27 Sep 2011

भूमि अधिग्रहण- हमर तीन पिढी के घुरवा गै

आदमी कर जिही रिही तेकरे तो संसो करही भर्इ, जेकर करा खेती खार हे तेमन ल अपन-अपन खेत के संसो अब बइसाखू ह तो बपरा गरीब आदमी गांव के नानकुन घर के छोड़े अउ काहीच नइ हे। अब भुमि अधिग्रहण वाला मन गांव के सर्वे करिस की काकर कर कतका जमीन हे ओकर मुआवजा देबो किके। सबे अपन-अपन खेत खार के कागत पुरजा ल धर के लिखावत गिस। अब बइसाखू बिचारा का करे ओकर करा तो पुरखौती कांहिच नइ हे। घर के छोडे अऊ उपराहा कुछु हे त वोहे वोकर तरिया पार के घुरवा।
 वो घुरवा कब के हेबे तेन ल तो बइसाखू घलो नइ जानय। फेर जब ले होस संभाले हे तब ले उही घुरवा म अपन बेड़ा भर के कचरा फेकत आवथे। ओ घुरवा बर कम झगरा नइ होय हे। दू साल पहिली पंचइत भवन बनाबो किके सरपंच ह ओकरे घुरवा बर बानी लगाय रिहीस। जेन बखत सरपंच ह घुरवा ल पटवाय बर बनिहार पठोइस बइसाखू ह अगवाके घुरवा म सुत गे अउ गरज के किहीस लेव अब महु ल इही घुरवा म पाट दव। हमर तीन पिढ़ी इही घुरवा म राख माटी फेकत-फेकत उंकर मांदी के पतरी फेकागे। अब मोरो आस रिहीस कि मोर मरनी के मांदी के पतरी इही घुरवा म फेकाय। अब तो घुरवाच नइ रिही तेकर ले मोला जिते जियत इही घुरवा म पाट दव। पंचइत भवन छोडि़स तव पानी टंकी बनही किके नेव खोदवात रहिस अहु दरी नेव म जाके सुतिस त ओकर घुरवा बाचिस। आखिर एके ठन तो बइसाखू के पुरखौती चिनहा हे कइसे छोड़ देतिस। आखिर म पचइते ओकर घुरवा ल छोडि़स अब नया राजधानी वाला मनके सपेड़ा परे हे।

                  बइसाखू मुंह फारे देखत हे कि कोनो ह संग देतिस त यहू दरी जी परान देके अपन घुरवा ल बचाय के उदिम करतेव। फेर का करबे कोनो ह अपन पुरखौती चिनहा ल बचाय बर उदिमो नइ करत हे। गांव के पचइत ए ते पाय के बाचगे अब सरकार ले थोरहे बांचही। अरे सरकार तो जेकर करा लिखा पढ़ी के कागत हे, रजिस्टी वाला जमीन हे तेहू तक ल नइ छोड़त हे। अउ फेर बइसाखू कर तो कांही कागत पुरजा नइ हे। ओला तो मुआवजा घलो नइ मिलय गै तीन पिढ़ी के घुरवा।
अतका म एक बात तो साफ होगे कि दुनिया म जतका भी संसाधन हे सब सरकार के आय। ओ मन जिहा चाहय जब चाहय अपन कब्जा जमा सकथे। जे दिन तक सरकार के नजर नइ परे राहय लोगन ओकर उपयोग करथे। जिही दिन सरकार के नजर म आगे माने सरकार के होगे। हमर खेत राजस्व विभाग के आय, खेती म पानी पलोथन तेन ह नाहर डिपाटमेंट के आय, नांगर बक्खर म उपयोग करथन तेन बइला भइसा ह पशु पालन विभाग के आय, खेती किसानी के बिजहा अउ खातु ह खादय बीज निगम के आय। कर लेके बेरा सरकार किथे तुहरे सोहलयित बर आय त फेर आज किसान मन के जीवकोपार्जन के आधार ल नंगावत हे तव कहा हे ये विभाग।
अभी सुनर्इ आहे कि नया राजधानी म प्रभातित गांव वाला मनके व्यस्थापन बर मकान बने के सुरू होगे हे। पक्का मकान बिजली पानी चकाचक घर बनाके देवथे। एमन घर तो बनावथे पर का उइसेन गांव फेर बसा पही। गांव ल उजारना बहुत आसान हे बसाना नामुंकिन। गांव ह मकान अउ उहा के रहवासी मन के बसेरा ले नइ बसे बलिक सभ्यता अउ संस्कृति के रतियाए ले बसथे।


