चुगलाहा

           गांव ल तो सुनता अउ सद्भावना के ठउर केहे जाथे। नित नियाव के आसन म बइठे गांव के सियान ह गांव भर ल सुमता के डोरी म बांधे रिथे। परेम के तुतारी ले गांव भर ल हॉंकथे। कोनो ल दुख पिरा झन होवे किके गांवे म अपन मति अनुसार नियम बनाय रिथे। का अमीर का गरीब छोटे बड़े सबो ल सियान बबा ह एके लउठी म हॉके। अपन बखत म मानपुर गांव घलो सुनता अउ एकजुटता के मिसाल रिहीस फेर का करबे सबे दिन एक बरोबर नइ राहय अब सियान ह सियाने होगे, नित नियाव ह अब थाना कछेरी के होगे हे। गांव तिर म थाना का आगे थानादार बात-बात म गांव आ धमकथे।
          दाउ ह अपन पाहरो मे कभु थाना कछेरी नइ गे रिहीस फेर का करबे जब ले नियतखोर कोतवाल अउ घुसखोर थानादार के जोड़ी भराय हे तब ले दाउ अउ गांव वाला मन ल लिखरी-लिखरी बात बर हवलदार करा खड़ा होय बर परथे।
          ओ दिन एक घर सास बहू के झगरा होइस परोसी ल आरो नइ लगिस। फेर चुगलाहा कोतवाल के कान म खजरी उमडि़स ते पाय के गांव भर के मन गम पागे। कोतवाल के करनी अतकेच भर नोहे। बाप बेटा के झगरा, कोनो के भइसी गवागे, कुकरी चोरी होगे, कोनो ल कुकुर चाब दिस अइसन-अइसन नान-नान बात म कोतवाल ह थाना वाला ल बलाके गांव के लोगन मन ल परसान करय। इही थाना कछेरी के सेती गांव के पंचइत अउ नित नियाव छिदीर-बिदीर होगे। हरेक बात म थाना आगे। 
         मातर के दिन के बात आय मदन अउ दया ह झगरा होइस। नसा के रोस म दोनो झन मारिक-मारा होइस। कोनो नइ छोड़ातिस त तो मुड़ी कान के फुटत ले हो जतिस। सियान मन छोड़ाइस अउ घर म ओइलइस। बिहनीया नसा उतरे के बाद मदन अउ दया दोनो झन अपन-अपन कोती ले पंचइत सकेलीस। दाउ ल फैसला करे बर बलाइस। पंचइत सकलाय देख के कोतवाल के आखी फुटगे। जाके तुरते थाना म गांव के पंचइत के बात ल एक ले दू करके बता दिस।
          थानादार ह गांव अइस अउ खुन के मामला ये किके दूनो ल अंदर कर दिस। सिपाही संग भला कोन लड़तिस दाउ घलो चुप रइगे। मदन अउ दया के थाना म जाय के पाछु दोनो के घर वाला मन मिंझर के दाउ करा अपन-अपन घर वाला ल छोड़ाय के बिनती करिस। दाउ ह थाना म पइसा कउड़ी भर के दोनो झन ल छोड़ा के लानिस। एक घाव जिहां खुसखोरी के आदत परगे ते कहां छुटना हे। कोतवाल ह तो गांव म सिपाही मन के चुगलही करे बर बइठे रिहीस। उही ह खभर करे अउ दोनो कोत के पइसा झोरे। 
          गांव म कोतवाल के जिये खाय के पुरती कोतवाली जमीन हे तभो ले चोट्टही करके खाय बिगर ओकर पेट नइ भरे। थाना के डर म कोनो ओला कांही काहत घलो नइ रिहीस। ओकरो पारी आही त मजा बताबो किके मने मन म सबो बैर धरे राहय। दाउ घला कोतवाल के पारी के अगोरा करत रिहीस।
         एक दिन बिहनिया के बेरा रिहीस गांव भर के मन अपन-अपन काम म जाय के तियारी करत रिहीस। कोनो ल कोनो से गोठियाए के फुरसद नइ रिहीस। सबो झन बुता म मगन रिहीस ओतकेच बेर कोतवाल ह रेरी पारत घर ले निकलीस। चोर... चोर... चोर...। मोर घर म चोर खुसरे हे बचावा दाई ददा हो। मोला बचावा चोर... चोर...। चोरहा मन मुह म साफी बांधे कोतवाल ल मारत पिटत ओकर घर के संदूक पेटी ल खोले लगिस। कोतवाल ह अपन घर के रूपिया पइसा ल चोरी होत देख चोर चोर किके चिल्लावे। गांव वाला मन कोनो ओकर मदद बर आगु नइ अइस। चोरहा मन कोतवाल के घर म दंगा दासी करिस अउ चोरी करके चल दिस। कोतवाल रो-रो के करलई ले बताय लगिस।
