कहिनी- डेहरी के पहुंना


बइला गाड़ी म माई पिल्ला जोरा के। डेरा-डांगरी धरे अपनेच गांव म लहुंटत हाबे सोनबरसा गांव के लोगन मन। जस नाम तस काम बरोबर सोनबरसा म सिरतोन म हरियर सोन के बरसा होवय। चारो कोति हरियर-हरियर डोली म धान, गहूं, चना, बटरा अउ सगा-भाजी के फसल लहलहावत राहय। 
अब तो जेने कोति मुड़ी ऊंचा के देखबे तेने तनी बादर ल छुवत महल खड़े हवय। नवा राज के बरोड़ा म खेती-खार अउ घर-दुवार सफ्फा उजरगे। आजादी के बाद का पायेन अउ का गवायेन ये राजधानी तिर के गांव म परगट दिखत हाबे। खेती के बदला सरकार ह नोट के गठरी धराके अपने डेहरी के पहुंना बना दिस। 
नवा राजधानी कोति के सोनबरसा गांव म एक झन सांवत मरार के तको खेती-खार रिहिस हाबे। रोज बिहनियां एक ठिन साइकिल म चार ठिन झोला ओरमाय रचरिच-रचरिच माना बजार आवय। बने ढंग के रद्दा तको नइ रिहिस हाबे। तभो ले ओ कोति के मन चर-चर कोस के बजार ल नाप देवय। उत्ती कोति म राजिम के जावत ले हाट बजार करय। रक्सहू कोति चंपारण के जावत ले अउ भंडार कोति म गंगरेल के जावत ले हाट बजार सइकिलेच म करय। बुड़ती कोति रइपुर परथे तेन पाके उकर जादा अवई इही कोति होवय। 
रइपुर के लकठा म माना गांव हवय। माना ह अब दू ठिन होगे हावय, एक माना बस्ती अऊ दूसर माना केंप। माना बस्ती म गांव वाले मन रिथे अउ माना केंप म बंगलादेस ले आए सरनारथी बंगाली भाई-बहिनी मन रिथे। सियान मन बताथे के बंगालदेस ले लोगन मनला सरकार ह बसाय हाबे। ओमन ला सरी सुख सुविधा तको मिलत हाबे। 
सांवत मरार ह माना केंप के बजार जादा आवय। माना केंप के बंगाली मन आते साठ सांवत के चार मोटरा भाजी ल बिसा डारय। माना केंप के बंगलहिन मन संग सांवत के अतेक चिन-पहिचान होगे रिहिस हाबे के उधार-बोड़ी तको चलय। एक दिन सांवत ह एक झिन बंगलहिन ले पुछथे- कस दीदी तुमन ओतेक दूरिहा ले इहां कइसे आगेव? 
बंगलहिन- का बताबे सांवत हमर जियइ दुबर होगे रिहिस हाबे। उहां रितेन ते आज ले हमर कुटुम के नास हो जतिस। हरहिन्छा जिये-खाये बर इहंचे आके बस गे हाबन।
सांवत- त इहां कइसे आगेव वो। 
बंगलहिन- का होगे गा आगेन तव? 
सांवत- ओहो नराज झिन हो दीदी। काबर आगेव किके नइ काहत हवं। मय पुछत हवं हमर छत्तीसगढ़ म कइसे आना होइसे। आन कोति तो अऊ लकठा म ठउर-ठिहा रिहिस होही काहत हवं?
बंगलहिन- छत्तीसगढ़ कस आन कोति के मनखे मन नइये। इहां बाहिर वाले मनला गजब मया मिलथे। दार-चाऊर, साग-भाजी के जोखा घलोक हो जथे। इही पाके इहां जमगे हाबन। सरकार कोति ले सबो सुविधा घलोक मिलत हाबे त अब जाके काय करबोन। 
सांवत- बने हवय दीदी, तुही मन आन देस राज ले आके तको इहां सुख ले हाबव। हमन इहचे के मूल निवासी आन तभो ले हमन ला हमरे घर दुवार खेती-खार ले कब निकाल देही तेकर कोनो ठिकाना नइये।   
 बंगलहिन- काबर निकाल देही गा। तुहर राज, तुहर घर-दुवार। अऊ खेती-खार के मालिक तुही मन तो आव, फेर काबर डर्राथव।
जइसने गोठकार सांवत मरार तइसने लेवइया माईलोगिन मन। पांच मिनट के लेवइया हा आधा घंटा ले कड़ार देथे। साग बेचाय के बाद सावंत मरार ह सइकिल मसकत-मसकत अपन गांव कोति जावत रद्दा भर माना केंप के बंगलहिन मनके बारे म गुनत रिहिस हाबे। देखले सरकार ल आन देस राज के मनला इहां सरी सुख सुविधा देके बसावत हाबे अउ हमन ल दुविधा म राखे हावय। 
सांवत ह ये बजार ले ओ बजार किंजर के देख डरे हवय के हमर छत्तीसगढ़ राज म कतेक बाहिर के लोगन मन आ आके बसे हावय। सुख-सुविधा ले जियत हाबे। इही पाके एक मन म बल तको करय के कइसे सरकार ह हमरे घर-दुवार ले हमन ला खेदारही। चिरई-चिरगुन तो नोहन के ये खोंधरा ले ओ खोंधरा उड़ा जाबो। इही गुनत-गुनत अपन गांव पहुंचिस सांवत मरार। 