गांव उजार के गांव बसाने वाला मन जोन मकान बनावथे वोहा तो कोनो प्रकार से लगय नही कि ये गांव वाला बर बनावत हे। मकान म एक कोठा होना, एक परसार होना, चुल्हा बारे बर रंधनी खोली होना। धान धरे बर कोठी होना, छेना धरे बर पटाव होना। नहाय बर घर तिर म तरिया होना, बाहिर बÍा अउ निसतारी बर जगा होना। सबे घर के अपन कुल देवता होथे तेकर बर देवता खोली होना। देवता ल अइसने विराज मन घलो नइ करे सकय मान गवन करके आसन देबर परथे। एकर अलावा चरयारी चिज घलो लागही जइसे होले डउर, खैरखा डांढ़, खल्लरी मंदिर, शितला, ठाकुर देव, बरम बबा, परेतिन दार्इ, साहड़ा देव। नया जगह म तो येमे से एको ठिन के चिनहा नइ दिखे तव गांव के व्यवस्थान कइसे होही तेला उही मन जाने।


गांव उजारने वाला मन ल तो इही लागथे कि ओमन सिरिफ मकाने भर ल ए मेर ले ओमेर करत हे लेकिन गांव छोड़ने वाला से पुछव कि ओमन का का छोड़के जावथे। मुआवजा हर चिज के नइ हो सके।
धन्य हे बइसाखू भइया जोन घुरवा ल बचाय बर अपन जीव ल होम देवे। आज जब दस-दस बीस-बीस अक्कड़ के जोतन दार मन ल रूपिया गनत देखथवं तो मोला गर्व होथे बइसाखू भइया उपर कि ओमन अपन घुरवा गतर बर लड़ मरय। आज लोगन लड़त हाबे मुआवजा के राशि बड़वाय बर। अरे उही दिन बइसाखू सही सबो कोनो अपन-अपन खेती खार, घर दुवार ल पुरखा के चिनहा जान के सरकार ल धुतकारे रितेव त आज ये दिन देखे ल नइ परतिस।

20 Sep 2011

नंगाई अउ महगाई ले तो बने, बेइलाज ही मर जावं

धरमराज आज के एक वचन दे..,
गरीब ल बिमारी झन दे।
देना हे त जिनगी दे अवरधा भर..,
नही तव राहन दे।
वो कोती महगार्इ हे
ये तनी नंगार्इ
अइसन ले भला तो
बेइलाज ही मरन दे..।।