           कोतवाल ह सबो किस्सा ल बतावथे अउ गांव वाला मन किस्सा सुने बरोबर हुकारू देवत हव हव किके सुनथे। कोतवाल घर ओतेक अकन के चोरी होय हे तभो ले कोनो ह मया के दू भाखा नइ बोलत हे। बने बेवहार के रितिस त तिर तखार के मन ओधतिस नियतखोर कोतवाल के चरितर के सेती दुख म घलो अपने अकेल्ला हे। उहू ह तो काकरो सुख दुख म साथ नइ दिस त ओकरे दुख म कोन साथ दिही। कोतवाल ह पर के झमेला म जोझा परके धन कमाय रिहीस। उपराहा म चोरी लुका ले अपन कोतवाली जमीन ल घलो बेचे रिहीस। घर म बने रूपिया के सकलाती होइस अउ बिलई कस झपटती होगे। पर के ल झपटे परे तेकर सेती ओकरो झटइस।
         रोवत गावत कोतवाल थाना पहुचिस अउ चोरी के बात ल थानादार ल बतइस। थानादार तमतमावत गांव अइस। गांव म एको मनखे नही। सबो अपन-अपन काम बुता म चल दे रिहीन। गांव म जइसे कुछू होयच नइये तइसे बरोबर रिहीस। देख के थानादार ल अचंभा लागिस। कोतवाल ल किथे- कइसे कोतवाल तोर घर सिरतो म चोरी होय हे। कोतवाल किथे हहो मालिक गांव भर के आगु म चोरी होय हे। गांव भर के आगु म चोरी होय हे फेर गांव म तो एको मनखे नइ दिखे। थानादार गांव के एक झन सियान ल पुछिस कइसे गा कोतवाल घर चोरी होवत रिहीस त रेहेस का। सियान किथे- कतका बेर चोरी हो गे साहेब हम तो जानबे नइ करन, येदे तुहरे मुह अभी सुने हन। लइका मन खेलत रिहीस तेमन ल पुछिस- तुमन देखे हव का। लइका मन किथे- चोरह घर का चोरी होही गा, लबारी मारथे। थानादार गांव वाला मन ल पुछ-पुछ के हलाकन होगे कोतवाल घर के चोरी ल कहू जानबे नइ करे। कोतवाल के समान चोरी होगे उपर ले कोना ह बताय बर तियार नइये।
          थानादार बिगर सबुत के पतियाबे नइ करिस कि ओकर घर चोरी हो हे। थानादार कोतवाल ल किहीस दु चार सौ देबे त तोर केस बनाहू। चोरहा मोर हांथ आ जही त तोर रूपिया मिल जही नही ते उहू ल गवांए जान। आखिर म थानादार ह कोतवाले ल समय खराब करथस किके खिसयइस अउ उही पावं लहुटगे।
          अतका बिते के बाद कोतवाल ल समझ आगे रिहीस की गांव म रइ के गांव वाला संग दोगलई करेवं तेकर फल आय किके। अपन करनी म छिमा मागे बर पंचइत सकेलिस। मानपुर म एक बेर फेर नियाव के आसन म दाउ बइठिस। सरी गांव वाला के आगु कोतवाल किहिस कि मै लालच म पर के नान नान बात के लिगरी लगा के सबला थाना कछेरी म रगेढ़त रेहेव। अब मोला क्षमा करदव। अइसन गलती दुबारा नइ करवं। मोर करनी के सजा तो मोला मिलगे मै कंगाल होगेव। दाउ ह कोतवाल ल अपन करनी म पछतावत देखके किहीस हमर पंचइत म काकरो संग अनियाय नइ होय। दाउ ह मदन ल आरो करिस। मदन अउ दया ह एक ठन मोटरी लान के मढ़इस। दाउ किथे कोतवाल ले धर तोर रूपिया पइसा ल, तै सरी गांव ले बैर करेस अपन लालच बर फेर गांव के मन तोर ले नही तोर लालच ले बैर राखे रिहीस। गांव के सुनता टोरे बर तै का-का नइ करे होबे। अब देखे डरेस न गांव के नियाव अउ गांव के सुनता।

