13 Jun 2018

निबंध - छत्तीसगढ़ में कृषि संस्कृति


छत्तीसगढ़ ह एक कृषि प्रधान अंचल आए, इहां के एक तिहाई लोगन मन सिरिफ खेती म निर्भर हावय। खेती ह तइहा ले अब तक छत्तीसगढ़ के आर्थिक विकास के प्रमुख साधन रेहे हावय। कृषि संस्कृति के विकास इहां तभे ले होय हाबे जब लोगन खाये के जिनिस ल गड्डा म गड़िया के बोवय। अउ फेर धीरे-धीरे ओमन देखिन के बीजा ले पौधा बनथे तव उंकर मति ह उही कोति लामिस, अपन निस्तार खातिर खाद्यान्न उपजाए के उदीम उंखर भीतर पनपे लागिस। आदिम संस्कृति ले अब समय के संग धीरे-धीरे खेती ह व्यवसाय के रूप लेवत आज प्रदेश के आर्थिक विकास म मजबूती देवत खड़े हावय। अब तो ये बात ल छत्तीसगढ़ ले सात समुंदर पार के मानखे मन तको मानथे के वाकई 'छत्तीसगढ़ धान के कटोरा' आए। इहां सबले ज्यादा धान के पैदावार होय के साथ सबले ज्यादा धान के किस्म तको इंहचे देखे बर मिलथे।

कृषि भूमि अउ फसल- छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग म प्रमुख रूप ले धान, गहू, चना, मटर, सरसो, अरहर, सोयाबीन अउ तिवरा जइसन फसल के खेती होथे अउ पहाड़ी, उत्तरी पठार अंचल म लोगन मन प्राकृतिक रूप ले उपजे पेड़ पौधा उपर निरभर रिथे। जइसन इहां के मैदानी भाग म खेती के लायक समतल जमीन हावय वइसन पठार अउ पहाड़ी अंचल म कम हावय, जेकर कना समतल जमीन नइये ओमन फल अउ औषधी कंदमूल के खेती करके अपन जीवका चलाथे। कुछ अंचल म प्रशासन के प्रोत्साहन ले गांव के युवा मन उन्नत खेती ल अपनावत हावय अउ कम रकबा म बागवानी खेती करत हावय।धीरे-धीरे उहू कोति कृषि के विस्तार होवत हाबे अउ लोगन मन व्यवसायिक रूप ले, खेती ल अपन जीवकोपार्जन के जरिया बनावत, जांगर टोर मेहनत करत हाबे। 
सिचाई प्रबंधन- छत्तीसगढ़ अंचल में आज भी सर्वाधिक किसान मन भगवान भरोसा खेती करथे, माने उंकर कना पानी के साधन नइये, बरसात होथे तव उंकर खेत म अन्न उपजथे। इही पाके साल म एकेच फसल लेथे, बने पाग रेहे म कभू-कभू ओनहारी आगे तव दूसर फसल के जोंगथे। ये काहन के छत्तीसगढ़ म पारंपरिक रूप ले जेन किसान मन खेती करत हाबे ओमन खरीफ के मौसम म धान के खेती करथे अउ उहीच नमी म गहूं या फेर दलहन, तिलहन के खेती करथे जेन अढ़ाई ले दू महीना के होथे। पारंपरिक ल छोड़के वर्तमान म देखे जाए तव कुछ अंचल म बांध बनाके नहर के मांध्यम ले खेत म पानी पहुंचाये जात हावय त कुछ किसान जेन मन आर्थिक रूप ले संपन्न हावय ओमन खेत म कुंआ, तरिया, बोर तको खाने रिथे खेत पानी पलोय बर फेर यहू तो बरसा उपर ही निर्भर रहिथे। बरसात खतम होये के बाद किसान मन बाकी समय ल खेत के तियारी म लगाथे। छै महीना के खेती बर छै महीना के तियारी ह किसान मनके पैदावार म उरवती के रूप दिखथे।