          मनखे के देह म उच-निच तो होते रिथे जर कभु जर बुखार त कभु खांसी खोखी। मरइया बर बड़े-बड़े बिमारी का नानकुन ह घलो ओखी हो जथे। एकरे सेती देह म कुछु जनाथे तव दऊड़ के अस्पताल कोती आथे। अम्मर खाके कोनो नइ आय हे का अमीर का गरीब सबला एक दिन मरना हे फेर जतन पानी अउ इलाज बने रिथे त अपन अवरधा भर जीये के आस रिथे।
          आज अस्पताल के हालत देखबे त एक डहर महगार्इ अउ दूसर डहर नंगार्इ हे अइसन म गरीब मन बिमारी के इलाज कराय बर अस्पताल के दुवारी जाय के बजाय यमराज के दुवार जाना जादा सोहलियत समझथे। अतेक नवा-नवा तकनीक अउ कोरी खौरखा अस्पताल के राहत म लोगन के अइसन सोच के कोनो तो कारण होही। डाक्टर मन हरेक बिमारी के इलाज करे के दावा करथे, दावा तो अइसे करथे जानो मानो यमराज उंकरे दब म हेबे। रावण ल बाली ह अपन खखौरी म दबाय रिहीस वोइसने बरोबर पराबेट अस्पताल वाला मन यमराज ल अपन खखौरी म दबाय रिथे। जब तक ले उंकर आगु म पइसा कुड़होत रिबे यमराज दब म रही। जहां पइसा कऊड़ी कम होइस तहां यमराज निकल के गरीब के परान ल हर लेथे।
          पराबेट के महगार्इ ल देखत सरकार ह सरकारी अस्पताल म गरीब मन के रोग रार्इ टारे बर बड़भारी खर्चा करके दवर्इ बुटी अऊ सेवादार राखे हे। ये अस्पताल मन ह सेवा ले जादा गड़बड़ी, अधरसÍी काम, मनमौजी अउ आय दिन हड़ताल के कारन जादा चर्चा म रिथे। इहां के काम काज ल देखबे तव ये यमलोक ले कम नइ जनाय। सबो मनखे मन अपन-अपन करम के लेखा जोखा ल धरे एति ले ओति होवत रिथे। घंटा पाहर के काम बर महिना पंद्राही ले जोहत रहिथे।
          आय दिन उहा नवा नवा पंचन होथे ओ दिन झन महतारी ह आटो म जचकी होगे हे। सात सौ बिस्तर के अस्पताल म का ओकर बर ठउर नइ रिहीस। जीव के डर तो सबो ल रिथे का अमीर का गरीब बपरी ह जी के डर म काहरत जीव बचाय बर अस्पताल जाबो करिस त उहू ह फत नइ परिस। न घर म न अस्पताल म, न बेड म न खटिया म, भितरी म न बाहिर म नरसिम्हा बरोबर दुवार म लइका अवतरगे।
          दरद म काहरत महतारी के चिचियाइ ल अवइया जवइया बिलमइया सबो ह सुनिस, नइ सुनिस तव सिरिफ अस्पताल के करमचारी अउ डाक्टर। चार पइसा कम लागही किके बपरी ह पराबेट ल छोड़के सरकारी म आय रिहीस। आजकल पराबेट म लइका बियाना छोटे मोटे बात नोहे आठ ले पंद्रह हजार खर्चा आथे। खौर भगवान सब बनाथे बनगे तव बनगे बिगड़तिस त उंकर का जातिस जेकर जातिस तेकर जातिस।
          इंकर उपर्इ अतकेच भर नोहे येमन तो उपद्रो ले नंगर्इ कर देथे। बड़े डाक्टर मन नवसिखिया मन के भरोसा तव यहू नवसिखिया मन आय दिन हड़ताल म कुद परथे। मरीज मन तालाबेली होत रिथे अउ ये मन अपन मांग ल मनाय बर घेखरर्इ करथे। कोनो ल काके संसो त येमन ल अपन नौकरी अउ तनख फिकर रिथे। मसीन अउ गोली दवर्इ के बात ह तो ये फाइल ले ओ फाइल म समटा जथे। अस्पताल ह कोनो काम के नइये अइसे बात नोहे, निति अउ विचार तो कमाल के हे लेकिन अमल मे लावे तब तो। जतका नाम जस करके कमाय रिथे ततका ल तो असाढ़ के मोरी म उलद डारथे।
         कहि देबे त रिस करथे फेर देख के घलो कइसे आंखी मुंद लेबो। मरीज मन ह अपने सुते के पलंग ल ढकेल के अपरेसन खोली म लेगथे किके कोनो सुने होहू मै तो अपन आखी म देखेहवं। मै पुछेव कस जी तै दुच्छा पलंग ल काबर लेगत हस अउ येमा के मरीज काहां हे। ओ हा जवाब दिस- अरे भर्इ मिही तो मरीज आवं अपन आंखी के आपरेसन कराय बर आपरेसन खोली जाथवं। पलंग म मिही सुत जहू त ढकेलही कोन। ये जवाब ले मोर मन म कर्इ ठन सवाल खड़ा होइस फेर अइसन जवाब सुने के बाद का अऊ कुछू देखे सुने के हिम्मत होही ?



