21 Feb 2012

मेला ले लहुटती..... छेमाही कुंभ के सपना

   शरीर ल जेने चिज के जादा अटकर हो जथे तेकरेच टकराहा हो जथे। अब देखना जेठू ह पंदरा दिन ले रोज बंबूर कांटा म सुत-सुत के आदत बना डरे हे अब तो वोला खटिया-पिड़हा ह सुहाबे नइ करय। पलंग सुपेती अउ मखमल के दसना ल तो सपना म घलो नइ सोरियावय। जेठू ल तो कांटाच के सपना आथे बड़े-बड़े कांटा, छुरिया-छुरिया कांटा। कभु मोखला कांटा त कभु बोइर कांटा नाना परकार के कांटा। कांटा म उघरा सुते हे अउ देखइया मन के मनमाड़े भीड़ जुरियाय हे। कोनो दस के नोट कोनो बीस के नोट फेकत हे,बाई करा रपोटे के फुरसद नइ ये अतका पइसा फेकाय हे। पंदरा दिन के एके मेला म साल भर के रूपिया झोर डरेवं, अइसन-अइसन सपना आथे जेठू ल।
                 मेला-मड़ई म करतब करइया जेठू एकेच झन मनखे नोहय। उहा तो आनी-बनी के करतब बाज आथे। पेट बर का का करथे लोगन मन मानो दुनियां म अऊ कोनो कामे नइये इंकर बर। टेटकू ह तो अपन पुरा शरीर ल रेती म तोप ले रिहीस, मुड़ी भर दिखत रिहीस। अवइया-जवइया मन ल ए दाई..., ए ददा... किके चिल्लवे। एक ठी लुगरा ल बिछा दे रिहीस जेमा धरमी दयालू मन रूपिया पइसा दार चाउर डारे। जेमन के टुटहा शरीर हे तेमन अपन टुटहा-फुटहा शरीर ल देखाके मांगथे। जेकर शरीर पुरा साबूत हे तेनो अपन आधा शरीर ल रेती म तोप के मांगथे। येमन ल दूसर काम करे बर घलो नइ केहे सकन काबर कि सबो काम ल सबो आदमी नइ कर सकय। एक ठी मेला म तो कई किसम के काम करइया हे। जेठू अउ टेटकू तो छोटे मोटे उदिम ले पइसा कमाथे फेर उहा तो कई बड़े-बड़े फांदा बाज पइसा झोरथे। मेला म कमइया खवइया मन तो भगवान ले एकेच अरजी बिनती करत रिथे कि हे भगवान राजिम सही जगा-जगा सलाना या छेमाही कुंभ लगाय के सुरू करवा दे। छेमाही कुंभ के सपना वाजिब घलो हे काबर की शासन ह कुंभ बनाय के फार्मूला जानथे, वो चाहय तो बना भी सकथे।
ये सब बात के अजम मोला राजिम के मेला म होइस। कुलेश्वर महादेव के नाव से भराने वाला राजिम के मेला ह आजकल राजीव लोचन भगवान के नाम से राजिम कुंभ होगे हे। हर साल मांगही पुन्नी ले शिवरात्री तक पंदरा दिन के मेला रिथे। देस म पांचवा कुंभ के नाम से मसहूर राजिम म अब पंदरा दिन मेला देखइया के गजब आवा जाही लगे रिथे। सरकारी गाड़ी अउ आम आदमी के सोहलियत बर नंदिया भितरी सड़क बने हे। सड़क के तिरे-तिर आनी-बानी के दुकान लगे हे। दुकान म मेला घुमइया मन के भीड़। बाहिर ले आय साधु संत मन के डेरा। घरौधिया साधु मन सगा साधु के आवभगत म मगन। देवता म चड़ाय बर फूल पान अउ नरियर के दुकान। मीना बजार रइचुली डांस पार्टी मौत कुआं। गोदना वाली। जादूवाला। ओखरा जलेबी कुसियार। फुग्गा घुनघुना लइका खेलवना। सांस्कृतिक मंच म रात भर नाचा कुदा।
