18 Aug 2016

अस्पताल म गोड़ मड़ाय के ठउर नइये, दवई दुकान कचाकच


सम्मत के जर आए धन खान-पान के असर ते जेन अस्पताल म जाबे तिहेच मनमाड़े भीड़ पेले रिथे। अस्पताल ल ठउर-ठउर म खोले डॉक्टर मन गरीब ल देखते ही ठोमहा-ठोमहा दवई ल देके खून जांच, पेशाब जांच, अऊ ऐ जांच ओ जांच के पर्ची थमहा देथे। अस्पताल तो अब अइसे होगे हाबे जानो-मानो चाय-पान के दुकान, हरेक गली म एक ठन मिलही। आन देश के मन किथे के इहां के लोगन मन गरीबी अउ बीमारी म ज्यादा मरथे। ए सोचे के बात आए के अतेक बड़े-बड़े अस्पताल अउ डाक्टर होय के बावजूद बीमारी म लोगन मरत हावय। अरबों-खरबों रूपिया गवां के गरीब मन खातिर सरकार ह कल्याणकारी योजना चलावत हावय, तभो भूख ले कइसे मर जथे अऊ जेन गरीब भूख ले बांचगे वो बपरा ह नानकून बीमारी म मर जथे। जब आदमी के काल आथे तव ओला मउत ले कोनो नइ बचा सकय। फेर अब जबकि चिकित्सा विज्ञान ह अपनेच मुंह ले आगर के घाघर गोठियावथाबे के हमर कना हरेक बीमारी के दवई हाबे त ये बात कोति घलोक सोचे पर परथे के का ओ दवई के असर अमीर अउ गरीब उपर आने-आने होथे। कतकोन शहर म तो समे म उपचार अउ दवई-बुटी के बने बेवस्था होय के बाद घलोक बीमारी अउ बीमरहा मनके संख्या दिनों-दिन बाड़त काबर हावय। पहिली घलोक बीमारी होवत रिहिसे, उपचार तको होवय। समे के मुताबिक धीरे-धीरे उपचार के तरीका ह बदलत हावय। अब जेन झिन डाक्टर ते ठिन दवाई, उहू म जीव बांच जही येकर कोनो गारेंटी नइये। आदमी मरे चाहे बांचे डाक्टर के पूरा फीस देना जरूरी हावय। मरीज मरगे त ओकर घरवाले मन अस्पताल के पूरा खर्चा देही तभे लाश ल उठाही, अइसन हवय अब के उपचार व्यावस्था अउ डॉक्टर मनके नीति। 
सरकार किथे इलाज के आभाव म काकरो मउत नइ होना चाही, सबला बने उपचार मिलय। फेर इहां तो बने इलाज सिरिफ बड़हर बर हावय। जेकर कना रूपिया पइसा हावय ओमन बड़े से बड़े बीमारी ले उबर जथे अऊ जेकर कना इलाज कराय बर पइसा नइये ओमन सर्दी-खासी म तको ढलंग जथे। माने तोर करा पइसा हवय तव सब इलाज होही वरना भगवाने जाने तोर का होही? आयुर्वेद, योग, यूनानी, प्राकृतिक चिकित्सा, सिद्धा, होम्योपैथी, स्थानीय वनौषधि, जड़ी-बूटी अउ योग विज्ञान ले आगु लोगन के उपचार होवय। अब सबले ज्यादा ऐलोपैथी के बोलबाला हावय। आदमी के दिनचर्या म शामिल होगे हावय दवई ह। ए गोली मनके पहुंच दवई दुकान ले गांव के किराना दुकान तक होगे हावय। दुनिया म अइसन कोनो आदमी नइ बांचे होही जेन बिन दवई खाये जियत होही। लइका ह महतारी के गरभ म रिथे तभेच ले ओला विटामिन, प्रोटिन अउ कैल्शियम के टेबलेट के आदत हो जाये रिथे, तब बाहिर आये के बाद कइसे ओ लइका ह बिगर गोली दवई के भला-चंगा रइही। बात-बात म डॉक्टर अउ दवई के देखे तो अइसे लागे लागथे मानो दवई बनइया अउ डॉक्टर मन मिलके हर आदमी ल गोली-दवई के आदी बनावत हावय। दुबर-पातर ल मोटाय के दवई, मोट-डाट ल पतराये के। बाल झड़ाय के, जगाये के। बीमारी के हउ्वा ले आज देश म गोली-दवई के बाजार अतेक फूलत-फलत हावय के जेन ल कुछूच बीमारी नइये तेनो हा मोला कुछू बीमारी झिन होतिस भगवान किके बने-बने रेहे के दवई ल खावत हाबे।  
 ( जयंत साहू )
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