खेती के नवा दिन- छत्तीसगढ़ परब तिहार वाले प्रदेश आए इही सेती, इहां के सबोच बिसेस काम के पीछू कोनो न कोनो पारंपरिक, धार्मिक अउ अध्यात्मिक विधान के प्रचलन देखे बर मिलथे। जइसे इहां के किसान मनके नवा दिन सुरू होथे अक्ती ले। अक्ती के दिन जोन पुतरी-पुतरा के बिहाव होथे तेन तो अलगे हावय, येकर अलावा गांव म जेन नाउ, धोबी, पाहटिया, बइगा अउ सौंजिया लगे रिथे तेन मन अपन मालिक ठाकुर घर ले मेहनताना पाथे। अक्ती के दिन ही कतकोन मन मालिक घर के काम ल छोड़थे तव कतको मन आन सौंजिया तको लगाथे। इहां मेहनत के सम्मान होते तेन पाके नौकर जइसन शब्द के उपयोग नइ होवय मालिक ठाकुर मन सौंजिया या फेर कमइया कहिके संबोधित करथे अउ जब उकर चुकारा के दिन आथे तव तय मुताबिक अनाज दिये जाथे। छत्तीसगढ़ म सौंजिया मनला रूपिया म नहीं बल्कि धान म लगाये जाथे। अइसने नाउ, धोबी, राउत, बइगा उक मनके तको सालाना तय रिथे, धान ह, जोन पइली काठा, ओ मुताबिक गांव के सबो घर ले देना रिथे। अक्ती के दिन ही गांव के किसान ठाकुर देवता म धान के बीजा ल डूमर पाना के दोना म चड़ाथे। जेला गांव के बइगा ह नेंगहा खेत म बो के जोतई करथे, बांचे धान ल किसान मन ल फेर दोना दोना बांट देथे। इही बीज ल किसान मन प्रमाणित बिजहा मानथे अउ जमो के राखे रिथे।
खेती के तइयारी- किसान मन कभू ठलहा नइ राहय। असाढ़ अउ अवइया बरसा के अगोरा करत किसान मन जेठ अउ बइसाख के महीना म खेत के जेन भी काम बांचे रिथे तेन ल उरकाथे जइसे के कोनो खेत ल चतवार के बरोबर करना हे, मेड़ सिरजाना हावय। बिड़ा बांधे खातिर पैरा डोरी बरई, खचका डबरा पाटना, कांटा बिनना, खातू पालना, नांगर खापना आदि।
घुरूवा खातु के महत्ता- छत्तीसगढ़ म पारंपरिक रूप ले जोन खेती करथे किसान मन ओ बहुतेच लाभकारी हावय, जइसे पारंपरिक खाद के उपयोग ह फसल के पैदावार तो बड़ाबे करथे येकर अलावा खेत के उर्वरा क्षमता ल तको बड़ाथे। येकर से जोन अन्न उपजथे वोहा गजब पौष्टिक होथे अउ डाक्टर मन तको तो रासायनिक के बजाय जैविक खाद ले उपजे सब्जी खाए के सलाह देथे। पारंपारिक खाद बनथे कइसे अउ काबर गांव म किसान मन घरोघर तइयार करथे येला देखबे तो अतका साहज हावय के बिगर कोनो विशेष लागत के घर म ये तइयार होथे। किसान मन के घर माल मवेशी होबे करथे, धान के पैरा होथे, चुल्हा के राख निकलथे। इही सब ल फेके खातिर एक ठिन गड्डा खाने रिथे जेन ल घुरूवा किथे। घुरूवा म कोठा के कचरा, जेन म पैरा के अलावा मवेशी मनके मल-मूत्र तको रिथे। घर म चुल्हा के राख निकलथे तेनो ल घर के नारी परानी या सौंजिया मन ह गांव गली म नइ फेके, ओला सकेल के घुरूवा म डारथे। घुरूवा भरे के बाद ओमा पानी डारके माटी म तोप देथे, जेठ-बइसाख के आवत तक बर। जइसे ही खातू पाले के दिन आथे किसान मन गाड़ा बइला म जोर के खेत म बगरा आथे। गांव म स्वच्छता के ये घुरूवा ह जबर उदाहरण आए कि वो समे म तको हमर छत्तीसगढ़ म गांव के किसान मन कचरा फेके बर एक गड्डा के उपयोग करत रिहिन हाबे, आजो करथे। आधुनिकता के दौर म कचरा के निस्पादन अउ ओकर सार्थक उपयोग घुरूवा खाद के रूप म करना ये छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति के देन आए।

