16 Jul 2012

रोग-राई हरे बर हरेली

खेती किसानी अउ बनि-भूति म रमे लोगन बर तिज-तिहार एक ठीन खुशी के ओढऱ भर नोहय बल्कि अइसन परब अउ रित रिवाज ह समाज म कोनो न कोनो किसम के संदेसा लानथे। मेहनत मजूरी म लगे लोगन ल वइसे बाहिर के दुनियां ले काहीं लेना-देना नइये अपन काम ले काम, अऊ खुशी मनाही तभो अपने मन मुताबिक। इही सेती किसनहा भुइयां छत्तीसगढ़ के सबो तिज तिहार कोनो न कोनो परकार ले खेती किसानी ले ही जूरे रिथे। छत्तीसगढ़ म असाढ़ के दूसर पाख ले पानी दमोरे के सुरू हो जथे, इहां के कतको लोगन मन गरमी के दिन म कन्हार ल अकरस जोतई कर डारथे। एक सरवर पानी परीस ताहन धान ल बो डरथे। अब मौसम के ऊंच निच के सेती बोवई कभू-कभू पिछड़ जथे। सावन तक एक्का दूक्का के छोड़े बोवई पूरा हो जथे। सावन के महीना किसान मन बर गजब खुशयाली लाथे। काबर कि पानी के टिपिर-टिपिर झड़ी संग तिहार ह घलो ओरी-ओरी ओरिया जथे। सबले पहिली आथे हरेली, येहा छत्तीगसढ़ के परमुख तिहार आय। किसान मन अपन नांगर बक्खर के पूजा करथे, लइका मन गेड़ी के मजा लेथे, गांव के सियानहा मन गांव के सुख समृद्धि बर डिह डोंगरी के देवता मन ल मनाथे। गांव के चरवाहा मन माल-मवेशी मन के बढ़वार अउ रोग-राई टारे बर दइहान म गरवा मन ल कंदइल(दवई) अउ लोंदी खवाथे। पाहटिया ह घरो-घर लीम के डारा खोचथे। तन मन ल निरोगी करे रखे म लीम के महत्ता ल तो डॉक्टर बईद सबो जानथे। जवान मन के झिमिर-झिमिर पानी म नरियर फेकउल। गेड़ी दउड़ अउ नरियर जीत। लोक परंपरा के धरोहर गठियाए सियन्हिन मन लइका सियान सबो पर रोटी-पीठा रांधथे अउ हरेली परब ल गजब हॉसी खुशी ले मनाथे।
सवनाही- सावन लगथे तव पहिली इतवार के गांव बनाय जाथे। गांव के सियान मन गांव के देवा धामी के ठऊर म जाथे अउ मानता अनुसार देव के मान गावन करथे। ये दिन गांव के बइगा संग सुजानी सियाने मन भर जाथे लइका मन ल ये कारज म नइ संघेरे। गांव म इतवार के पहिली गांव के सियान मन के गुड़ी म जुरियाथे। सवनाही रेंगाय बर बइगा ह चलागन अनुसार समान बताथे, गांव के मन बरार करके लानथे अउ शनिचरी रात म सवनाही रेंगाथे। असल म सवनाही गांव के देवी देवता अउ डीह डोंगरी के पूजन आय। गांव म जेन दिन गांव बनाथे वो दिन काम बुता के मनाही रिथे। गांव म जब तक पानी भरे अउ कचरा माटी फेके के हांका नइ होवे तब तक गंाव के कोनो ह कुआ बोरिंग ले पानी नइ भरे अउ न कोनो ह घर के कचरा ल घुरवा म फेकय। जब सबे देवी देवता म हूमन-धूपन मान-गवन हो जथे तेकर पाछू गांव के मन पानी भरथे अउ कचरा माटी फेकथे। ये दिन घर कुरिया अउ कोठार मन म गोबर के पुतरी बनाथे। सवनाही के बाद सावन महीना के इतवार भर गांव म काम-बूता बंद रिथे। समे के संग गांव के लोगन मन के विचार कतको बदलत हे तभो ले गांव म सावनाही, इतवारी तिहार के परंपरा चलते हावे अऊ चलते रही काबर की ये हमर पंरपरा के आरूग चिन्हा आय। लोगन के सोच ह अंधविस्वास अउ टोना-टोट्का ले छटियाके अब सिरिफ रीति-रिवाज अउ परंपरा के निर्वाह म लगे हे।
पशुधन के जतन- हरेली म माल-मवेशी मन के घलो बने जतन अउ हियाव करे जाथे। सावन म खेत-खार म कई किसम के नवा-नवा उपजे हरियर चारा गाय-गरवा अउ किसानी म काम करइया बइला-भइसा मन ल गजब सुहाथे। हरियर-हरियर कांदी अउ बन-बूटा ल ढिल्ला चरइया मवेशी म हरर-हरर खाथे। नवा उपजे इही चारा म कई किसिम के कीरा अउ रोग-राई संक्रमण वाला कांदी रिथे जेला पशुधन खा परथे। अइसन चारा चरे ले पशु मन म बीमारी फैले के डर रिथे। हरेली के दिन गांव के चरवाहा मन जोन कंदइल ल उसन के खवाथे वोहा गाय-गरवा मन बर औषधी के काम करथे, ओमन ल बरसात म होवइया संक्रमण ले बचाथे। अबके भासा म काहन त सामूहिक उपचार। जेन गरवा ह दइहान म नइ आवे तेकर बर किसान मन राउत करा ले दवई मांग के घर लेग के खवाथे, ताकी कोनो ह दवई खाय बर झन छूटे। चरवाहा मन ये कंदइल ल रात के उसनथे अउ बिहनिया ले दइहान के गरवा मन ल लोंदी संग खवाथे। लोंदी गहू पिसान के लोई आए जेमा थोर-थोर नून या बिगर नून वाला घलो बनाके खवाथे। चरवाहा मन दवई क पाछू कोनो रूपिया पइसा नइ लेवे। काठा-पइली धान अउ सेर सीथा भर लेथे। माल-मवेशी के जतका संसो घर गोइसया ल रिथे ओकते संसो पाहटिया ल घलो रिथे। गांव के लोगन मन अपन गाय-गरवा ल हियाव कर-करके सावन के रोग-राई ले बचाथे अउ अपन संगवारी मितान भाई बरोबर बइला-भइसा ल खवा पियाके हरेली तिहार ल जुरमिल के मनाथे।