15 Sep 2011

आनंद अउ परमानंद

                                     दुनिया म हर घड़ी एक नवा जी के जनम होथे। इही ह चरावर जीव जगत के नियम आए। अइसन नइ होतिस त ये दुनिया म कांहिच नइ होतिस। एक महतारी ह अबक तबक चिचीयावत रिहीस असहनिय दरद म। अउ ये दरद म घलो मां बने के सुख के अहसास होवत रिहीस। जीव ह मुं सो आय लेवे त अइसे लागे जानो मानो महतारी ह लइका नइ बियावथे बल्की नरक भोगत हेे। फेर एक पल म ये पिरा ह खुसी म बदलगे जब अपन गरब ले अवतरे लइका ल मां ह एक नजर देखीस। ओ समय महातरी के ये जीवन के आनंद ल कोनो दुसर जीव कलपना घलोक नइ कर सकय आखर म गढ़ना तो दूर के बात ये।
               हांथ के मुंठा म भाग रेखा ल दबाय नान्हे लइका ह महतारी के कोरा मे किलकारी लेवथे। जब ओ मुठा ह छरियाही त काकर भाग म का निकलही तेन ल तो न लइका जाने अउ न महतारी जाने। फेर जनम होहे तेला तो उमर भर दुनिया ल झेले ल परही। सुख म राहय चाहे दुख म,राजा होवे चाहे रंक। सबला जुझना हे जीवन के आनंद बर। आज गली खोर म किंजरत कतको अइसन जीव देखे ल मिलथे जोन जीयत तो हे फेर जीवन म आनंद नइ हे। लोगन किथे घलो की जे दिन संसारी परानी आनंद ल पा लिही वो दिन तो जीव परमानंद के हो जही।
            जीव के आनंद अउ परमानंद के अनुभुति बर कुछ लोगन के जीवन यापन के सजीव चित्रण देखत मै दंग रही गेवं। संझा चार बजे के बेरा म रइपुर रेलवाही म ठाढ़हे रेहेवं। हमर नाटक मंडली के सबो सदस्य एके जघा जुरियाय रेल के अगोरा करत रेहेन। चिरो-बोरो कांव कांव म घलो सब अपन अपन गोठ बात म मगन हे। हमु मन एक कोरी तीन अक झन रेहे होबोन जेमा सात झन नारी परानी घलो रिहीस,ते पाय के हमर मन के हांसी दिल्लगी अलग चलत रिहीस। रेल तीस मिनट देरी म अवइया रिहीस जाना तो हे चाहे कतको बेर आवे। फेर ये बेरा के बिलमर्इ बड़ आनंद देवत रिहीस हांसी ठिठोली ले कटत रिहीस। तभे हमर आगु एक झन अस्सी पच्यासी बरस के डोकरी डब्बा ल हलावत मांगे बर आगे। मेहा बाजू वाला कोती टरकायेवं। बाजू वाला ह अपन बाजू वाला डहर टरकर्इस। हमर मन के गोठ बात चलते हे अउ वो डोकरी ह अइसे तइसे करके पंदरा झन करा किंजर डरिस। एको पइसा नइ पाइस। पंदरा जगा डोकरी ल नाचत देख-देख के हमला का आनंद अइस येला तो हमू नइ जानन। फेर हांसी मजाक ले टेम पास होवत रिहीस।
             ये टेम पास म डोकरी के तरवा के एको ठन लकिर नइ टेड़गइस। उहीच के उही मुं धरे हे। न असकटार्इस, न खिसीयाइस, न मुसकाइस, न कंझाइस पथरा कस जीव ठाड़हे रिहीस। आखिर म एक झन नोनी ह अपन पर्स ले एक के सिक्का निकाल के डोकरी के डब्बा म डारिस। डोकरी के मांथा के रेखा ठक ले टेढ़गा के जीव होय के अहसास करइस। ओकर थोथना के भाव देख के महू ल थोर थोर अहसास होइस की हमन तो सिरीफ आनंद लेवत रेहेन। वहू म एक भिखारन कर। भिख मांगत-मांगत डोकरी ह हमर सही कोन जनी अउ कतका झन ल आनंद देवात रिहीस होहीं वहू म बिना मांगे। फेर आखीर म जब सिक्का ह ओकर डब्बा म गिरथे त वो तो परमानंद ल ता लेथे। काबर की इही सिक्का ह तो आज के आनंद अउ परमानंद आय।


