13 Jun 2018

निबंध - छत्तीसगढ़ में कृषि संस्कृति


छत्तीसगढ़ ह एक कृषि प्रधान अंचल आए, इहां के एक तिहाई लोगन मन सिरिफ खेती म निर्भर हावय। खेती ह तइहा ले अब तक छत्तीसगढ़ के आर्थिक विकास के प्रमुख साधन रेहे हावय। कृषि संस्कृति के विकास इहां तभे ले होय हाबे जब लोगन खाये के जिनिस ल गड्डा म गड़िया के बोवय। अउ फेर धीरे-धीरे ओमन देखिन के बीजा ले पौधा बनथे तव उंकर मति ह उही कोति लामिस, अपन निस्तार खातिर खाद्यान्न उपजाए के उदीम उंखर भीतर पनपे लागिस। आदिम संस्कृति ले अब समय के संग धीरे-धीरे खेती ह व्यवसाय के रूप लेवत आज प्रदेश के आर्थिक विकास म मजबूती देवत खड़े हावय। अब तो ये बात ल छत्तीसगढ़ ले सात समुंदर पार के मानखे मन तको मानथे के वाकई 'छत्तीसगढ़ धान के कटोरा' आए। इहां सबले ज्यादा धान के पैदावार होय के साथ सबले ज्यादा धान के किस्म तको इंहचे देखे बर मिलथे।

कृषि भूमि अउ फसल- छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग म प्रमुख रूप ले धान, गहू, चना, मटर, सरसो, अरहर, सोयाबीन अउ तिवरा जइसन फसल के खेती होथे अउ पहाड़ी, उत्तरी पठार अंचल म लोगन मन प्राकृतिक रूप ले उपजे पेड़ पौधा उपर निरभर रिथे। जइसन इहां के मैदानी भाग म खेती के लायक समतल जमीन हावय वइसन पठार अउ पहाड़ी अंचल म कम हावय, जेकर कना समतल जमीन नइये ओमन फल अउ औषधी कंदमूल के खेती करके अपन जीवका चलाथे। कुछ अंचल म प्रशासन के प्रोत्साहन ले गांव के युवा मन उन्नत खेती ल अपनावत हावय अउ कम रकबा म बागवानी खेती करत हावय।धीरे-धीरे उहू कोति कृषि के विस्तार होवत हाबे अउ लोगन मन व्यवसायिक रूप ले, खेती ल अपन जीवकोपार्जन के जरिया बनावत, जांगर टोर मेहनत करत हाबे। 
सिचाई प्रबंधन- छत्तीसगढ़ अंचल में आज भी सर्वाधिक किसान मन भगवान भरोसा खेती करथे, माने उंकर कना पानी के साधन नइये, बरसात होथे तव उंकर खेत म अन्न उपजथे। इही पाके साल म एकेच फसल लेथे, बने पाग रेहे म कभू-कभू ओनहारी आगे तव दूसर फसल के जोंगथे। ये काहन के छत्तीसगढ़ म पारंपरिक रूप ले जेन किसान मन खेती करत हाबे ओमन खरीफ के मौसम म धान के खेती करथे अउ उहीच नमी म गहूं या फेर दलहन, तिलहन के खेती करथे जेन अढ़ाई ले दू महीना के होथे। पारंपरिक ल छोड़के वर्तमान म देखे जाए तव कुछ अंचल म बांध बनाके नहर के मांध्यम ले खेत म पानी पहुंचाये जात हावय त कुछ किसान जेन मन आर्थिक रूप ले संपन्न हावय ओमन खेत म कुंआ, तरिया, बोर तको खाने रिथे खेत पानी पलोय बर फेर यहू तो बरसा उपर ही निर्भर रहिथे। बरसात खतम होये के बाद किसान मन बाकी समय ल खेत के तियारी म लगाथे। छै महीना के खेती बर छै महीना के तियारी ह किसान मनके पैदावार म उरवती के रूप दिखथे।