हरेली : छत्तीसगढ़ी लोक परब

रोग-राई हरे बर 'हरेली' तिहार



खेती किसानी अउ बनि-भूति म रमे लोगन बर तिज-तिहार एक ठीन खुशी के ओढऱ भर नोहय बल्कि अइसन परब अउ रित रिवाज ह समाज म कोनो न कोनो किसम के संदेसा लानथे। मेहनत मजूरी म लगे लोगन ल वइसे बाहिर के दुनियां ले काहीं लेना-देना नइये अपन काम ले काम, अऊ खुशी मनाही तभो अपने मन मुताबिक। इही सेती किसनहा भुइयां छत्तीसगढ़ के सबो तिज तिहार कोनो न कोनो परकार ले खेती किसानी ले ही जूरे रिथे। छत्तीसगढ़ म असाढ़ के दूसर पाख ले पानी दमोरे के सुरू हो जथे, इहां के कतको लोगन मन गरमी के दिन म कन्हार ल अकरस जोतई कर डारथे। एक सरवर पानी परीस ताहन धान ल बो डरथे। अब मौसम के ऊंच निच के सेती बोवई कभू-कभू पिछड़ जथे। सावन तक एक्का दूक्का के छोड़े बोवई पूरा हो जथे। सावन के महीना किसान मन बर गजब खुशयाली लाथे। काबर कि पानी के टिपिर-टिपिर झड़ी संग तिहार ह घलो ओरी-ओरी ओरिया जथे। सबले पहिली आथे हरेली, येहा छत्तीगसढ़ के परमुख तिहार आय। किसान मन अपन नांगर बक्खर के पूजा करथे, लइका मन गेड़ी के मजा लेथे, गांव के सियानहा मन गांव के सुख समृद्धि बर डिह डोंगरी के देवता मन ल मनाथे। गांव के चरवाहा मन माल-मवेशी मन के बढ़वार अउ रोग-राई टारे बर दइहान म गरवा मन ल कंदइल(दवई) अउ लोंदी खवाथे। पाहटिया ह घरो-घर लीम के डारा खोचथे। तन मन ल निरोगी करे रखे म लीम के महत्ता ल तो डॉक्टर बईद सबो जानथे। जवान मन के झिमिर-झिमिर पानी म नरियर फेकउल। गेड़ी दउड़ अउ नरियर जीत। लोक परंपरा के धरोहर गठियाए सियन्हिन मन लइका सियान सबो पर रोटी-पीठा रांधथे अउ हरेली परब ल गजब हॉसी खुशी ले मनाथे।



