आरबीआई देव! हमु ला 'जियो'


नोटबंदी के बाद ले चारो मुड़ा इहिच गोठ सबोच के मॅुह म। अब का होही भाई समारू, कइसे करबोन ग बुधारू? जेन कभु टीबी, रेडियो अउ पेपर ले दुरिहा हावय तेने मन रई-रई के आरो लेवत रिथे। अऊ कोनो नवा खबर आगे का रे तिहारू? दसरू हर समारू, बुधारू अउ तिहारू सहिक छोटे पोटा के नइये। छाती फूलोवत किथे- जेन गड़ौना मन गड़िया-गड़िया के राखे हावय तेन मन फिकर करय। मुरहा-पोट्टा कना पइसच नइये तव फिकर काके! धरे हाबन तेन हमर कमई के पइसा आए। आयकर ल सबूत जाही तव गरीब मजदूर मनके ओनहा ल संझाकुन निचो के देख लेही। चेंदरा ले अतका पछिना चुचवाही के धनाहरी-पेटकाप्टी मन बूड़ मरही। मोदी के एक बात अऊ बड़ निक लागिस। ओमन अपन सबो मंत्री मनके खाता के जानकारी मांगे हावय। मंत्री का कका, सबो सरकारी अफसर-कर्मचारी मनके खाता के जांच होवय। गरीब के हक मार-मार के अपन म भोभस भरे हावय।
होये के रिहिस तने होगे। आगू अवइया दिन म का होही येकर गुनान करे जाय तव अब सबके हाथ म एकक मोबाइल होना घातेच जरूरी होही। वहू म इंटरनेट डाटा राहय। सरी कामकाज नेट बैंकिंग ले होही। थइला अउ घर नगद रूपिया रखना नइये। हमर बैंक खाता म पइसा माढ़ेच-माढ़े लेन-देन चलत रइही। ताजा खबर के मुताबिक अब मोबाइल, बैंक एप, पेटीएम, एसएमएस, के झंझट तको करे बर नइ लागय। चेक, डीडी, एटीएम, क्रेडिट, डेबिड कार्ड कुछूच नइ लागय। अब तो आधार नंबर ले लेन-देन के उदीम करे के जोंगत हावय सरकार। माने बइठे-बइठे देखव तमासा, आगे-आगे होता है क्या-क्या।


बड़हर मन तो सबला आसानी ले कर लेही, बीच वाले मन तको धीरे-धीरे लाइन म आ जही। लेकिन फदक जही अनपढ़ गरीबहा मन। नतो मोबाइल जाने, न इंटरनेट। कइसे कैशलेस होही? मोबाइल अउ नेट डाटा कोन देही? सबले मुस्कुल तो डोकरी दाई अउ बबा के होही। आज समाज म भरोसा के आदमी घलोक तो नइये। जेने ल नंबर देबे तेने दूनंबरी कर देही तव। अम्मट ले निकल के चूररूक म परउल हो जही। नोटबंदी के फैसला के बाद ले आरबीआई ह कोनो कोती बाढ़ तव कोनो कोती सुक्खा के हालात बना दे हावय। उपराहा म आयकर ह लिमिट-लिमिट करत हावय तभो ले बैंक अउ एटीएम नो कैश के बोर्ड चिपकाये बइठे हाबे। बैंक के बाबू मन आगू एसी म माछी मारत राहय तेन मन उवत के बुढ़त कमावत खाताधारी मनला कोसत रइथे। करे कोनो अऊ, भरे कोनो अऊ।  10 प्रतिशत गद्दार के भगुतना ल 90 प्रतिशत वफादार मन भुगतत हावय। तभो ले गम नइये। कम से कम दूनंबरी करइया मनतो चेतही। चलव इही ओढ़र म डिजिटल हो जबो हम सब। अबही के बखत ल देखत रिलाइंस के जियो वाले मनके तको गुनगान करे बर परही काबर के अभी ऊंकरे डाबा भरे हावय। दुनिया ल काहत हावय जियो डिजिटल इंडिया, न गोठबात के पइसा न इंटरनेट के। फोकट म अनलिमिटेड 4 जी डेटा रिलाइंस वाले मन अपन जियो सिम म देवत हावय। आगू 31 दिसंबर के बंद ले होवइया रिहिसे फेर अब मार्च तक बाढ़गे। ठट्ठा करे के बेरा नइये नइते आरबीआई अउ आयकर देवता मन सो बिनती करत पहिली इही मांगतेन के अब 4 जी मोबाइल अउ जियो सिम कार्ड दे देवा...।




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बिसरगे सुरता अदला-बदली ले निस्तार के

बिसरगे सुरता अदला-बदली ले निस्तार के : वस्तु विनिमय (barter)