खेती के नवा दिन- छत्तीसगढ़ परब तिहार वाले प्रदेश आए इही सेती, इहां के सबोच बिसेस काम के पीछू कोनो न कोनो पारंपरिक, धार्मिक अउ अध्यात्मिक विधान के प्रचलन देखे बर मिलथे। जइसे इहां के किसान मनके नवा दिन सुरू होथे अक्ती ले। अक्ती के दिन जोन पुतरी-पुतरा के बिहाव होथे तेन तो अलगे हावय, येकर अलावा गांव म जेन नाउ, धोबी, पाहटिया, बइगा अउ सौंजिया लगे रिथे तेन मन अपन मालिक ठाकुर घर ले मेहनताना पाथे। अक्ती के दिन ही कतकोन मन मालिक घर के काम ल छोड़थे तव कतको मन आन सौंजिया तको लगाथे। इहां मेहनत के सम्मान होते तेन पाके नौकर जइसन शब्द के उपयोग नइ होवय मालिक ठाकुर मन सौंजिया या फेर कमइया कहिके संबोधित करथे अउ जब उकर चुकारा के दिन आथे तव तय मुताबिक अनाज दिये जाथे। छत्तीसगढ़ म सौंजिया मनला रूपिया म नहीं बल्कि धान म लगाये जाथे। अइसने नाउ, धोबी, राउत, बइगा उक मनके तको सालाना तय रिथे, धान ह, जोन पइली काठा, ओ मुताबिक गांव के सबो घर ले देना रिथे। अक्ती के दिन ही गांव के किसान ठाकुर देवता म धान के बीजा ल डूमर पाना के दोना म चड़ाथे। जेला गांव के बइगा ह नेंगहा खेत म बो के जोतई करथे, बांचे धान ल किसान मन ल फेर दोना दोना बांट देथे। इही बीज ल किसान मन प्रमाणित बिजहा मानथे अउ जमो के राखे रिथे।
खेती के तइयारी- किसान मन कभू ठलहा नइ राहय। असाढ़ अउ अवइया बरसा के अगोरा करत किसान मन जेठ अउ बइसाख के महीना म खेत के जेन भी काम बांचे रिथे तेन ल उरकाथे जइसे के कोनो खेत ल चतवार के बरोबर करना हे, मेड़ सिरजाना हावय। बिड़ा बांधे खातिर पैरा डोरी बरई, खचका डबरा पाटना, कांटा बिनना, खातू पालना, नांगर खापना आदि।
घुरूवा खातु के महत्ता- छत्तीसगढ़ म पारंपरिक रूप ले जोन खेती करथे किसान मन ओ बहुतेच लाभकारी हावय, जइसे पारंपरिक खाद के उपयोग ह फसल के पैदावार तो बड़ाबे करथे येकर अलावा खेत के उर्वरा क्षमता ल तको बड़ाथे। येकर से जोन अन्न उपजथे वोहा गजब पौष्टिक होथे अउ डाक्टर मन तको तो रासायनिक के बजाय जैविक खाद ले उपजे सब्जी खाए के सलाह देथे। पारंपारिक खाद बनथे कइसे अउ काबर गांव म किसान मन घरोघर तइयार करथे येला देखबे तो अतका साहज हावय के बिगर कोनो विशेष लागत के घर म ये तइयार होथे। किसान मन के घर माल मवेशी होबे करथे, धान के पैरा होथे, चुल्हा के राख निकलथे। इही सब ल फेके खातिर एक ठिन गड्डा खाने रिथे जेन ल घुरूवा किथे। घुरूवा म कोठा के कचरा, जेन म पैरा के अलावा मवेशी मनके मल-मूत्र तको रिथे। घर म चुल्हा के राख निकलथे तेनो ल घर के नारी परानी या सौंजिया मन ह गांव गली म नइ फेके, ओला सकेल के घुरूवा म डारथे। घुरूवा भरे के बाद ओमा पानी डारके माटी म तोप देथे, जेठ-बइसाख के आवत तक बर। जइसे ही खातू पाले के दिन आथे किसान मन गाड़ा बइला म जोर के खेत म बगरा आथे। गांव म स्वच्छता के ये घुरूवा ह जबर उदाहरण आए कि वो समे म तको हमर छत्तीसगढ़ म गांव के किसान मन कचरा फेके बर एक गड्डा के उपयोग करत रिहिन हाबे, आजो करथे। आधुनिकता के दौर म कचरा के निस्पादन अउ ओकर सार्थक उपयोग घुरूवा खाद के रूप म करना ये छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति के देन आए।

खेती म अधिया, रेगहा अउ सापर- छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति म आपसी भाई चारा तको गजब देखे बर मिलथे। जइसे कोनो किसान ह सवांगे अपन खेती ल नइ कमा सकत हावय तव ओहा आन किसान ल अधिया या फेर रेगहा म दे देथे। अधिया माने ओ खेत म जतेक भी पैदावार होही, दूनो के आधी-आधी अउ रेगहा माने किसान ह आगू ले आठ बोरा दस बोरा अइसे चक अनुसार करार करे रही ओतका देना परही। अउ जेन किसान मन आपस म जुरमिल के काम ल उरकाथे माने दू-तीन किसान मिलगे सझा रूप ले खेती करथे ओला सापर कथे। सापर म एक दूसर के काम उरकाना रथे बिगर कोनो मेहनताना के।
बनिहार- गांव म तो सिरिफ किसानी बुता होथे तव जेखर घर खेती नइये तेन का करत होही यहू बात मन म आथे। तव खेती ह अइसन बुता आये के एकेच झिन के बुती नइ सिरजय, बनिहार भुतिहार के जरूरत परबे करथे। जेकर घर खेती नइये तेन मन आन घर बनि कमाय बर जाथे। गांव म वइसे भी जात समाज के अनुसार काम सबो बर सपुरन रिथे। जेन मन अपन पुरखौती पारंपरिक बुता ल नइ करे ओमन खेती किसानी कमाथे। 
दिगर समाज के सहयोग- किसानी के अलावा गांव म पारंपरिक पुरखौती बुता करइया मन जइसे के लोहार ह किसान बर नांगर के लोहा, गाड़ा के पट्टा, रापा, कुदारी, हसिंया बनाथे तव बढ़ई ह नांगर, जूड़़ा, चक्का के संगे-संग गाड़ा बनाये के काम ल करथे। कुम्हरा मन माटी के जिनिस बनाथे जइसे बर्तन भड़वा जेमा साग, भात रांधे के अलावा दूध, दही, मही धरे के मैइरसा अउ पानी बर करसा उक बनाके किसान घर अमराथे। अइसने गांव म लगे नाउ मन तको किसान मनके सावर बनाये खातिर खेत म बियारी के बेरा जाथे। नांगर जोतत बखत किसान के गोड़ म कांटा ठेसा के टूट जथे तेने ह हेरवाय बर नाउ मन कना जाथे।

