20 Nov 2016

बिसरगे सुरता अदला-बदली ले निस्तार के

बिसरगे सुरता अदला-बदली ले निस्तार के : वस्तु विनिमय (barter)

तीस बछर पहिली हमर गांव म एक झिन नून बेचइया डोकरा आवय। बइलागाड़ी म एक गाड़ी नून धरके। ओकर डोकरी ह गाड़ी खेदत राहय अउ डोकरा हा गली म ऑक पारय- 'नून लेलव नून... एक काठा धान के दू काठा नून हो...।' ओकर आरो पाके गांव के सियानिन दाई मन टोकनी-टोकनी धान ल धरके घर ले निकलय अउ नून के बदला म धान ल देवय। नूनवाला डोकरा ह हमर गांव म महीना-पंदराही आवय। हमरे तिर-तखार के गांव मन ओकर गवई रिहिसे। नून बेचई म डोकरा के पूरा परिवार लगे राहय। कभू-कभू हाट-बजार म तको ओकर आरो मिलय-'नून लेलव नून... एक काठा धान के दू काठा नून हो...।'
अबही असन तइहा के सियान मन नोट के गठरी धरे बजार नइ जावत रिहिसे। अऊ आन-तान खरचा तको तो नइ रिहिस हावय। कुछू भी जिनिस लेना राहय तव सबेच ह धान-पान के बदली म मिल जाए। सियान बबा के थइला म पइसा देखेच नइ रेहेन। तभो ले नानपन म घर म सबोच सुख ल देखे हावन। चांउर-दार, तेल-हरदी, धनिया-मिर्चा, हरियर साग के दिन म हरियर-हरियर भाजी, अड़हा दिन बर खुला-सुक्सा। अमली, आम, आलू, भाठा, रमकेलिया, पताल के खुला, सुक्सा म चिवरा, चना, चनौरी मिलय। अब रइगे बात नून अउ गुर के तव नून ल जइसे नूनवाला डोकरा कना बिसावय धान के बदला म ओइसने छिंदी (सिंधी) दुकान म गुर तको धान के बदली म मिलय। तेल म भुंजे-बघारे वाला साग कमेच चुरय हालाकि हमर घर घानी तको रिहिसे, हाना तको किथे न 'तेली घर तेल रही त माहल ल नइ पोतय' तइसे बरोबर। बियारा म एक ठिन घानी गड़ेच राहय। बबा ह अपन पाहरो म अपनेच घानी के तेल खावय। घानी म तिली, सरसो, अरसी, करन, लीम अउ अंडी के तेल पेरय। घर के घानी ले तेल के तेल अउ ओकर खरी तको काम के राहय। फेर हमर दिन के आवत ले बबा ह घानी चलय बर छोड़ दे रिहिसे, हां बियारा म घानी ल गड़े देखे हाबन। रायपुर के नॉका म बड़का-बड़का घानी के पेराय तेल ल खावत रेहेन। घर के कोठा म राउत के दुहना नइ अतरत रिहिसे। एक्का-दुक्का के छेवारी उचेंच राहय। घरे म मही-दही अउ घीव मिलय। बस अइसने जइसे-तइसे दिन कटते-कटत आज सबोच ल पइसा म बिसाये के दिन आगे। 
बाहिर ले एक झन छिंदी ह गांव म आके दुकान खोलिस। हमरेच गांव के लोगन मन कना सामान बिसावये अउ हमरे कना बेंचय। फेर ओकर बेचे के तरीका आन रिहिसे। एकेच ठउर म सबोच जिनिस ल बिसावय अउ बेचय। ओहा न तो गांव के किसान रिहिसे अउ न ही बनिहार। गांव म घर न खार म खेत तइसे बरोबर लोटा-धारी धरे अइस अउ पटइल घर के ओसाही म दुकान जमाइस। जेन गांव म लोगन मन सामान के अदला-बदली करके निस्तारी करय उहां ओ छिंदी ह पइसा के लेन-देन शुरू करिस। धान के अलावा साग-भाजी अउ दलहन-तिलहन ल तको अपने ह पइसा म लेवय अउ गांव के लोगन मन कना बेचय। देखते-देखत सबो जिनिस अमोलहा के होगे।
जेन आदमी मन मउका परे म अपन घर के सामान ल बेंचय तेन मन फोकटे-फोकट बेच के पइसा सकेले के शुरू कर दिस। घर म होय उपज ल छिंदी के दुकान मन बेचय अउ बदला म पइसा ल सकेल के राखे राहय। वहू छिंदी हरेक चीज ल बिसावय। बड़का किसान मन धान, गहूं, तिवरा, चना, अरसी। छोटे किसान मन राहेर, मसूर, सरसो, उरीद अउ बारी के साग-सब्जी। जेकर घर किसानी लइक खेती नइ राहय तेनो मन खार ले आमा, अमली, तेंदू, चार के फर के संगे-संग करन, लीम, मउहा, अंडी अउ जलाऊ लकड़ी तको सकेलय। 
बनिहार अउ किसान मन एक दूसर के घर ले सामान अदला-बदली करके निस्तारी चलावय, फेर जब ले छिंदी के दुकान खुलिस हर सामान उहां पहिली पहुंचथे तेकर पाछू आन मन पाथे। बेचे-बिसाय के खेल म धीरे-धीरे गांव वाले मन ठंठन गोपाल अउ छिंदी होगे मालामाल। उपज के पाछू कतका मेहनत करे बर परथे येला कमइया के छोड़े अऊ कोन जान पाही। फेर ये मेहनत करइया के दुर्भाग्य आए के मोल ल दुकान अउ बाजार म बइठे बैपारी मन तय करथे। आगू जेन नूनवाला डोकरा ह एक काठा धान के दू काठा नून देवय ओही अब दू पइली देवत हाबे, माने धान के मोल आधा होगे। अइसने छिंदी तको वन उपज अउ फसल ल अठन्नी देके बिसाथे अउ रूपिया म बेचथे। कहू बीच म ये छिंदी नइ आए रितिस तव आजो हमन अपन खेत म उपजे फसल ल धरके जातेन अउ जरूरत के सामान लेके आतेन। आदला-बदली ले दिन बने बिततिस, रूपिया-पइसा बर हाय-हाय नइ करत रइतेन।  
जयंत साहू,
ग्राम-डूण्डा-वार्ड-52, रायपुर छ.ग.
jayantsahu9@gmail.com
9826753304

2 comments:

  1. सच है

    रुपिया -पइसा आया
    हाइ तौबा लाया

    बहुत सुन्दर सामयिक प्रस्तुति

    ReplyDelete
  2. आपका स्वागत है कविता जी. 'http://charichugli.blogspot.in' पर।
    पैसा चीज ही ऐसा। हो तो टेंसन, न हो तो भी

    ReplyDelete