तीस बछर पहिली हमर गांव म एक झिन नून बेचइया डोकरा आवय। बइलागाड़ी म एक गाड़ी नून धरके। ओकर डोकरी ह गाड़ी खेदत राहय अउ डोकरा हा गली म ऑक पारय- 'नून लेलव नून... एक काठा धान के दू काठा नून हो...।' ओकर आरो पाके गांव के सियानिन दाई मन टोकनी-टोकनी धान ल धरके घर ले निकलय अउ नून के बदला म धान ल देवय। नूनवाला डोकरा ह हमर गांव म महीना-पंदराही आवय। हमरे तिर-तखार के गांव मन ओकर गवई रिहिसे। नून बेचई म डोकरा के पूरा परिवार लगे राहय। कभू-कभू हाट-बजार म तको ओकर आरो मिलय-'नून लेलव नून... एक काठा धान के दू काठा नून हो...।'
अबही असन तइहा के सियान मन नोट के गठरी धरे बजार नइ जावत रिहिसे। अऊ आन-तान खरचा तको तो नइ रिहिस हावय। कुछू भी जिनिस लेना राहय तव सबेच ह धान-पान के बदली म मिल जाए। सियान बबा के थइला म पइसा देखेच नइ रेहेन। तभो ले नानपन म घर म सबोच सुख ल देखे हावन। चांउर-दार, तेल-हरदी, धनिया-मिर्चा, हरियर साग के दिन म हरियर-हरियर भाजी, अड़हा दिन बर खुला-सुक्सा। अमली, आम, आलू, भाठा, रमकेलिया, पताल के खुला, सुक्सा म चिवरा, चना, चनौरी मिलय। अब रइगे बात नून अउ गुर के तव नून ल जइसे नूनवाला डोकरा कना बिसावय धान के बदला म ओइसने छिंदी (सिंधी) दुकान म गुर तको धान के बदली म मिलय। तेल म भुंजे-बघारे वाला साग कमेच चुरय हालाकि हमर घर घानी तको रिहिसे, हाना तको किथे न 'तेली घर तेल रही त माहल ल नइ पोतय' तइसे बरोबर। बियारा म एक ठिन घानी गड़ेच राहय। बबा ह अपन पाहरो म अपनेच घानी के तेल खावय। घानी म तिली, सरसो, अरसी, करन, लीम अउ अंडी के तेल पेरय। घर के घानी ले तेल के तेल अउ ओकर खरी तको काम के राहय। फेर हमर दिन के आवत ले बबा ह घानी चलय बर छोड़ दे रिहिसे, हां बियारा म घानी ल गड़े देखे हाबन। रायपुर के नॉका म बड़का-बड़का घानी के पेराय तेल ल खावत रेहेन। घर के कोठा म राउत के दुहना नइ अतरत रिहिसे। एक्का-दुक्का के छेवारी उचेंच राहय। घरे म मही-दही अउ घीव मिलय। बस अइसने जइसे-तइसे दिन कटते-कटत आज सबोच ल पइसा म बिसाये के दिन आगे। 
बाहिर ले एक झन छिंदी ह गांव म आके दुकान खोलिस। हमरेच गांव के लोगन मन कना सामान बिसावये अउ हमरे कना बेंचय। फेर ओकर बेचे के तरीका आन रिहिसे। एकेच ठउर म सबोच जिनिस ल बिसावय अउ बेचय। ओहा न तो गांव के किसान रिहिसे अउ न ही बनिहार। गांव म घर न खार म खेत तइसे बरोबर लोटा-धारी धरे अइस अउ पटइल घर के ओसाही म दुकान जमाइस। जेन गांव म लोगन मन सामान के अदला-बदली करके निस्तारी करय उहां ओ छिंदी ह पइसा के लेन-देन शुरू करिस। धान के अलावा साग-भाजी अउ दलहन-तिलहन ल तको अपने ह पइसा म लेवय अउ गांव के लोगन मन कना बेचय। देखते-देखत सबो जिनिस अमोलहा के होगे।
जेन आदमी मन मउका परे म अपन घर के सामान ल बेंचय तेन मन फोकटे-फोकट बेच के पइसा सकेले के शुरू कर दिस। घर म होय उपज ल छिंदी के दुकान मन बेचय अउ बदला म पइसा ल सकेल के राखे राहय। वहू छिंदी हरेक चीज ल बिसावय। बड़का किसान मन धान, गहूं, तिवरा, चना, अरसी। छोटे किसान मन राहेर, मसूर, सरसो, उरीद अउ बारी के साग-सब्जी। जेकर घर किसानी लइक खेती नइ राहय तेनो मन खार ले आमा, अमली, तेंदू, चार के फर के संगे-संग करन, लीम, मउहा, अंडी अउ जलाऊ लकड़ी तको सकेलय। 
बनिहार अउ किसान मन एक दूसर के घर ले सामान अदला-बदली करके निस्तारी चलावय, फेर जब ले छिंदी के दुकान खुलिस हर सामान उहां पहिली पहुंचथे तेकर पाछू आन मन पाथे। बेचे-बिसाय के खेल म धीरे-धीरे गांव वाले मन ठंठन गोपाल अउ छिंदी होगे मालामाल। उपज के पाछू कतका मेहनत करे बर परथे येला कमइया के छोड़े अऊ कोन जान पाही। फेर ये मेहनत करइया के दुर्भाग्य आए के मोल ल दुकान अउ बाजार म बइठे बैपारी मन तय करथे। आगू जेन नूनवाला डोकरा ह एक काठा धान के दू काठा नून देवय ओही अब दू पइली देवत हाबे, माने धान के मोल आधा होगे। अइसने छिंदी तको वन उपज अउ फसल ल अठन्नी देके बिसाथे अउ रूपिया म बेचथे। कहू बीच म ये छिंदी नइ आए रितिस तव आजो हमन अपन खेत म उपजे फसल ल धरके जातेन अउ जरूरत के सामान लेके आतेन। आदला-बदली ले दिन बने बिततिस, रूपिया-पइसा बर हाय-हाय नइ करत रइतेन।  
जयंत साहू,
ग्राम-डूण्डा-वार्ड-52, रायपुर छ.ग.
jayantsahu9@gmail.com
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