पारंपरिक खेती म वैज्ञानिकता- छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति म गजब वैज्ञानिक आधार घलोक देखे बर मिलथे जेकर कृषि वैज्ञानिक मन सवांगे बढ़ई करत नइ थकय। बरसात के पहिली माने जब पहिली खरीफ के नमी रइथे तभेच एक पइत जोतई करके छोड़ देथे। माने अकरस जोतर्इ् करथे इही ल वैज्ञानिक मन प्री मानसून के प्राथमिक जोताई किथे। अइसन करे ले खेत के जोन कीरा-मकोरा अउ दूबी बन रिथे तेन म उफला के उपर आ जथे अउ बइसाख के घाम म भूंजा के मर जथे। छत्तीसगढ़ म किसान मन नांगर ले खेत के जोताई करथे तेन पाके माटी ह बने भरभरा जाए रिथे। कन्हार ले जदा मटासी ल जोताई के जरूरत परथे। कन्हार माटी ह कम पानी म जोतत बन जथे तेन पाके खुर्रा जोतई बने होथे काबर के जदा पानी म भुइंया लटलटा जथे।
कोंटा कोड़ना- खेती के दिन म लइका मन के मुंह ले अक्सर सुने बर मिलथे कि कोंटा कोड़े बर जानथन। खेत के जोताई नांगर म होय रिथे, नांगर ह गोलाकार रेंगथे तेन पाके खेत के कोंटा ह छु जाये रिथे। इहीं छूटे कोंटा म धान छितके कुदारी म कोड़ के बोए जाथे। 
मुंही- खेत के मेड़ म कोनो अइसन जगह जिहा ले आन खेत म पानी उतर सके ओ ठउर ल निकासी खातिर छोड़े रिथे। मेड़ के फुटे इही पानी आए जाए के ठउर ल मुंही कथे। मुंही ल बोवई के बखत बांध के राखथे अउ जब पानी जादा हो जथे तव फोर के बाहिर निकाले जाथे।

निंदई अउ बियासी- बोवई के बाद निंदई कोड़ई के दिन आथे। काबर के हमर इहां बोता पद्धति ले जादा खेती होथे माने बरसात म पानी के गिरे ले खेत ल एक पइत जोत के धान ल छिड़क के फेर नांगर म बो देथे। इही म रोपा पद्धति तको होथे जेन म एक ठी खेत म धान के नर्सरी तइयार करके 20 दिन बाद ओला खेत म लगाये जाथे। रोपा लगाये के पहिली खेत म कोपर तको चलाये जाथे जेकर ले खेत म पहिली ले उपजे दूबी बन मन माटी म दब जथे अउ खेत ह तको बरोबर दिखथे। रोपा म अब कतार बोनी तको सुरू होगे हावय अउ येमा बियासी करे के तको जरूरत नइ परय काबर के ओला नर्सरी ले उखान के खेत म लगाये रिथे। जेन किसान बोता पद्धति ले धान बोथे ओमन ल बियासी करे के जरूरत परथे। बियासी मने धान बोवाय खेत म नांगर चलाना। बियासी म छोटे नास के नागर के उपयोग करे जाथे जेकर ले धान के जर मन टूटे नहीं, बियासी बर पानी घातेच जरूरी रिथे।
खुमरी अउ मोरा- पानी बादर ले बांचे बर खेत कइमया मन कमरा खुमरी अउ मोरा के उपयोग करथे। खुमरी ह बांस के बने होथे जेकर उपर म प्लास्टिक झिल्ली छवाय रिथे। किसान मन के मुड़ बुलकउ डोरी फंसे रिथे जेकर से आसानी ले किसान के मुड़ म माड़े रिथे अउ काम तको चलत रिथे। अइसने खेत निंदइया बनिहारिन मन मोरा ओड़हे रिथे। खेती के दिन म उपर चक म नांगर के पड़की थामहे नंगरिहा अउ खाल्हे चक ले बनिहारिन के ददरिया के सवाल जवाब के ओड़र ह कड़कत बिजली म जीवरा नइ डराय, ये संस्कृति आए छत्तीसगढ़ के।
कृषि औजार के पूजा- इहां के कृषि संस्कृति म कृषि औजार के रखरखाव अउ जतन ह एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप म होथे जेन ल हरेली के रूप म जानथ। हरेली ह किसान मन बर सबले प्रमुख अउ बड़का तिहार आए। ये दिन कृषि औजार जइसे नागर, जूड़ा, रापा, कुदारी आदि मनके साफ सफाई करे जाथे, उंकर पूजा होथे। पिसान के हांथा देके बंदन के तिलक लगाथे, चीला चघाथे। जेन नांगर मन के काम उरक जाथे तेन ल परवा म जतन के राख देथे। इही दिन कृषि काम के अलाव आन मावेशी मन ल तको रोग राई ले बचाये खातिर गंवखरा दवई खवाये जाथे। अइसने पोरा म नंदिया बइला के पूजा ह मेहनत कस किसान ल धर्म ले जोरे राखे के संगे संग अपन खेती के संगवारी, माने बइला भइसा के जतन करे के तको सीख देथे।
रखवार- गांव म खेती ल देखबे तव सबेच के खेत ह खुल्ला रिथे फेर काकरो खेत म मावेशी मन खुरखुंद नइ मतावे येकर कारण ये रिथे के गांव म गाय चरवाहा लगे रिथे जेन ह गांव भर के गाय गरवा ल सकेल के कृषि भूमि ले दुरिहा चरावत रिथे। कतकोन गांव के किसान मन रखवार लगाये रिथे जेन ह खार म किंजरत रिथे अउ काकरो गाय ह खेत म चरत मिल जथे तव घर गोसइया ल हियाव करथे के अपन गरवा ल बांध के राखय। घेरी-बेरी के पकड़ाये ले काठा पइली डांढ तको बांधे रिथे। इही पाके खेती के दिन म गरवा मन ल ढिल्ला नइ छोड़य।
भंदई अउ अकतरिया- खेत बुता करइया मन खार म हरर्स भरर्स रेंगत रइथे बेरा कुबेरा। इही पाके ओमन बर गांव के मेहर ह पनही बनाथे जेन ह अतेक मजबूत रिथे के कांटा खूंटी कांच अउ लोहा ले तको फरक नइ परय। ये पनही मन ह चमड़ा ले बने रिथे, पुरूष मनके ल भंदई अउ माई लोगिन मनके ल अकतरिया किथे। 
नाहना- गांव के मेहर मन किसान मन बर खास मजबूती वाला पनही के संगे संग नांगर बर नाहना तको बनाथे। चमड़ा के बने नाहना ह नांगर के डाड़ी अउ जूड़ा ल जोड़े के काम करथे। अइसने मजबूत चमड़ा के बइला गाड़ी के नाहना तको बने रिथे, गाड़ा म कतको भरती भर ले बइला ह तिरत ले हकर रही फेर मेहर के बनाये नाहना नइ टूटे, ये कृषि संस्कृति म इमानदारी के प्रत्यक्ष नमूना आए।