खेती म अधिया, रेगहा अउ सापर- छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति म आपसी भाई चारा तको गजब देखे बर मिलथे। जइसे कोनो किसान ह सवांगे अपन खेती ल नइ कमा सकत हावय तव ओहा आन किसान ल अधिया या फेर रेगहा म दे देथे। अधिया माने ओ खेत म जतेक भी पैदावार होही, दूनो के आधी-आधी अउ रेगहा माने किसान ह आगू ले आठ बोरा दस बोरा अइसे चक अनुसार करार करे रही ओतका देना परही। अउ जेन किसान मन आपस म जुरमिल के काम ल उरकाथे माने दू-तीन किसान मिलगे सझा रूप ले खेती करथे ओला सापर कथे। सापर म एक दूसर के काम उरकाना रथे बिगर कोनो मेहनताना के।
बनिहार- गांव म तो सिरिफ किसानी बुता होथे तव जेखर घर खेती नइये तेन का करत होही यहू बात मन म आथे। तव खेती ह अइसन बुता आये के एकेच झिन के बुती नइ सिरजय, बनिहार भुतिहार के जरूरत परबे करथे। जेकर घर खेती नइये तेन मन आन घर बनि कमाय बर जाथे। गांव म वइसे भी जात समाज के अनुसार काम सबो बर सपुरन रिथे। जेन मन अपन पुरखौती पारंपरिक बुता ल नइ करे ओमन खेती किसानी कमाथे। 
दिगर समाज के सहयोग- किसानी के अलावा गांव म पारंपरिक पुरखौती बुता करइया मन जइसे के लोहार ह किसान बर नांगर के लोहा, गाड़ा के पट्टा, रापा, कुदारी, हसिंया बनाथे तव बढ़ई ह नांगर, जूड़़ा, चक्का के संगे-संग गाड़ा बनाये के काम ल करथे। कुम्हरा मन माटी के जिनिस बनाथे जइसे बर्तन भड़वा जेमा साग, भात रांधे के अलावा दूध, दही, मही धरे के मैइरसा अउ पानी बर करसा उक बनाके किसान घर अमराथे। अइसने गांव म लगे नाउ मन तको किसान मनके सावर बनाये खातिर खेत म बियारी के बेरा जाथे। नांगर जोतत बखत किसान के गोड़ म कांटा ठेसा के टूट जथे तेने ह हेरवाय बर नाउ मन कना जाथे।

पारंपरिक खेती म वैज्ञानिकता- छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति म गजब वैज्ञानिक आधार घलोक देखे बर मिलथे जेकर कृषि वैज्ञानिक मन सवांगे बढ़ई करत नइ थकय। बरसात के पहिली माने जब पहिली खरीफ के नमी रइथे तभेच एक पइत जोतई करके छोड़ देथे। माने अकरस जोतर्इ् करथे इही ल वैज्ञानिक मन प्री मानसून के प्राथमिक जोताई किथे। अइसन करे ले खेत के जोन कीरा-मकोरा अउ दूबी बन रिथे तेन म उफला के उपर आ जथे अउ बइसाख के घाम म भूंजा के मर जथे। छत्तीसगढ़ म किसान मन नांगर ले खेत के जोताई करथे तेन पाके माटी ह बने भरभरा जाए रिथे। कन्हार ले जदा मटासी ल जोताई के जरूरत परथे। कन्हार माटी ह कम पानी म जोतत बन जथे तेन पाके खुर्रा जोतई बने होथे काबर के जदा पानी म भुइंया लटलटा जथे।
कोंटा कोड़ना- खेती के दिन म लइका मन के मुंह ले अक्सर सुने बर मिलथे कि कोंटा कोड़े बर जानथन। खेत के जोताई नांगर म होय रिथे, नांगर ह गोलाकार रेंगथे तेन पाके खेत के कोंटा ह छु जाये रिथे। इहीं छूटे कोंटा म धान छितके कुदारी म कोड़ के बोए जाथे। 
मुंही- खेत के मेड़ म कोनो अइसन जगह जिहा ले आन खेत म पानी उतर सके ओ ठउर ल निकासी खातिर छोड़े रिथे। मेड़ के फुटे इही पानी आए जाए के ठउर ल मुंही कथे। मुंही ल बोवई के बखत बांध के राखथे अउ जब पानी जादा हो जथे तव फोर के बाहिर निकाले जाथे।