सवनाही- सावन लगथे तव पहिली इतवार के गांव बनाय जाथे। गांव के सियान मन गांव के देवा धामी के ठऊर म जाथे अउ मानता अनुसार देव के मान गावन करथे। ये दिन गांव के बइगा संग सुजानी सियाने मन भर जाथे लइका मन ल ये कारज म नइ संघेरे। गांव म इतवार के पहिली गांव के सियान मन के गुड़ी म जुरियाथे। सवनाही रेंगाय बर बइगा ह चलागन अनुसार समान बताथे, गांव के मन बरार करके लानथे अउ शनिचरी रात म सवनाही रेंगाथे। असल म सवनाही गांव के देवी देवता अउ डीह डोंगरी के पूजन आय। गांव म जेन दिन गांव बनाथे वो दिन काम बुता के मनाही रिथे। गांव म जब तक पानी भरे अउ कचरा माटी फेके के हांका नइ होवे तब तक गांव के कोनो ह कुआ बोरिंग ले पानी नइ भरे अउ न कोनो ह घर के कचरा ल घुरवा म फेकय। जब सबे देवी देवता म हूमन-धूपन मान-गवन हो जथे तेकर पाछू गांव के मन पानी भरथे अउ कचरा माटी फेकथे। ये दिन घर कुरिया अउ कोठार मन म गोबर के पुतरी बनाथे। सवनाही के बाद सावन महीना के इतवार भर गांव म काम-बूता बंद रिथे। समे के संग गांव के लोगन मन के विचार कतको बदलत हे तभो ले गांव म सावनाही, इतवारी तिहार के परंपरा चलते हावे अऊ चलते रही काबर की ये हमर पंरपरा के आरूग चिन्हा आय। लोगन के सोच ह अंधविस्वास अउ टोना-टोट्का ले छटियाके अब सिरिफ रीति-रिवाज अउ परंपरा के निर्वाह म लगे हे।




पशुधन के जतन- हरेली म माल-मवेशी मन के घलो बने जतन अउ हियाव करे जाथे। सावन म खेत-खार म कई किसम के नवा-नवा उपजे हरियर चारा गाय-गरवा अउ किसानी म काम करइया बइला-भइसा मन ल गजब सुहाथे। हरियर-हरियर कांदी अउ बन-बूटा ल ढिल्ला चरइया मवेशी म हरर-हरर खाथे। नवा उपजे इही चारा म कई किसिम के कीरा अउ रोग-राई संक्रमण वाला कांदी रिथे जेला पशुधन खा परथे। अइसन चारा चरे ले पशु मन म बीमारी फैले के डर रिथे। हरेली के दिन गांव के चरवाहा मन जोन कंदइल ल उसन के खवाथे वोहा गाय-गरवा मन बर औषधी के काम करथे, ओमन ल बरसात म होवइया संक्रमण ले बचाथे। अबके भासा म काहन त सामूहिक उपचार। जेन गरवा ह दइहान म नइ आवे तेकर बर किसान मन राउत करा ले दवई मांग के घर लेग के खवाथे, ताकी कोनो ह दवई खाय बर झन छूटे। चरवाहा मन ये कंदइल ल रात के उसनथे अउ बिहनिया ले दइहान के गरवा मन ल लोंदी संग खवाथे। लोंदी गहू पिसान के लोई आए जेमा थोर-थोर नून या बिगर नून वाला घलो बनाके खवाथे। चरवाहा मन दवई क पाछू कोनो रूपिया पइसा नइ लेवे। काठा-पइली धान अउ सेर सीथा भर लेथे। माल-मवेशी के जतका संसो घर गोइसया ल रिथे ओकते संसो पाहटिया ल घलो रिथे। गांव के लोगन मन अपन गाय-गरवा ल हियाव कर-करके सावन के रोग-राई ले बचाथे अउ अपन संगवारी मितान भाई बरोबर बइला-भइसा ल खवा पियाके हरेली तिहार ल जुरमिल के मनाथे।