बियारा बुता- धान के फसल ह तीन महीना बाद पाके ल धर लेथे। तव किसान मन ओकर लुवई करे के पहिली राखे के ठउर तियार करथे, माने बियारा ल सिद्ध पारथे। चतवार के कांटा छरपथे, भाड़ी रुंधथे, राचड़ ल बने करथे। गोबर ले बियारा ल लिपे रिथे काबर के उहचे, खेत ले धान आना हावय। बाली ह टूट के गिरे ले उठावत बन जावय अतेक पान सफई होना चाही। येती जब धान ह पक के तइयार होथे तव लोहार कना ले हंसिया पंजवा के लानथे अउ देवधामी ल सुमर के खेत म हंसिया गिराथे।
लुवई अउ बोझा डोहरइ- लुवई के बाद जब धान के करपा कर्रा जथे तव ओला पैरा के डोरी म बिड़ा बांध के गाड़ा म भर के बियारा तक लाये जाथे। येमा समय के थोरको चूक होय ले नकसानी होथे तेन पाके किसान मन बेरा म सबो काम ल सिद्ध पारथे। जइसे लुवई अउ करपा उठई म देरी करे ले बाली ह खेते म गिरे के डर रिथे। कचलोइहा लुवे ले धान ह मोटबदरा हो जथे। किसान के परिवार म सबो काम म लगे रिथे सियनहा मन करपा ल बिड़ा बांधके राखथे, लइका मन सिला बिनथे, सियनहिन मन मुड़ म बोह के गांड़ा म अमराथे, खेत दूरिहा रेहे म दोहरा भारा तको डोहारथे। कावर अउ सूल म दूनों कोति बिड़ा फांस के तको डोहारे जाथे। 
बड़होना पुदकना- आखरी खेत म लुवई के दिन एक कोन्टा म लइका मन बर बड़होना छोड़े जाथे जेन ल लइका मन पुदकथे अउ ओकर मुर्रा बिसाथे। बड़होथे तेन दिन सबोच ल खुशी होथे, लइका मन ल धान मिलथे जेकर ओमन मुर्रा बिसाके खाथे अउ सियान मन ये पाके मगन रिथे के खेत म बगरे लछमी ह अब सकलागे।
सिला बिनना- लुवाये धान के करपा ल जब बिड़ा बांधथे तव बाली ह टूट के गिर जथे, उठाके गाड़ी तक डोहारे म तको गिरत जाथे। बियारा ह दूरिहा म रेहे ले धान के बाली गिरत गिरत आथे। इही गिरे धान के बाली मन ल सिला कथे जेना घर के लइका उक मन बिनथे।

मिंजई- बखत म बरसा होय ले फसल बने उतरथे फेर एमा देखरेख अउ सूझबूझ तको घातेच जरूरी होथे। बियारा म राखे खरही ल अइसे तरीका ले रखे जाथे के ओमा कतको पानी परै धान खराब नइ होवय। वइसे धान के खरही ल किसान मन जादा दिन बर नइ बनावे, सबो चक के धान ल सकेले के बाद बेलन म मिंचई सुरू कर देते थे। बेलन के मिंजई ह बने तको होथे काबर के पैरा ह बने मर्रा जथे जेला माल मवेशी मन चाव से खाथे। बेलन म मिंजई करत बखत कलारी ले पैर ल कोड़ा दे बर परथे, माने तरि के ल उपर करना होथे। मिजंई ह रात रात ले चलथे, बेलन चड़े-चड़े आनी बानी के ददरिया तको सुने बर मिलथे। अधरतिहा ले बेलन चले के बाद जब धान के बाली पूरा झर जथे तब बड़े फजर ले अलहोर के पैरा ल अलग करके सकेलथे। आधा पेरउसी तो दतारी म अलहोरे ले अलगा जथे ताहन बियारा म अंगाकर रोटी ल अमटाहा मुरई संग खाके धान ओसाई के काम रिथे। जड़काला के दिन तको आ जाए रिथे तेन पाके बुता बने उसरथे। धान ले कटकरा बदरा ल ओसा के सफा धान ल कोठी म भरके राख दिये जाथे।
बेलन- बेलन जइसे कि शब्द ले ही ओकर स्वरूप के पता चलत हावय बेलनाकार। धान मिंजे खाजिर किसान मन रोटहा पेड़ के तना न काट के गोल छोले रिथे। दूनो छोर म लोहा के पट्टा लगाके उपर म बइठक बनाये रिथे। ये बइठक के उपयोग बियासी के बखत कोपर के रूप म तको होथे। बेलन ल गाड़ा अउ नांगर सहिक बइला मन तिरथे। धान मिंजई म गाड़ा, छाकड़ा के तको उपयोग होथे।
धान के नाप- गांव म अइसन किसान जेकर घर के धान चाउर ह बच्छर भर नइ पूरे ओमन आन घर बाड़ही मांगे रिथे, माने उधारी म धान ले रिथे के मोर धान होही तहान लहूटा देहू। ओमन धन ल नाप के लहुटाथे। इहा धान के नाप काठा म होथे। हमर छत्तीसगढ़ म तउल के हिसाब किताब करे के परंपरा इतिहास म नइ दिखे इहां के सियान मन तइहा ले काठा नाप करत आवथे। अब के मुताबिक कइबे तव लगभग तीन किलो के एक काठा होथे। अइसने 20 काठा ल एक खाड़ी, 25 खाड़ी ल एक गाड़ा केहे जाथे। अइसने गिनती के हिसाब ल कोरी म रखथे जेमा 20 ठिन के एक कोरी होथे।
अइसन हवय हमर छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति जेन ल विज्ञान संग संघेरबे तव ओमा वैज्ञानिक तथ्य दिखथे। धर्म संग जोड़ के देखे म मानवता अउ भाईचारा दिखथे। प्रकृति संग जोड़बे तव पशु बर प्रेम के व्यवहार नता मितानी, रूख-राई, नदिया-नरवा अउ जल, जंगल, जमीन के सरंक्षण बर न जाने कतको पीढ़ी माटी म मिले होही।
0 जयंत साहू,
डूण्डा रायपुर छत्तीसगढ़ 492015
मोबाइल- 9826753304
ईमेल- jayantsahu9@gmail.com