निंदई अउ बियासी- बोवई के बाद निंदई कोड़ई के दिन आथे। काबर के हमर इहां बोता पद्धति ले जादा खेती होथे माने बरसात म पानी के गिरे ले खेत ल एक पइत जोत के धान ल छिड़क के फेर नांगर म बो देथे। इही म रोपा पद्धति तको होथे जेन म एक ठी खेत म धान के नर्सरी तइयार करके 20 दिन बाद ओला खेत म लगाये जाथे। रोपा लगाये के पहिली खेत म कोपर तको चलाये जाथे जेकर ले खेत म पहिली ले उपजे दूबी बन मन माटी म दब जथे अउ खेत ह तको बरोबर दिखथे। रोपा म अब कतार बोनी तको सुरू होगे हावय अउ येमा बियासी करे के तको जरूरत नइ परय काबर के ओला नर्सरी ले उखान के खेत म लगाये रिथे। जेन किसान बोता पद्धति ले धान बोथे ओमन ल बियासी करे के जरूरत परथे। बियासी मने धान बोवाय खेत म नांगर चलाना। बियासी म छोटे नास के नागर के उपयोग करे जाथे जेकर ले धान के जर मन टूटे नहीं, बियासी बर पानी घातेच जरूरी रिथे।
खुमरी अउ मोरा- पानी बादर ले बांचे बर खेत कइमया मन कमरा खुमरी अउ मोरा के उपयोग करथे। खुमरी ह बांस के बने होथे जेकर उपर म प्लास्टिक झिल्ली छवाय रिथे। किसान मन के मुड़ बुलकउ डोरी फंसे रिथे जेकर से आसानी ले किसान के मुड़ म माड़े रिथे अउ काम तको चलत रिथे। अइसने खेत निंदइया बनिहारिन मन मोरा ओड़हे रिथे। खेती के दिन म उपर चक म नांगर के पड़की थामहे नंगरिहा अउ खाल्हे चक ले बनिहारिन के ददरिया के सवाल जवाब के ओड़र ह कड़कत बिजली म जीवरा नइ डराय, ये संस्कृति आए छत्तीसगढ़ के।
कृषि औजार के पूजा- इहां के कृषि संस्कृति म कृषि औजार के रखरखाव अउ जतन ह एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप म होथे जेन ल हरेली के रूप म जानथ। हरेली ह किसान मन बर सबले प्रमुख अउ बड़का तिहार आए। ये दिन कृषि औजार जइसे नागर, जूड़ा, रापा, कुदारी आदि मनके साफ सफाई करे जाथे, उंकर पूजा होथे। पिसान के हांथा देके बंदन के तिलक लगाथे, चीला चघाथे। जेन नांगर मन के काम उरक जाथे तेन ल परवा म जतन के राख देथे। इही दिन कृषि काम के अलाव आन मावेशी मन ल तको रोग राई ले बचाये खातिर गंवखरा दवई खवाये जाथे। अइसने पोरा म नंदिया बइला के पूजा ह मेहनत कस किसान ल धर्म ले जोरे राखे के संगे संग अपन खेती के संगवारी, माने बइला भइसा के जतन करे के तको सीख देथे।
रखवार- गांव म खेती ल देखबे तव सबेच के खेत ह खुल्ला रिथे फेर काकरो खेत म मावेशी मन खुरखुंद नइ मतावे येकर कारण ये रिथे के गांव म गाय चरवाहा लगे रिथे जेन ह गांव भर के गाय गरवा ल सकेल के कृषि भूमि ले दुरिहा चरावत रिथे। कतकोन गांव के किसान मन रखवार लगाये रिथे जेन ह खार म किंजरत रिथे अउ काकरो गाय ह खेत म चरत मिल जथे तव घर गोसइया ल हियाव करथे के अपन गरवा ल बांध के राखय। घेरी-बेरी के पकड़ाये ले काठा पइली डांढ तको बांधे रिथे। इही पाके खेती के दिन म गरवा मन ल ढिल्ला नइ छोड़य।
भंदई अउ अकतरिया- खेत बुता करइया मन खार म हरर्स भरर्स रेंगत रइथे बेरा कुबेरा। इही पाके ओमन बर गांव के मेहर ह पनही बनाथे जेन ह अतेक मजबूत रिथे के कांटा खूंटी कांच अउ लोहा ले तको फरक नइ परय। ये पनही मन ह चमड़ा ले बने रिथे, पुरूष मनके ल भंदई अउ माई लोगिन मनके ल अकतरिया किथे। 
नाहना- गांव के मेहर मन किसान मन बर खास मजबूती वाला पनही के संगे संग नांगर बर नाहना तको बनाथे। चमड़ा के बने नाहना ह नांगर के डाड़ी अउ जूड़ा ल जोड़े के काम करथे। अइसने मजबूत चमड़ा के बइला गाड़ी के नाहना तको बने रिथे, गाड़ा म कतको भरती भर ले बइला ह तिरत ले हकर रही फेर मेहर के बनाये नाहना नइ टूटे, ये कृषि संस्कृति म इमानदारी के प्रत्यक्ष नमूना आए।