मेला दरस के बाद अब मेला आयोजन के दसकरम ल समझ लेथन। मेला मड़ई ले कतको झिन के आस्था जुरे रिथे ते पाय के धरम-करम के गोठ करना जादा फभित के लागथे। ताते तात म अभी के राजिम मेला ह पांचे साल म गजब प्रसिद्वी पाथे येकर कारन धरम अउ आस्था नोहय बल्की पर्यटन मंडल अउ संस्कृति विभाग के चरितर आय। पर्यटन मंडल ह अपने हाथ म अपने पीठ थपथपाय वाला काम करत हे। पहिली तो मेला के मुख्य बिंदु माने कुलेश्वर महादेव के संग छेड़छाड़ करिस। कुलेश्वर महादेव के नाम ले भरइया मेला ल राजीव लोचन के नाम कर दिस। राजनीतिक गोटी-बाजी खेलके देवता धामी म फुट करा दिस। प्रतिवर्ष लगने वाला पांचवा कुंभ बना दिस। सरकारी धन के उपयोग करके बाहिर ले साधु संत बलाइस अउ संत बिरादरी म घलो राजिम कुंभ ल मानता देवादिस। एक कोलिहा हुंआ-हुंआ ताहन सबो कोलिहा के हुंआ-हुंआ होगे। बड़े लट वाला ह पांचवा कुंभ किहीस ताहन छोटे चोटी वाला मन हुकारू भर दिस बनगे पांचवा कुंभ। येमा सबले साव रिहीस राजिम के रहवइया मन ओमन ल दोनो कोति ले फयदा हे, ओकरे राजिम ओकरे मेला।
                  वइसे तो धरम-करम म लाभ हानि के बात करना निच्चट उज्जट पना हो जही फेर जहां लाभे-लाभ हे उहा दू चार बात करे जा सकथे। पहिली तो एकर ले नवा राज छत्तीसगढ़ के नाव देस दुनियां म उजागर होइस, राजिम ह तीर्थ अऊ उजरइस। कई माइने म कुंभ के पदवी के हकदार घलो रिहीस जइसे कि त्रिवेणी संगम, प्रयागराज, प्राचीन मंदिर, राम वनगमन मार्ग। लागथे कुंभ बनाय बर अतके परमान के जरूवत परत होही तभे तो मेला ल कुंभ के दर्जा मिलगे।
                    बाकी जरूवत ल सरकारी रकम पुरा कर देथे जइसे बड़े-बड़े साधु संत (बड़े संत माने जेकर छै आगर छै कोरी चेला) ल बुलवाना, रहे-बसे अउ खाए पिये के बेवस्था करना। दुरिहा-दुरिहा ले आय लोगन बर नाचा गम्मत कराके मनोरंजन अउ हीहीभकभक करना। मनोरंजन भी अइसे की मंदिर देवाला ले जादा मंच म भीड़।
राजिम अवइया दर्शनार्थी मन ल पयर्टक के उपाधी मिलिस। वोमन दर्शन ले जादा अवलोकन करथे। एक आदमी ह देवता म फूलपान चढ़ाके पावं पलौटी परथे तव दूसर ह देव-धामी के मुर्तिकला अउ निर्माणकाल के संगे-संग देवता के लंबाई चौड़ाई अउ ऊचाई नापथे। अब इहा दर्शन अउ अवलोकन के मतलब तो मै खुदे नइ समझ पावथवं। खैर ये कुंभ तो सफल हे एमा दूमति नइहे, लेकिन ये सफलता ला अउ भुनाय जा सकथे।
                  इहां अऊ कतकोन देव-धामी के ठउर हे जिहां राजिम सहिक संगम, प्रयाग अउ प्राचीन मंदिर हे जिहां के मेला ल विकराल रूप देके कोसिस होना चाही। शिवरीनारायण,सोमनाथ,महादेव घाट, बोहरही मेला, तुरतुरिया, पीथमपुर, बानबरद, देव बलौदा, लोहरसी, तोलाघाट, अंगारमोती, कौहीमेला, डाही, सिंगारपरु जइसे कतको स्थान हे जिहां के मन सपना संजोय हे कि एक नजर हमरो कोति ल देख लेतिस। इही बहाना आदमी ह देव धामी ले जुरही। मानुख म आस्था जगाना हे तव हर साल का हर छै महिना म एक कुंभ हो जए। पर्यटक नइ आही तव कम से कम दर्शनार्थी तो आही। दर्शनार्थी घलो नइ आही तव लेवइया बेचइया तो आही। इही बहाना मेला ठेला के परसादे जिवका चलइया मनके घलो तरनतार हो जही। मेला उसले के बाद रोजी रोटी के संसो ले उबर जही। आज इहां तव काल उहां।

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