11 Jan 2018

छत्तीसगढ़ी भाषा में हाना (लोकोक्तियाँ) का प्रयोग

छत्तीसगढ़ी भासा ह व्याकरण के दृष्टि ले गजब समृद्ध हवय। 1885 म हीरालाल चन्नाहू ह छत्तीसगढ़ी व्याकरण के सिरजन करिन जेकर अंग्रेजी भासा म अनुवाद तको होवय रिहिसे। इही कृति खातिर हीरालाल जी ल कलकत्ता के एक संस्था कोति ले 1890 म काव्योपाध्याय सम्मान ले विभूषित करे गे रिहिस। तब ले अब तक छत्तीसगढ़ी ह देवनागरी लिपि म लिखे अउ पढ़े जावथाबे। अभिव्यक्ति के माध्यम म मौखिक परंपरा ह छत्तीसगढ़ म जादा सजोर होय हाबे। मौखिक या वाचिक परंपरा ह संस्कृति के सरेखा के अभिन्न अंग होथे। जेन लोक समुदाय ह लिखित भाषा के प्रयोग नइ करय ओकर सांस्कृतिक आधार कथा, गाथा, गीत, भजन, नाचा, प्रहसन अउ हाना आदि ह होथे। छत्तीसगढ़ म जब हम वाचिक परंपरा के बात करथन तब हमन ल लोकनाट्य नाचा ह सबले जादा कारगर दिखथे, हम नाचा ल लोक संस्कृति के ध्वज वाहक कही सकथन। 



लोक कथा के बात करे जाए जो ये हा हमर सांस्कृतिक दर्पण आए जेन ह नवा पीढ़ी ल कथा के काल अउ समय के माध्यम ले ओ बखत के संस्कृति अउ परंपरा ल लोक म संरक्षित राखे के बुता करथे। अइसने पंडवानी, भरथरी, चंदैनी, नाचा, देवार गीत, बांस गीत आदि मन अपन गायन शैली म तइहा ल वर्तमान म देखाय के जबर उदिम करथे। इही रकम ले छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक गीत जइसे करमा, ददरिया, पंथी, सोहर, फाग, बिहाव गीत, गौरा गीत, जसगीत, सुवा, निर्गुणी भजन आदि ह लोककाव्य लोक-जीवन के हर्ष-विषाद, आस-विश्वास, आमोद-प्रमोद, रीति-नीति, श्रद्धा-भक्ति अउ राग-विराग के भाव ल अत्यंत सहजता ले जीवंत करथे।



वाचिक परम्परा ल समृद्ध बनाये म हाना के गजब योगदान हावय। हाना ह छत्तीसगढ़ के लोक-जीवन के नीति शास्त्र आए, जेन म कम से कम शब्द म बहुत ठोस अउ बड़े ले बड़े बात ल कहे के क्षमता होथे या ये काहन के गागर म सागर भरे के काम हाना म होथे। येकर कोनो लेखक या सर्जक नइ होवय लोगन गोठबात करते-करत टप ले कही परथे आन के ओढ़र म आन ल। लोक-जीवन म अनुभव के बल म ही लोकोक्ति या हाना बनथे। इहा ये बात जरूरी नइये कि कहने वाला या जेखर बर कहे जावथे ओमन कोनो भासा विद्धान होय। समे म बात के लाइन म लोगन अकरस ले कहीं परथे जेला सुनइया मन समझ तको जाथे। छत्तीसगढ़ म हजारों हाना प्रचलित हावय अउ कोन हाना ल कब कोन ह बनाये होही येकर कल्पना करना असंभव हवय। 



छत्तीसगढ़ी म हाना ह आम बोलचाल के सबो विषय म प्रयोग म आथे। फेर सरी छत्तीसगढ़ म गांव के संस्कृति रचे बसे हावय ये पायके अइसे कही सकथन के गांव के रहन-सहन अउ रीति रिवाज ल लेके गजब अकन हाना केहे गे हावय। जेकर मरम ल ओरी-ओरी फरियात जाबो। 
मेहनत कस छत्तीसगढ़िया मन भाग्य म बिसवास नइ करय बल्कि अपन करम म भरोसा करथे। लोगन जानथे कि बने काम करबे त बने फल मिलबे करही, काम ले अजिरन होके भाग्य ल कोसना बेकार बिरथा होथे। तभे तो सियान मन केहे हाबे- ''चलनी म दूध दूहै, करम म दोस दवै।'' सीख अउ संदेश ले भरे ये हाना ल सुन के एक बात अऊ केहे जा सकतथे के छत्तीसगढ़ी हाना म लोक म उपयोग होवइया जिनिस मनके बड़ सुग्घर ढंग ले प्रयोग करे गे हावय जेखर से कोनो कम बुद्धि के मनखे तको आसानी ले समझ जाही। चलनी के उपयोग ह चाउर चाले म होथे अउ ओहा पूरा छेदा-छेदा रइथे तेन पाके कोनो जिनिस ल भरे नइ जा सकय। जब ओमा दूध दूहै के बात होवथे तव ये गुने के बात आये के दुध ह भला ओमा कइसे भराही, अब ये मउका म दुहइया हा अपन भाग्य ल दोस देही तब का फइदा। बल्कि ओ जगह अपन काम के शैली ल बदलही या फेर बने असन दुहना के उपयोग करे म लाभ होही।