बियारा बुता- धान के फसल ह तीन महीना बाद पाके ल धर लेथे। तव किसान मन ओकर लुवई करे के पहिली राखे के ठउर तियार करथे, माने बियारा ल सिद्ध पारथे। चतवार के कांटा छरपथे, भाड़ी रुंधथे, राचड़ ल बने करथे। गोबर ले बियारा ल लिपे रिथे काबर के उहचे, खेत ले धान आना हावय। बाली ह टूट के गिरे ले उठावत बन जावय अतेक पान सफई होना चाही। येती जब धान ह पक के तइयार होथे तव लोहार कना ले हंसिया पंजवा के लानथे अउ देवधामी ल सुमर के खेत म हंसिया गिराथे।
लुवई अउ बोझा डोहरइ- लुवई के बाद जब धान के करपा कर्रा जथे तव ओला पैरा के डोरी म बिड़ा बांध के गाड़ा म भर के बियारा तक लाये जाथे। येमा समय के थोरको चूक होय ले नकसानी होथे तेन पाके किसान मन बेरा म सबो काम ल सिद्ध पारथे। जइसे लुवई अउ करपा उठई म देरी करे ले बाली ह खेते म गिरे के डर रिथे। कचलोइहा लुवे ले धान ह मोटबदरा हो जथे। किसान के परिवार म सबो काम म लगे रिथे सियनहा मन करपा ल बिड़ा बांधके राखथे, लइका मन सिला बिनथे, सियनहिन मन मुड़ म बोह के गांड़ा म अमराथे, खेत दूरिहा रेहे म दोहरा भारा तको डोहारथे। कावर अउ सूल म दूनों कोति बिड़ा फांस के तको डोहारे जाथे। 
बड़होना पुदकना- आखरी खेत म लुवई के दिन एक कोन्टा म लइका मन बर बड़होना छोड़े जाथे जेन ल लइका मन पुदकथे अउ ओकर मुर्रा बिसाथे। बड़होथे तेन दिन सबोच ल खुशी होथे, लइका मन ल धान मिलथे जेकर ओमन मुर्रा बिसाके खाथे अउ सियान मन ये पाके मगन रिथे के खेत म बगरे लछमी ह अब सकलागे।
सिला बिनना- लुवाये धान के करपा ल जब बिड़ा बांधथे तव बाली ह टूट के गिर जथे, उठाके गाड़ी तक डोहारे म तको गिरत जाथे। बियारा ह दूरिहा म रेहे ले धान के बाली गिरत गिरत आथे। इही गिरे धान के बाली मन ल सिला कथे जेना घर के लइका उक मन बिनथे।

