30 Apr 2014

अक्ति

छत्तीसगढ़ ह कृषि प्रधान अंचल आए। इही पाय के इहां के सबो परब-तिहार ह कोनो न कोनो रूप ले खेति-किसानी ले जूरे रिथे। बइसाख के अंजोरी के तिज म परब मनाथन अक्ति। अक्ति ह गांव के सियान बर जतके महत्ता के हाबे ओतकेच नान्हे लइका मन बर तको हाबे। बिजहा म फोकियावत जरई, प्रकृति के सेवा अउ बिहाव संस्कार के सरेखा। घर के डोकरी-डोकरा के सियानी पागा ल बांधे नान्हे लइका ह अपन संस्कृति ल कइसे सिखथे अक्ति के दिन परगट देखे बर मिलथे।


पुतरी-पुतरा के टिकावन परत हाबे
चुलमाटी,दतेला, बरात। नान्हे बाजा पालटी



















सुवासिन

 ग्राम देव के पूजा
ठाकुरदेव ह गांव के सबले बड़का देव आए। तेकरे सेती तो कोनो भी कारज होए सबले पहिली ठाकुरदेव के नाव सुमरथन। अक्ति के दिन ठाकुरदेव के मंदिर म गांव के लइका सियान जुरियाके पूजा-पाठ करथे अउ गांव खुसियाली के कामना करथे। संगे-संग गांव के अऊ आन देवधामी म तको किसान मन धान के दोना  चखाथे।
धान चघथे ठाकुरदेव म
गांव के किसान म ये दिन अपन-अपन घर ले डूमर पाना के दोना बनाके ओमा एक दोना धान भर के ठाकुरदेव म चघाथे। सबो किसान के घर ले धान के दोना आए के पाछू गांव के सियान अउ बइगा मन मिलके सबो के धान ल मिंझारथे। पैरा ल बेठ अइसन लपेट के काठा बनाथे। उही काठा म धान ल नापथे। नपाय धान ल फेर दोना-दोना भर के गांव किसान म अपन-अपन घर लेगत जाथे। मंगल कारज म डूमर के तको गजब महत्ता हाबे। बिहाव म मंगरोहन डूमर डारा के ही बनाये जाथे। जइसे कि धान ह किसान मन के बिजहा के काम आही तव काम ल सिद्ध पारे खातिर डूमर के पाना ले दोना बनाथे।
किसानी के बोहनी
बइगा हा काठा के धान ल उही मेर नेंगहा छित के नांगर तको चलाथे। गांव के सियान मन के चलाए परंपरा हा आजो चले आवत हाबे। किसान मन हर पूजा-पाठ होय के बाद ठाकुरदेव म चघे धान ल दोना म अपन घर लेगथे। उही धान ल किसान मन अपन बिजहा म मिंझारथे। उही धान ल जमो के तको देखथे। अइसे मानता हाबे के अइसन करे ले किसान के एको बीजा धान ह खइत नइ होवे। सबो बीजा म जरई आथे।
नवा करसा के पानी
अक्ति के दिन ले ही गांव के माईलोगन मन नवा करसा म पानी भरथे। किथे घलोक नारी-परानी मन हा कि करसा के पानी ह अक्ति के माने के बादे मिठाथे। इही पाय के नवा करसा म अक्ति के दिन ले ही पानी पिये के सुरू करथे।
मंदिर देवाला अउ पेड़-पौधा म पानी रूकोना
अक्ति के दिन गांव के लइका सियान मन करसा धर-धर के निकलथे अउ ओरी-ओरी गांव के सबो देव-धामी म पानी रूकोथे। गांव म जतेक भी पेड़-पौधा हे तेनो म पानी रूकोथे। छत्तीसगढ़ के संस्कृति म इही ह तो हमला सबले आन चिनहारी देवाथे। बइसाख के लाहकत घाम म रूख-राई म पानी रूकोना, कोना ल जीवन देके समान पुन आए। अक्ति ले सुरू ये परंपरा हा चलते रिथे, रूख-राई हरियाते रिथे। ये परंपरा ह एक डहर तो हमर देव-धामी के प्रति आस्था ल देखाथे ऊहें दूसर कोति हमर प्रकृति के खातिर परेम ल तको देखाथे। देव-धामी के आसिस के संगे-संग रूख-राई तको पावन पुरवाही संग अपन आसिस बगराथे।
पुतरी-पुतरा के बिहाव
अक्ति के दिन गांव के नाननान नोनी मन पुतरी-पुतरा के बिहाव रचाथे। नान्हे लइका मन माटी के पुतरी-पुतरा के बिहाव के सरी नेंग-जोंग ल करथे। मड़वा गड़ियाथे, मड़वा छाथे, तेल हरदी चुपरथे। सिरतोन के बिहाव बरोबर मंगल-उच्छाह ले लइका मन गीद तको गाथे। बरात निकालथे, टिकावन बइठारथे। सियान ल बिहाव म करत नेंग-जोंग ल लइका मन देखे रिथे वहू मन ओइसनेच करथे अपन पुतरी-पुतरा के बिहाव म। अक्ति के पुतरी-पुतरा के बिहाव ह ये सेती बड़ महत्ता के हाबे कि बिहाव के संस्कार ल लइका मन देख-देख के सिखथे। बिहाव के सबो नेंग-जोंग ल सीख के अपन पुतरी-पुतरा के बिहाव करत बखत ओला सुरता कर करके बिहाव संस्कार के सरेखा करथे। नोनी पिला मन तो पुतरी-पुतरा के बिहाव करथे फेर बाबू पिला मन तको ये खेल म पाछू नइ राहय। नेवता-हिकारी, गवइ-बजई अउ समान के जोखा करे के काम ल बाबू पिला मन करथे। इही पाय के अक्ति के पुतरी-पुतरा के बिहाव ह खेल नहीं बल्कि सिरतोन के बिहाव लागथे।
अक्ति के बिहाव लगिन 
अक्ति के दिन बिहाव के लगिन तको विशेष रिथे। कतको दाई-ददा मन अपन लोग-लइका के बिहाव बर इही लगिन के अगोरा करथे। दिन बादर ल बने जोंग के अक्ति भावंर ल बने मानथे। छत्तीसगढ़ म अक्ति के दिन गजब बिहाव होथे।

2 comments:

  1. बहुत बढ़िया फोटो अउ लेख

    ReplyDelete
  2. पंदऊली खातिर आप सब के धन्यवाद। फेर मिलबो नवा लेख के संग जय छत्तीसगढ़, जय छत्तीसगढ़ी, जय छत्तीसगढ़िया ....

    ReplyDelete