कोनो भी समाज के बात होवय सब अपन-अपन अहम म जीथे वो किथे मोर बने, ए किथे मोर बने। कतकोन मन अपन ल बने कहाय बर आन के कमजोरी ल उजागर करथे। अइसन मन बर छत्तीसगढ़ी म हाना केहे गे हावय- ''अपन ला तोपै, पर के ला उघारै।'' ये हाना म बिगर कोनो लारी-लग्गा के सोज्झे अपने बात ल केहे गे हावय।
कतकोन अइसन आदमी घलोक होथे जेन मन जीवन म बने कारज करिन या गिनहा ये बात ल काखरो आगू म कहे ले बुरा मन जथे या नाराज हो जथे। वइमन मनखे ल हाना म केहे हावय-''करनी दिखै, मरनी के बेरा।'' ये हाना म हास्य घलोक हावय अउ संग म तीखा व्यंग्य तको करे गे हावय। जिनगी भर आदमी अपन काम के सही गलत के पै ल नइ देखै ओला भगवान देखा देथे आखरी बेरा म।
छत्तीसगढ़ म अधिकांश लोगन मन खेती किसानी म बुता करके अपन जीवन यापन करथे। परिवार के सबो सदस्य मन जुरमिल के काम ल उरकाथे। अउ जेन लइका ह काम ल छोड़के येती-ओती भागथे तिकर बर हाना केहे हावय-''काम बुता बर जांगर नहीं, दउरी बर बजरंगा।'' ये हाना म दउरी के बड़ सुग्घर उपयोग होय होबय, दउरी म फंदाय बइला ल सिरिफ गोल-गोल किंजरे भर के काम रिथे उपराहा म ओला पैरा अउ दाना खाये बर तको मिल जथे। इही बात ल धियान म राखत केहे गे हावय कि मेहनत के काम ल करे बर जी लुकाथे, जांकर पीरा के ओढ़र म मड़ाथे अउ जेन काम म सोज्झे किंजर-किंजर के खाना रिथे तेकर पर टन्नक हो जथे। हाना के भाव ल देखे जाए तव महतारी बाप मन अपन लोग लइका ल केहे हावय तेन पाके व्यंग्य म तको मया दिखत हाबे। ये हाना ल कोनो ल अकरस ले कहि देबे तभो रिस नइ करै अइसन मया छलत हाबे फेर ये सुनइया ल सीख तको देथे के काम बुता म चेत नइ करस तेन पाके तोला दउरी के बइला के संज्ञा देवत हाबे। 