मिंजई- बखत म बरसा होय ले फसल बने उतरथे फेर एमा देखरेख अउ सूझबूझ तको घातेच जरूरी होथे। बियारा म राखे खरही ल अइसे तरीका ले रखे जाथे के ओमा कतको पानी परै धान खराब नइ होवय। वइसे धान के खरही ल किसान मन जादा दिन बर नइ बनावे, सबो चक के धान ल सकेले के बाद बेलन म मिंचई सुरू कर देते थे। बेलन के मिंजई ह बने तको होथे काबर के पैरा ह बने मर्रा जथे जेला माल मवेशी मन चाव से खाथे। बेलन म मिंजई करत बखत कलारी ले पैर ल कोड़ा दे बर परथे, माने तरि के ल उपर करना होथे। मिजंई ह रात रात ले चलथे, बेलन चड़े-चड़े आनी बानी के ददरिया तको सुने बर मिलथे। अधरतिहा ले बेलन चले के बाद जब धान के बाली पूरा झर जथे तब बड़े फजर ले अलहोर के पैरा ल अलग करके सकेलथे। आधा पेरउसी तो दतारी म अलहोरे ले अलगा जथे ताहन बियारा म अंगाकर रोटी ल अमटाहा मुरई संग खाके धान ओसाई के काम रिथे। जड़काला के दिन तको आ जाए रिथे तेन पाके बुता बने उसरथे। धान ले कटकरा बदरा ल ओसा के सफा धान ल कोठी म भरके राख दिये जाथे।
बेलन- बेलन जइसे कि शब्द ले ही ओकर स्वरूप के पता चलत हावय बेलनाकार। धान मिंजे खाजिर किसान मन रोटहा पेड़ के तना न काट के गोल छोले रिथे। दूनो छोर म लोहा के पट्टा लगाके उपर म बइठक बनाये रिथे। ये बइठक के उपयोग बियासी के बखत कोपर के रूप म तको होथे। बेलन ल गाड़ा अउ नांगर सहिक बइला मन तिरथे। धान मिंजई म गाड़ा, छाकड़ा के तको उपयोग होथे।
धान के नाप- गांव म अइसन किसान जेकर घर के धान चाउर ह बच्छर भर नइ पूरे ओमन आन घर बाड़ही मांगे रिथे, माने उधारी म धान ले रिथे के मोर धान होही तहान लहूटा देहू। ओमन धन ल नाप के लहुटाथे। इहा धान के नाप काठा म होथे। हमर छत्तीसगढ़ म तउल के हिसाब किताब करे के परंपरा इतिहास म नइ दिखे इहां के सियान मन तइहा ले काठा नाप करत आवथे। अब के मुताबिक कइबे तव लगभग तीन किलो के एक काठा होथे। अइसने 20 काठा ल एक खाड़ी, 25 खाड़ी ल एक गाड़ा केहे जाथे। अइसने गिनती के हिसाब ल कोरी म रखथे जेमा 20 ठिन के एक कोरी होथे।
अइसन हवय हमर छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति जेन ल विज्ञान संग संघेरबे तव ओमा वैज्ञानिक तथ्य दिखथे। धर्म संग जोड़ के देखे म मानवता अउ भाईचारा दिखथे। प्रकृति संग जोड़बे तव पशु बर प्रेम के व्यवहार नता मितानी, रूख-राई, नदिया-नरवा अउ जल, जंगल, जमीन के सरंक्षण बर न जाने कतको पीढ़ी माटी म मिले होही।
0 जयंत साहू,
डूण्डा रायपुर छत्तीसगढ़ 492015
मोबाइल- 9826753304
ईमेल- jayantsahu9@gmail.com

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (15-06-2018) को "लोकतन्त्र में लोग" (चर्चा अंक-3002) (चर्चा अंक 2731) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आदरणीय डॉ. रूपचंद शास्त्री 'मयंक' सर, मेरे पोस्ट को चर्चामंच में शामिल करने के लिये आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। दिल की अनंत गहराइयों से आभार...

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