म काम करे बर तियार हो जथे। हाथ अउ गोड़ धरके आए रिथे, परवार कहू अउ कमावत-खावत हावय। ओमन अपन पेट पोस बर स्थानीय मजूदर मनके पेट मार देथे। उपर ले सरकार के संपत्ति कर के बढ़ोतरी, दूबर बर दू असाढ़ होगे। सरकार ह पहिली तो बढ़ाय के गुनान करिस। अऊ जब प्रदेश भर म विरोध होइस तव कलेक्टर दर म उतरगे। येकर बड़े मन ले जादा छोटे अउ मंझोलन परिवार के बोझा बाढ़ही काबर के बड़े मन तो आगर ले आगर रूपिया धरे रिथे। फेर कमजोरहा मन कना तो सिरिफ खरचा के पुरति करारी रूपिया रिथे। अहू रूपिया हा सिरिफ घर खरचा खातिर रइथे। चाऊर-दार, दवई-दारू, तिहरहा खरचा, बर-बिहाव सही सब म मारे मजदूर मनखे मन घर म जादा रकम सकेल के रखे नइ सकय। हमर छत्तीसगढ़ ल भले हम परब संस्कृति के गढ़ कहिके छाती तानथन फेर खरचा के हिसाब ले देखे जाए तब इही सब तीज तिहार के मारे रूपिया के बचत नइ हो सकय। जतके के ततके होथे कतको कमा ले। महीना भर कुद-कुद के कमाबे ताहन महीना म कोनो तिहार परगे, सिरागे रूपिया। तिहार ल नइ मनाबो तेनो नइ बनय, अऊ थोक बहुत म तिहार होवय तको नहीं। जरत ले महंगाई उपर म कोरी खैरखा परवार। नान-नान काम म बेड़ा भर के पूछ परख कर खवा-पिया। नइ खवाबे तव आनी बानी के गारी खाबे। गरीब हाबन तभो ले आत्मसम्मान, स्वाभिमान सब जाग जथे। भले करजा होही ते होही फेर सुकालू ले कम खरचा नइ करय दूकालू। रूपिया नइये कहू ले करजा कर फेर सुकालू कस तहू होरी, देवारी नइ मनाबे तव समाज का कही! समाज तको अब आदमी ल उबारत नइये बोरत हावय। पारिवारिक अउ सामाजिक बने के चक्कर म हम आर्थिक रूप ले कतका कंगाल होवथाबन येला समाज के लोगन मन देखते होही। अबही बर-बिहाव के आरो मिलत हावय, दनादन बजार के खरीदारी चलत हावय। सोनार, हलवई, कोष्टा लाइन म आनी-बानी जिनिस के देखनी हावय। नेंग के जोरन के मइके के ससुरार के लराझरा काकी-कका, ममा-मामी अतका सकला जथे के लेवत-देवत ले हक खा जबे। घर म कही नइये तभो ले काखरो ले कम नइयन। बढ़हर मनके देखा-सीखी आए, के खरचा करे के खातिर कमाथे मजदूर मन, उही जानय। सरी जमा पूंजी गवांथे जाथे तबसुरता आथे के कमायेन तेकर ले आगर तो गवाये हन।
 * जयंत साहू*
jayantsahu9@gmail.com
9826753304
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