छत्तीसगढ़ म काम बुता के आधार म उंकर बेड़ा खाप बने हावय जइसें लोहा के काम करइया लोहार, तेल पेरे के काम करइया तेली, कपड़ा लत्ता के काम करइया कोष्टा, माटी के बर्तन-भड़वा बनइया कुम्हार, सोना के काम करइया सोनार। कतकोन जातिगत अउ काम ल लेके तको हाना बने हावय-''खेत बिगाड़े सौभना, गांव बिगाड़े बामना।'' येमा कड़ा व्यंग्य के भाव दिखथे जेमा सुनने वाला ल बुरा घलोक लगथे। जेन आदमी ह पर के उभरई म अपन सवांग बर आनी-बानी के जिनीस बिसाथे ऊंकर एक दिन खेती बिगड़ जथे माने बेचे के नौबत तको आ जथे। अउ आगू किथे के गांव म सही सुजानी बाम्हन नइ मिले ले गांव बिगड़ जथे। ये हाना ह लोगन ल संस्कारी बने रेहे के सीख दे गे हावय। इही म एक ठिन अउ हाना किथे के- ''खेती धन के नास, जब खेले गोसइयां तास।'' समाज के लोगन मन ल चेतावत सुजानी सियान किथे कि जब किसान ह तास खेलथे तव ओकर खेती धन के नास हो जथे। ये हाना ह सोज-सोज कहे गे हावय काबर के खेत ही किसान के सबले बड़े धन होथे अउ तास म हालाकी खेती ल दाव म नइ लगावे फेर गोसइया हा सवांगे तास खेले बर बइठे रही तव ओकर खेती के सरेखा कोन करही, खेत के काम बुता कइसे उरकही अउ अइसने-अइसने म वो मानुख आलसी हो जही। किसान के आलसी होय ले खेती धन तो बिगड़बे करही। अइसने मनखे मन बर तो ''जइसन बोही, तइसन लुही'' तको केहे गे हावय।
छत्तीसगढ़ म कृषि प्रधान अंचल आये इही सेती सबो घर काहीं न काहीं जिनिस के उत्पादन होथे माने ओकर घर सपुरन हाबे। तब जेकर घर जेन चीज हाबय ओमन उहीच-उहीच थोरहे बउरही। ये मेरन ये हाना आथे के-''तेली घर तेल रही तव माहल ल नइ पोतै।'' हाना ले दू बात सामने आथे के छत्तीसगढ़ म तेल निकाले के काम तेली मन करथे अउ दूसर बात ये के कोनो भी जिनिस के अति होय म ओकर व्यर्थ उपयोग नइ करे जाए। 
हमर अंचल म बेटी मन बर तको बड़ मार्मिक भाव लेके हाना केहे गे हावय। दाई-ददा बर ओकर दुलौरिन बेटी ह आन-बान अउ अभिमान होथे। बड़ दुलार ले नोनी ल ओकर मइके पठोथे तिजा-पोरा म पुछथे। जइसन बनथे तइसन मया के चिनहा भाई तको देथे। बेटी कहू भगवान घर ल चल दीस तव दाई-ददा उपर दुख के पहाड़ टूट जथे। तब महतारी बाप ल परिवार वाले सांत्वना देवत किथे-''दई लेगे लेगे, दमाद लेगे लेगे।'' ये हाना म दुख घलोक हे अउ सांत्वना के शब्द तको, काबर के बेटी पराया धन होथे। बाड़हे नोनी ल दमांद बिहा के लेग जथे। इही बात म दुख के भाव समेटत केहे गे हावय के बेटी ल तो बाप के घर ले जाना ही होथे, भगवान लेगय या दमांद। 
बहुत अकन हाना मन दू पद के तको होथे जेमा तुलना करे जाथे जइसे-
''तेल फूल म लइका बढ़य, पानी म बाढ़े धान।
खान पान म सगा कुटुम्ब, कर बइना बाढ़े किसान।।''
ये हाना म बड़ सुग्घर ढंग ले तुलनात्मक रुप म जिन्दगी के मरम ल बताये गे हावय। बने तेल फूल ले घर के लोग लइका बढ़थे अउ पानी ले बाढ़थे धान, घर के खान-पान ले सगा सोधर बाड़थे अइसने रकम ले किसान तको किसानी म जोंग देके कमाही तब ओकरो उरऊती ओही। 
''आषाढ़ करै गांव गौतरी, कातिक खेलय जुआं।
पास-परोसी पूछै लागिन, धान कतका लुआ।''
किसान बर असाढ़ के महीना ह बड़ महत्ता के होथे इही म तो किसान अपन खेती किसानी के काम बुता म फदके रिथे। काटा खुटी बिनना, खातु कचरा पालोना। मउका म बने पानी दमोरे ले बोवई के काम करना। अब अइसन म कोना गांव किंजरत हाबे तव तो गै ओकर किसानी। अऊ कातिक महीना धान लुवई के होथे। जेन मनखे कातिक के महीना म जुआं खेलत बइठे रिथे ओमन ल ये हाना ह व्यंग्य करत पूछथे के तोर खेत म कतका धान होइसे। एक प्रकार से हाना ह सीख के तको हाबे के एक किसान बर असाढ़ अउ कातिक के महीना ह कतका काम के होथे। 




अइसने समय के महत्ता बतावत एक ठी अउ हाना हावय-''डार के चूके बेंदरा अऊ बेरा के चूके किसान'' जइसे बेंदरा ह पेड़ के डारा ले कुदत बखत चूक जथे अउ भुइंया म गिर जथे वोइसन बरोबर किसान के तको बेरा के चुके ले ओकर फसल म गिरावट आथे माने किसानी म एक-एक समय गजब अनमोल होथे।
बहुत अकन हाना म ऐतिहासिक अउ धार्मिक तिरिथ बरत मनके तको नाम अउ महिमा के उल्लेख मिलथे जइसे- ''गोकुल के बिटिया, मथुरा के गाय, करम छांड़े त अंते जाय।'' ये हाना म गोकुल अउ मथुरा के नाव के उल्लेख होय हाबे। नाम के मरम अइसे हावय के जेकर कना सबो जिनिस हावय रहे बसे के तेकर बावजूद ओला अंते जाना परय त अइसन मानखे के दुरभाग आए। 
''घर के जोगी जोगड़ा, आन गाँव के सिद्ध'' कतकोन अइसे लोगन घलोक होथे जेन मन अपने बीच के जानकार मनखे के कदर नइ करय अउ आन गांव के बइद ल राई टारे बर बला लेथे। अलस मरम ये हावय के हाना ले लोगन सीखय के गांव-घर म तको जानकार मनखे रिथे तेकरो आदर करना चाही, ये जरूरी तो नइये के आन गांव ले आही तिहिच ह अमग गियानी होही।
इही बात म बल देवत एक ठिन अउ हाना हवय-''अपन मरे बिन सरग नइ दिखय'' ये हाना के प्रयोग कथा कहानी म जादा देखे बर मिलथे काबर के इहां मउत अउ सरग के बात होवथाबे। कोनो मनखे जब आन आदमी के बात ल नइ मानय अऊ बर बरजोरी करके उहिच अनित ल कर देथे जेकर भुगतना ल आन ह भुगतत हावय तब किथे के तै नइ मानेस अब तहू भुगत। छत्तीसगढ़ी म कोनो अप्रशिक्षित आदमी कना कही सलाह लेवइया मन बर बड़ सुघ्घर हाना हावय-''अड़हा बइद परान घाती'' मतलब कोनो ल जर धरे हाबे अउ वोला कहू अड़हा बइद कर धरके लेगे तव तो बीमारी कमतीय ल छोड़ अऊ बाड़ जही, पराने छूट जही। वइसे तो ये हाना ह सुने म बीमार मनखे अउ अढ़हा बइद के उल्लेख हावय फेर येकर उपयोग अप्रशिक्षित आदमी ले काम करइया सबो जगह आसानी ले बोले जाथे।  