कृषि औजार पूजा- खेती के काम अवइया नांगर, जुड़ा, कोपर, रापा, कुदारी, रपली, आरी, बसूला, सबरी, टंगिया ल सेकल के बढिय़ा धोथे मांचथे। कमई के दिन म जतका जी परान देके कमइया ह कमाथे ओतके भाव भक्ति ले अपन औजार के जतन घलो करथे। कोनो भी जिनिस होय बेरा-बेरा म ओकर देख-रेख अउ समे अुनसार जतनबे तव जादा दिन खटाथे। बनावटी तो सबो हे, सब बनावटी ल एक दिन खुवार होना हे। फेर जतन देबे त धिरलगहा खियाथे। गांव के सिधा-सादा मानुख ह जादा के तीन पांच ल नइ जाने अपन सरी विधी-विधान त परब बरोबर मानथे। सबो औजार ल धो मांज के एके जगा अंगना म मड़ाथे। चाउर पिसान ल घोर के सब हाथा देथे। बंदन के टीका लगाथे। चीला गुर के हूम-जग देथे। सबो परानी आरती उतारथे। भगवान ले बिनती करथे कि हे नांगर, हे जुड़ा, हे रपली कुदारी, हमन तुहरे परसादे बूता सिरजाथन। बने-बने सब काम बुलक जाए कोनो परकार के बाधा बिघन अउ अड़चन झन आए।
गेड़ी- हरेली ह किसान मन के तिहार आय त भला किसान के लइका मन कइसे तिहरहा मजा दे दूरिहा रही। ये दिन गेड़ी खाप के लइका मन गली खोर के चिखला माटी म चभरंग-चभरंग रेंगत रिथे। गेड़ी बांस के बनाय जाथे जेकर लंबाई चार हाथ ले बारा हाथ तक के घलो होथे। गेड़ी चघइया के सोहलित के मुताबिक गेड़ी बनाय जाथे, नान्हे लइका या नवसिखिया बर नानकुन अउ हूसियार लइका मन बारा-चौदह हाथ के गेड़ी के चड़थे। गेड़ी बनाय बर बॉस अउ बूच रस्सी के जरूरत होथे। पांव रखे बर पउवा ल बांस के बिचो-बिचो खिला म अटका के ओकर निचे नेकवा लगा के बूच के रस्सी से बाधे जाथे। गेड़ी चघईया मन गेड़ी म रेंगत खानी गेड़ी ले रचरिच-रचरिच आवाज निकाले बर बूच म अंडी या सरसो, माटी तेल डारथे, बिच म केश डारे ले घलो गेड़ी ले चमचमहा आवाज निकलथे। गेड़ी के बिसे अभी तक हमर अंचल म कोनो पौराणिक कथा या किवदंती तो सुनऊ म नइ आय हे। हरेली म गेड़ी के बनाय अउ गेड़ी रेंगे के पाछू कारण का होही ये मरम ल जानबो तव गजब अकन गोठ निकलथे। हरेली ह सावन के महीना म आथे। सावन झड़ी-पानी के दिन आय। पानी के सेती गांव के गली खोर म भारी गइरी माते रिथे जेती देखबे तेती माड़ी भर-भर चिखला भरे रिथे। गोड़ ल चिखला से बचाय बर गेड़ी चड़थे। बरसात म चिखला म कतकोन परकार के किरा-मकोरा अउ सांप-डेढ़ू रइथे। हरेली तिहार के ओखी सियान मन लइका मन चिखला-माटी ले बाचे के संदेसा देथे। गेड़ी ह केदवा अउ पानी-पानी म पांव कंदकंदाय ले बचाथे संगे-संग ये ह एक परकार के योग साधना घलो आय ऐकर से लइका मन पातर बांस म रेंग के शरीर के संतुलन बनाय के कलाकारी सिखथे। ऊंचहा बास म पांव मड़ाके जब लइका आगू डंगा फेरथे तव पूरा शरीर ह पउवा के थेभा पांव के काम करथे। गेड़ी रेंगइया मन बिगर कोनो सहारा रेंग जथे। गेड़ी बनाय के पाछू पौराणिक कथा-किवदंती नइ पायेन त का होगे, गेड़ी ह शरीर के संतुलन अउ पाव के संक्रमण के संगे-संग योग साधना, लइका मन ल आत्मविस्वासी बनाथे।

सावन संग आगे तिहार के झड़ी,
धोवव नांगर-बक्खर अउ म
व गेड़ी।
आगे हरेली... आगे हरेली।।

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (17-07-2012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. हरेली गिद के अंतरा हबे का जी

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