जिनगी ले जिनगी जुरे हे

दुकान कोनो भी जगा राहय गिराहिक पहुची जथे। प्रचार प्रसार के जमाना हे तभे तो दिल्ली बम्बर्इ के दुकान के पता ल रइपुर के टी बी म देखाथे। पचास प्रतिशत डिस्कांउट अउ एक के संग एक फ्री स्कीम म तो मरघट के दुकान म मन माड़े भीड़ पेले परथे। चार ठन घर बसिस ताहन दुकान खुलत देरी नइ राहय। दुकान बनिस ताहन उधारी मगर्इया के आवत देरी नइ राहय। दुकानवाला घलोक कम नइये, एक के एक्कइस दाम लगाथे। बजार हाट म सही दाम म सही माल खरीदना सबाके के बस के बात नोहय। बनिया जानथे गिराहिक ल कतका बताना हे अउ कतका म बरोना हे। फेर मोल भाव करइया तो ब्रम्हा के बेटा अउ बनिया के बाप ए लेदे के भाव पटार्इच लेथे।
 इही मोल भाव के चक्कर म मै दुकान नइ जावं अउ चली देथव त ठगा के आथवं।
एक दिन आधा रात के मोर के मितान के फोन आइस किथे- मितान काकी हा अबक तबक जवर्इया हे। मे एकसर्वा मनखे कति कति काय काय करहा। मोला तो कुछू समझ नइ आवथे। तै झटकुन आ जते त कहु कोती लेगे लाने म सोहलियत हो जतिस।
मितान ह फोन करे रिहीस नही काहत घलो नइ बनिस। खभर पाके तुरते रेगेवं। मोर पहुचत ले फुलदार्इ भगवान घर रेंग दे रिहीस। मितान ह नानपन ले अपन दार्इ ल काकी काहय। बपरी फुलदार्इ ह मोला बड़ मया करे। जब जाववं तब अंगना म पहुचाववं। आजो अंगना म पहुचा गेव। फरक अतके रिहीस कि आगु काम बुता करत पहुचाववं अउ आज बांस के चइली म सुते चार हांथ तिखा ल ओड़हे हे। बोटबोटए आखी ल पोछत मितान संग ओकर काकी के आखरी दरस करेव।
 जेन फुलदार्इ के खांद म चड़ के गांव गली ल किंजरवं। उही महतारी बरोबर फुलदार्इ ल आज हमन अपन खांद म बोह के मरघट अमराबो। लेगे के फुलदार्इ के आखरी दरस करे बर पुरा गांव उमड़गे। थोरके म मितान मोर तिर म आगे किहीस चलना मितान अंतिम संस्कार के समान लाने बर जाबो। मै केहेवं सब सोधर ल छोड़ के तै कहा जाबे मितान मिही नेंग जोग के समान ल नान लेथवं। मै सोचत रेहेव दुकान गाव म होही फेर उहा तो मरघट म दुकान खुले राहय। किराना दुकान के समान ल घर पहुच सेवा सुने रेहेव फे उहा तो मरघट पहुच सुविधा रिहीस। एक तो जिनगी म कभु दुकान गे नइ रेहेव अउ जाबो करेवं त मरघट के दुकान।