अब के समय म अइसन हाना ह बोलचाल म भले नइ आवय फेर लोकांचल ले नंदाय नइये। लिपिबद्ध नइ होय के बावजूद कलाकार मनके मूख ले जन मानस म बगरत हाबे। येकर सबले बड़े उदाहरण नाचा आए। नाचा म दू जोक्कड़ रिथे, एक झिन लेड़गा-भकला अउ दूसर ह बने चेतलग। गम्मत सुरू करे के पहिली ओमन हाना भांजरा ले दर्शक म हास्य भरे के प्रयास करथे। चेतलग जोक्कड़ ह हाना भरथे तव दूसर ह आन मतलब निकाल के लोगन ल हंसाय के बुता करथे तब ओला  हाना के सही अरथ बताये जाथे।  जइसे ये हाना-''ठाडे खेती गाभिन गाय जब आये तभे पतियाय'' म बात बहुत गंभीर हावय के खेत म फसल तो बोवाय हाबे, अब फसल ल देख के कतका होही येकर सही-सही हिसाब बताना बड़ मुस्किल हावय, जब सामने आही तभे ओकर भेद ह खुलही। मुस्किल अउ अटपटहा असन हाना के बाद नाचा म आसान अउ सोज-सोज अपन बात ल रखने वाला हाना ल गम्मत म कहे जाथे जइसे- आज के बासी काल के साग, अपन घर म काके लाज। कउवा के रटे ले बइला नइ मरय। जादा मीठा म कीरा परथे। देह म नइ ए लत्ता, जाए बर कलकत्ता। खातू परै त खेती, नइ त नदिया के रेती। खेती अपन सेती। उप्पर म राम-राम तरी म कसाई। छानी म होरा भूँज। तीन पईत खेती, दू पईत गाय। भाठा के खेती, अड़ चेथी के मार। धान-पान अऊ खीरा, ये तीनों पानी के कीरा। जब आये बरात तब ओसाये कपास। 
वर्तमान समय के छत्तीसगढ़ी गीत मन म हाना के प्रयोग अब देखे बर नइ मिलत हाबे लेकिन तइहा के पारंपरिक ददरिया म दू पद वाले हाना के प्रयोग गजब होय हाबे। जइसे- बराती बर पतरी नही, बजनिया बर थारी। मँही मागे बर जाय अव ठेकवा ल लुकाय। फोकट के पाईस मरत ले खाईस। सबे कुकुर गंगा नहाये बर जाहि त पटरी ला कोन चाटही। कब बबा मरही, त कब बरा चुरही। 




गाथा गायन म तको घातेच अकन हाना आथे जइसे- ''दाई देखे ठऊरी डऊकी देखे मोटरी।'' ये हाना म महतारी ह अपन औलाद के पेट के भात के थैली ल देखथे के मोर दुलरवा बेटा हा कमाय ल गे रिहिस दई खाय-पिये रिहिसे के नहीं, बने पानी पसिया मिलिस के नहीं। उही मेर ओकर घरवाली ह अपन पति के मोटरी ल देखथे के मोर आदमी ह कतका रूपिया कमा के लाने हावय। थोर बहुत बचाय हाबे के सबो ल फूक डारे हाबे। ये नानकून हाना के अतेक जबर मरम ल जब कोनो गाथा गायक ह अरथ ल बतावत गाथे तव सुनत दाई माई मनके आंखी म आंसू भर जथे। अइसने एक ठिन हाना हावय- ''बिआवत दुख बिहावत दुख।'' औलाद ल पैदा करे के पीरा ल एक महतारी के अलावा कोनो आन ह नइ जान सकय, अपन गरभ म नौ महीना राखे अउ ओकर सेवा जतन करे के पीरा हा महतारी बर नानकून आय फेर ओकर बिहाव के बेरा के पीरा ह ओकर बर दुख के पहाड़ हो जथे। बेटी ह बिहा के अपन पति घर चल देथे अउ बेटा के बिहाव करे म ओहा अपन गोसइन के हो जथे येकरे सेती केहे के गे हावय के बिआवत दुख बिहावत दुख। छत्तीसगढ़ म जतेक भी जीवन के सार ल बताने वाला हाना हावय ओमन ल हम किस्सा कहिनी मन म सुनते रिथन जइसे- उपास न धास फरहार बर लपर-लपर। चमगेदरी घर सगा गेस, तंहु लटक महु लटकहू। कंहा जाबे मोर बोरे बरा किंजर-फिर के आबे मोरे करा। जाने बर ना ताने बर, बड़का नांगर फांदे बर। जेखर नौ सौ गाय ते हर मही मांगे जाए। दार भात घर गोसइयां खाए, अपजस ले के पहुना जाए। घर के पिसान कुकुर खाए, परथन बर मांगे जाए। घर गोसइयां ल पहुना डेरवाए। एक झन लइका बर गांव भर टोनही। चार बेटवा राम के, कौड़ी के ना काम के। जिहां जिहां दार भात, तिहां तिहां माधो दास। खांध म लइका, गांव म गोहार। खाए बर भाजी अऊ बताए बर बोकरा।




ये जम्मो हाना मन अब हमन ल अपन अंचल के लोक जीवन ल समझे म मददगार साबित होवथाबे। आगू हमर पुरखा मन का गुनय, का चीज ल मन करय, काला बने मानय अउ काला गिनहा। छत्तीसगढ़ के हाना म प्रयोग होय आखर ह यहू बात बताथे के कोन-कोन से जिला म कते जिनिस के उच्चरण कइसे होथे। काबर के इहां कोस-कोस म पानी अउ बानी बदले के बात होय हाबे तव हाना मन ही मौखिक ले लिखित तक आये म जइसे के तइसे सबुत माढ़हे हावय। वर्तमान समय म इही हाना ही हमर साहित्य ल अउ ठोसलगहा बनाही। बोलचाल म बात ल प्रभावशाली तो बनाबे करथे संगे-संग बोलइया बर सभ्यता अउ लिखइय के आखर म मिठास तको भरथे।
 दस्तावेजीकरण-
-जयंत साहू
9826753304
jayantsahu9@gmail.com