कृषि औजार पूजा- खेती के काम अवइया नांगर, जुड़ा, कोपर, रापा, कुदारी, रपली, आरी, बसूला, सबरी, टंगिया ल सेकल के बढिय़ा धोथे मांचथे। कमई के दिन म जतका जी परान देके कमइया ह कमाथे ओतके भाव भक्ति ले अपन औजार के जतन घलो करथे। कोनो भी जिनिस होय बेरा-बेरा म ओकर देख-रेख अउ समे अुनसार जतनबे तव जादा दिन खटाथे। बनावटी तो सबो हे, सब बनावटी ल एक दिन खुवार होना हे। फेर जतन देबे त धिरलगहा खियाथे। गांव के सिधा-सादा मानुख ह जादा के तीन पांच ल नइ जाने अपन सरी विधी-विधान त परब बरोबर मानथे। सबो औजार ल धो मांज के एके जगा अंगना म मड़ाथे। चाउर पिसान ल घोर के सब हाथा देथे। बंदन के टीका लगाथे। चीला गुर के हूम-जग देथे। सबो परानी आरती उतारथे। भगवान ले बिनती करथे कि हे नांगर, हे जुड़ा, हे रपली कुदारी, हमन तुहरे परसादे बूता सिरजाथन। बने-बने सब काम बुलक जाए कोनो परकार के बाधा बिघन अउ अड़चन झन आए।




गेड़ी- हरेली ह किसान मन के तिहार आय त भला किसान के लइका मन कइसे तिहरहा मजा दे दूरिहा रही। ये दिन गेड़ी खाप के लइका मन गली खोर के चिखला माटी म चभरंग-चभरंग रेंगत रिथे। गेड़ी बांस के बनाय जाथे जेकर लंबाई चार हाथ ले बारा हाथ तक के घलो होथे। गेड़ी चघइया के सोहलित के मुताबिक गेड़ी बनाय जाथे, नान्हे लइका या नवसिखिया बर नानकुन अउ हूसियार लइका मन बारा-चौदह हाथ के गेड़ी के चड़थे। गेड़ी बनाय बर बॉस अउ बूच रस्सी के जरूरत होथे। पांव रखे बर पउवा ल बांस के बिचो-बिचो खिला म अटका के ओकर निचे नेकवा लगा के बूच के रस्सी से बाधे जाथे। गेड़ी चघईया मन गेड़ी म रेंगत खानी गेड़ी ले रचरिच-रचरिच आवाज निकाले बर बूच म अंडी या सरसो, माटी तेल डारथे, बिच म केश डारे ले घलो गेड़ी ले चमचमहा आवाज निकलथे। गेड़ी के बिसे अभी तक हमर अंचल म कोनो पौराणिक कथा या किवदंती तो सुनऊ म नइ आय हे। हरेली म गेड़ी के बनाय अउ गेड़ी रेंगे के पाछू कारण का होही ये मरम ल जानबो तव गजब अकन गोठ निकलथे। हरेली ह सावन के महीना म आथे। सावन झड़ी-पानी के दिन आय। पानी के सेती गांव के गली खोर म भारी गइरी माते रिथे जेती देखबे तेती माड़ी भर-भर चिखला भरे रिथे। गोड़ ल चिखला से बचाय बर गेड़ी चड़थे। बरसात म चिखला म कतकोन परकार के किरा-मकोरा अउ सांप-डेढ़ू रइथे। हरेली तिहार के ओखी सियान मन लइका मन चिखला-माटी ले बाचे के संदेसा देथे। गेड़ी ह केदवा अउ पानी-पानी म पांव कंदकंदाय ले बचाथे संगे-संग ये ह एक परकार के योग साधना घलो आय ऐकर से लइका मन पातर बांस म रेंग के शरीर के संतुलन बनाय के कलाकारी सिखथे। ऊंचहा बास म पांव मड़ाके जब लइका आगू डंगा फेरथे तव पूरा शरीर ह पउवा के थेभा पांव के काम करथे। गेड़ी रेंगइया मन बिगर कोनो सहारा रेंग जथे। गेड़ी बनाय के पाछू पौराणिक कथा-किवदंती नइ पायेन त का होगे, गेड़ी ह शरीर के संतुलन अउ पाव के संक्रमण के संगे-संग योग साधना, लइका मन ल आत्मविस्वासी बनाथे।




सावन संग आगे तिहार के झड़ी,

धोवव नांगर-बक्खर अउ मव गेड़ी।
आगे हरेली... आगे हरेली।।