 दुकानदार ह अंतिम संस्कार के समान ल दुकान म सजाए हमर दुख ले बेमतलब अपन मन पसंद गाना बजावत बइठे रिहीस। आसु ल पोछत मै दुकान डहर बड़हेव त दुकानदार के चेहरा खिलगे काबर कि ओला गिराहिक मिलगे। दुकानवाला के किस्मत घलो अजिब हे गांव म मनखे मरथे त ओकर धंधा पानी चलथे। सुत उठ के दुकानदार ह भगवान के पुजा पाठ करके बोहनी अगोरत होही। भगवान तो सबके सुनथे ओकरो सुनत होही। आज ओकर किसमत रिहीस कि फुलदार्इ के दिन पुरे रिहीस तेला भगवाने जाने। मरघट म मुर्दा जाथे त ओकर दुकान चलथे। दाना पानी तो सबो के लिखे हे। मरर्इया घर चुल्हा नइ बरय अउ दुकानवाला के बार्इ ह तेलर्इ बइठथे।
 गर्मी के महिना आय बेरा घड़ी घड़ी चड़हत रिहीस। लकर धकर समान के नाव ल बताएव। सबो समान ल निकाल के मड़ा दिस, मै भले पहिली बार समान ले बर गे रेहेव फेर ओकर तो रोज के उही काम आय। एको ठी समान के भाव नइ पुछेव। दुख के बेरा म काए भाव ताव करतेवं। सबो के एकÎा दाम पुछेव अउ पइसा देके समान धरे आगेवं। रद्दा भर दुकाने के बारे मे सोचत रेहेवं। कहु ये दुकान मरघट ल छोड़ के बिच बजार म होतिस त का होतिस।
दुकानवाला मन दुकान के दुवारी म ठाड़हे गिराहिक मन ल गोहार पारतिस- आवा... आवा... अंतिम संस्कार के समान ले लव, सस्ता ले सस्ता, छांट के लेला मोल भाव करके लेला। दस रूपिया जोड़ी कफन के कपड़ा, पांच म छै पाकिट सुंगध वाला अगरबत्ती अउ सबो समान ल मोरे दुकान म लिहा त एक घइला फोकट म। बने करे हे बपरा ह मरघट म एक बोलिया दुकान खोल के दुखी दंडी मन ल बजार के झमेला तो नइ होवे। काकरो घर कोनो बितही त ओकर समान बिकही।
 मने मन गुनत समान धरे मितान तिर गेवं त चिता रचागे रिहीस। सबो कोनो ओरी ओरी फुलदार्इ ल पानी देवत रिहीस। महु पांच मुठा पानी देवं अउ पांलगी करेव। मनखे कतको गरीबहा होवे फेर रिती रिवाज तो रिती रिवाज होथे। मितान अपन रिती रिवाज ले फुलदार्इ ल आगी दिस। सबो झन घर डहर लहुटेन। फुसुक-फुसुक रोवत मितान ल दिलासा देवत केहेव कि आना जाना तो सबो के लगे हे मितान तोर मन ल निच्च्ट अंधयारी म झन बुढ़ोबे। फुलदार्इ ह अब तोर कुटुम के देव धामी म जा मिंझरगे। उप्पर ले तोर बर सदा असिस बरसाही।
मोर एक मन तो मितान संग दुख म बुड़े रिहीस अउ दुसरर्इया मन रही रही के ओ दुकान वाला डहर जात रिहीस। ऐती फुलदार्इ के चिता के लकड़ी बरीस वोती दुकानवाली के चुल्हा गुंगवागे। मितान घर अब कोन जनी के दिन ले जेवन नइ बनय। अउ वोकर घर दार भात के हडि़या चड़गे। दुनिया के अइसन मरम ल मै पहिली बेर अनुभव करेवं। बिधाता ह सबे के सुध लेथ। कोनो ल दुख देथे त कोनो ल ओकर ले सुख देथे। सिरतोन कहवं त जिनगी ले जिनगी ला जोड़े हे बिधाता हा।

7 Sep 2011

कहिनी - मईके के सुरता

फूफू के लिगरी म सातो ह भार्इ मन करा बांटा मांगे बर उमियागे। पंचइत सकेल के अपन ददा के जहिजात म हिसा मांगिस। नित नियाव म लड़के सातो ह अपन ददा के जहिजाद मे हिसा पा लिस। फेर बपरी के जीयत भर बर मइके के मया छुटगे। आगी लगे अइसन नियाव म जोन मया ल टोरथे। कीरा परय ऊकर मति म जेमन धन के पाछु मया जोरथे।
 बिहाव के पाछु बेटी मार्इ ल मइके ले एक लोटा पानी के आस रइथे। तिजा पोरा अउ मातर मड़र्इ म नेवता हिकारी के अगोरा रइथे। तथे तो मइके के कुकुर ल घलो ससुरार म भार्इ बरोबर मान गवन करथे। सातो ह मुहांटी म बइठे बइठे अपन तिजा लेवइया के अगोरा करत बइठे हे। येहु साल आय के आस तो नइ हे फेर का करबे सातो के मन मानबे नइ करय।
 अपन दुवार म बइठे सातो ह सबो के लेगर्इया ल आवत देखत हे। सातो के मन के लालच के तेलर्इ म मइके के सुरता डबके लगथे। सुरता म चुरत मन फुसुक फुसुक रो परथे। गोहार पार के रोए म ओकरे फधित्ता होही। बपरी ल कोनो पुछ परही त का बताही। फूफू ह अपन लालच बर सातो के मति बिगाड़े रिहीस। भार्इ-बहिनी अउ ननंद-भउजी के नता म जोझा पारे रिहीस। सातो ह मने मन अपन करम ल कोसत आजो तिजा लेवर्इया अगोरत हे।
 सातो ह नहां खोर के बिहनीया ले तियार होगे। अलवा जलवा मुड़ी कोरे लकर धकर नंदिया खड़ के पिपराही म आके बइठे हे। अवइया जवइया मन ल टुकुर देखत हे। भादो के महीना म नंदिया ह मुड़ भर बोहावत रिहीस। नंदिया नरवा ह कातको जोझा पारे तिजा मनर्इया मन तो जा के रही। देवता बरोबर डोंगहार ह सबे झन ल ए पार ले ओ पार नहकावत हे। बांस भर पानी म तउरत डोंगा म सवार तिझयारिन मन ल देख देख के सातो के मन निचट उदास होगे हे।
 पछतावा के आसु ले बोट बोटाय सातो के आखी म नंदिया के ओ छोर ले डोंगा चड़हत अपन भार्इ दिखीस। पिपराही ले रटपटा के उठीस अउ चुंदी मुड़ी ल संवारत नंदिया कोती दऊड़गे। सातो के हांसी खुसी के ठिकाना नइ हे। नंदिया के छोर म खड़े अपन भार्इ के अगोरा करत पउर साल के तिजा ल सोरियावत हे।
 सातो के दादा ह अपन बड़े बेटा पुनऊ ल किथे- सातो ल तिजा लाने बर आठे मान के चल देबे रे। आंहू किही त संग म लान लेबे। निंदर्इ कोड़र्इ के दिन घलो चलत हे। दमांद कर जादा जोर-जबरर्इ झन करबे। अब आज काल तो सब पोरा मान के आथे जाथे। नंदिया नरवा के कारो बार अगवाके रेंग जबे।
 उंचकहा मुंहा पुनऊ अधरसÍी सुनिस। आठे मान के कांहा आठे के एक दिन अगाहू रेंग गे। पुनऊ ल सातो घर जाय बर पुचपुचाए। बारी म बोवाए खीरा ल झोला भर टोरिस। करेला अउ डोड़का के एकक ठन मोटरी गठिया के निकलगेेे सातो घर जाए बर।
पुनऊ अउ सातो के नानपन के हांसी दिल्लगी ह बर बिहाव होय के बाद घलो नर्इ छुटे रिहीस। संगे बर बिहाव होइस संगे दोनो के गवन पठौनी होगे। सातो के ददा ह गांव के बड़का किसान रिहिस। घर म चिज बस कांही के खंगता नइ रिहीस। गांव म ऊंकरे सुती चले ते पाय के पुनऊ ह थोकिन अड़दली रिहीस।
 ददा ह जाय ल केहे हे किके बारी ले घर नइ अइस मोटरी धरे सोज सातो घर रेंग दिस। घर ले बता के जातिस त भउजी ह रोटी पीठा जोरतिस। ददा ह बारी म गोठियइस सातो घर जाबे किके। पुनऊ ह कोनो ल आरो करे बिगर मोटरी भर साग भाजी धरके निकलगे। पुनऊ ह पैडगरी रद्दा म अकेल्ला रेगंत झोला के खीरा ल खावत खावत जावत रिथे। नंदिया खड़ के पहुचत ले झोला ल अपने ह अधिया डरथे। सातो ल देहू किके आधा झोला खीरा ल बचाय घाट म पहुचे हे। किंजर किंजर के डोंगा देखत हे। काम कमर्इ के दिन म डाेंगा घलो कम चलत रिहीस। एके ठन डाेंगा वाला रिहीस। उहू ह वो पार खड़े रिहीस।
 कांहा डाेंगा अगोरत रइहा किके पुनऊ ह मुड़ भर बोहावत नंदिया ल तऊर के नाहक गे। दूनो हाथ म एकक ठन मोटरी ल धरे हे। खीरा के झोला ल टोटा म अरोय हे। पार म नाहक के सबो समान ल टमडि़स। करेला अउ डोड़का के मोटरी तो बने रिहीस फेर खीरा ह बोहा गे रिहीस। पुनऊ ह सालेच के झोला भर खीरा धरके निकलथे। कोनो साल अपने ह खाते खात सिरवा डरथे। त कोनो साल नंदिया म बोहा जथे। सातो ह करेला अउ डोड़कच पाथे।
 कच्चा-कच्चा कुरता ल पहिने पुनऊ ह सातो घर पहुचीस। भार्इ ल देखके सातो ह मगन होगे। लोटा भर पानी दिस अउ पावं परिस। सुख्खा गमछा म मुड़ी कान ल पोछीस। पुनऊ ह मोटरी ल लमावत किथे- येदे बहिनी करेला अउ डोड़का लाने हवं। सातो किथे- खीरा घलो तो फरे होही भार्इ। खीरा काबर नइ लानेस। अतका ल सुन के पुनऊ ह दुच्छा झोला ल लमा देथे। दुच्छा झोला ल देख के सबो झन कठल के हांसथे।
 अपन भार्इ के सुध म मगन हे सातो। खुशी के आसु ल पोछथे अउ हांसत हांसत किथे- यहू साल एको ठन नइ बचाय भार्इ। कइसे पुनऊ भार्इ कलेचुप काबर हस। जब आथस तब दुच्छा झोला देखाथस। कहां करथस मोर बाटा के खीरा ल। सातो के गोठ ल सुन के डोंगा ले उतरत अनगइहा सगा ह सातो ल किथे- कोन ल काहत हस वो। मै तो तोला नइ चिनहत हवं। अतका ल सुन के सातो के मन के भरम टुटगे। सातो ह अनचिनहार ल अपन भार्इ जान के गजब आस लगा डरे रिहीस। बपरी ह निरास होके आसु ल पोछत फेर पिपराही म लहुटगे।
 सातो के मन म का बितीस होही जब अनचिनहार ल भार्इ जान के मया लड़ावत रिहीस। उहू अनगइहा ह नइ चिनहवं कइ दिस। एक घांव बहिनी की देतीस त ओकर का बिगड़ जतीस। सातो अपन मन मढ़ावत किसमत ल कोसत हे। आखिर गलती तो ओकरो कोती ले होए हे। सबो बने बने चलत रिहीस। एक दिन अचानक सातो के ददा बितगे। ददा के बिते के पाछु पुनऊ ह बहिनी ल बेटी बरोबर मया दुलार करे। तिजा पोरा म पुछे-गउछे। भउजी घलो सातो ल नोनी ले आगु एक भाखा नइ बोलत रिहीस। आगु के आगु ओकर बर लुगरा पाटा लेवत रिहीस। इही बात ह पुनऊ के फूफू ल नइ सुहइस। पुनऊ करा अपन भार्इ के जहिजाद म हिसा मांगे बर आगे। पुनऊ मन एक भार्इ एक बहिनी हे ओइसने ओकर ददा मन घलो एक भाइ एक बहिनी रिहीस। झगरा लड़के फूफू ह अपन नता तो टोरिस संग म सातो ल घलो जुझो दिस।
 फूफू ह घेरी बेरी सातो घर जाके ओकर भउजी के लिगरी लगावत काहय- सातो तोर भउजी ह सबे चिज बस ल अपन मइके म लेग लेग के जोरत हे। तोर भाइ ह सिधवा हे अउ भउजी चाल बाज। चिज बस के राहत ले पुछत हे। सिरावन तो दे कुकुर नइ पुछे तोला। फूफू ह तो अपने घर के आए अउ भाउजी ह पर घर ले आए हे। इही सोच के सातो ह घलो फूफू के बात म आगे अउ जुरे पंचइत म बाटा बर खड़ा होगे।
 सातो मने मन गुनत हे। बाटा नइ मांगे रइतेवं त आज मोरो भार्इ लेगे बर आए रितीस। भउजी ह तिजा के जोरा करतिस। गुनते गुनत सातो ल पिपराही म बइठे बिहनीया ले संझा होगे रिहीस। सातो ह अपन मन ल मारत घर आए बर उठिस। रोनमुहा मु धरे घर जाना बनो नोहे किके सातो ह नंदिया के तिर म गिस। माड़ी भर म उतर के ठोमहा म पानी लेके मुह ल धोइस।
 नंदिया भीतर ले मुह धो के लहुटत रिहीस तभे सातो के पांव कुछु जिनीस अभरीस। हांथ ल बुड़ो के टमड़ीस त सातो ल दू ठन मोटरा मिलीस। मोटरा भीतर म करेला अउ डोड़का बंधाय रिहीस। दोनो मोटरा ल धर के सातो पार म आवत रिहीस तभे आगु म एक ठन दुच्छा झोना बोहावत रिहीस। दुच्छा झोला अउ मोटरी ल पाके सातो के खुसी के ठिकाना नइ रिहीस। भार्इ नइ अइस त का होगे। भार्इ के चिनहा ह आगे। मइके के सुरता म उदास मन ल मढ़ावत सातो ह अपन घर लहुटगे। मइके के सुरता देवावत दुच्छा झोला अउ मोटरी ल देख देखके सातो ह पोरा अउ तिजा मनइस।