गांव म गिस तव तहसीलदार ह गांव म बइठका लेवत राहय। सरकार के योजना के फरीफरकत करत राहय। इहां मंत्रालय बनही, बड़का-बड़का महल तनही। कोरी-कोरी सड़क लमियाही। सांवत ह साहेब ले पुछिस अऊ हमर का होही साहेब। तुहर का, तुमन ला मुआवजा मिलही। इहां बड़का-बड़का साहेब मन रिही, तुमन सुघ्घर पइसा झोकव अउ आन कोति जगह-भुइंया बिसाके राहव। 
सावंत किथे- अऊ कहू हमन नइ जाबो त का होही? 
साहेब किथे- हमर तो कुछु नइ बिगड़े तुहरे बिगड़ही। सरकार जेेन जोंगे हाबे तेन तो होबे करही। चाहे हांसी खुसी ले देवव या फेर जोर जबरई ले। खेत-खार तो दे परही। 
सरकार ह अपन मनमानी कर दीस। सांवत मरार सहिक अऊ आन किसान मन मुआवजा के रूपिया झोक-झोक के, आन कोति खेती बिसाके किसानी करत हाबे। गांव के सबो किसान मन आन-आन गांव कोति जाके बसे हावय तेन पाके गांव के तरिया, नरवा, रूख-राई, संगी-साथी संग भेट करे बर सुरर जथे। इही पाके तीज-तिहार म जुन्ना गांव के सबो किसान मन सकला के अपन दुख-सुख के गोठ ल गोठियाथे। 
तरिया पार म, नहवइया मन। कुआ-बउली म पनिहारिन। एक दूसर ल आन गांव के सगा बरोबर सोर संदेसा देवत हावय। चार महीना कमाय खाए बर आन राज चल देथे त अनगईहां जान। गजब दिन म भेट होथे त मया ह थोकिन जादच पलपलाथे। जब-जब ओमन सकलाथे तरिया-नंदिया म अइसनेहे गोठबात सुने बर मिलथे। ...तुमन कब के आए हव दई। ...अई हमन ला तो आठ दिन होगे, अउ तुमन? हमन आजे हाय हाबन...। बड़े लइका फोन करे रिहिस हाबे के अब इहू कोति पानी अवइया हाबे किके, ताहन झपकुन आगेन। हमर घर के सफ्फा खपरा गिरगे हाबे किहिस त हमू मन लघियात आय हाबन। वा हमर तो बियारा ल तो कते इंजिनीयर ह फेर नापत रिहिस किथे कोन जनी अऊ का बनाही ते। जे दे दिन गांव म पांव धरे ते दिन भइगे अइसनेच गोठ। मन के पीरा ताय सुनइया ल असकट लागे न गोठियइया ल। 
इही सब गोठ गोठियाय बर तो गिने-गनाय दू चार परवार ल छोड़ ताहन सोनबरसा गांव के लोगन मन दुघरा ले बनि कमाके अपन-अपन घर-दुवार कोति लहुंटे हाबे। बादर घुरूर-घाररत करत, असाढ़ लकठागे। गरेरा म छानी खपरा के दुर्दसा बिगड़े हावय। चिरई-चिरगुन सहिक ये पेड़वा ले ओ पेड़ म अपन बसुंदरा बनावत किंजरइया-फिरइया मन ला अब फेर अपन डेरा जमाना हाबे अपनेच गांव म। जेन गांव म पुरखा के नेरवा झरे हाबय तेला छोड़े के मन तको तो नइ करय। अऊ इहां बसे तको तो नइ सकय। काबर के घर के छोड़े अऊ कुछुच तो नइ बांचे हाबे। किसान मन बिगर खेतिहर भुइंया भला कइसे रही। सावंत तको दू-चार दिन बर जनम भुइया म आथे। घर-दुवार के सरेखा करथे। ताहन फेर रेंग देथे, अपन दुघरा।
                                                                                                                                             - जयंत साहू

jayant

*छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया* के नारा ह अब गारी बरोबर लागथे

सरकार ह का सोच रखथे छत्तीसगढ़िया खातिर ये बात के पै इही मेर उभरथे के जतेक भी बड़का नेता-अभिनेता बीच सभा म आथे तव सबोच ह एकेच भाखा बोलथे छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया का हमर बढ़िया हाबे तेन ला सबो जानत हाबे।  हमर काही मूड़ी-पूछी ल नइ जाने तेनो मन किथे छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया। छत्तीसगढ़ के किसान अउ ओकर खेती के दुर्दसा अउ घड़ी-घड़ी महतारी भाखा के अपमान ल देखके अबतो छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया के नारा ह गारी दे बरोबर लागथे।
राज के नेता-अभिनेता मनके बात ल तो छोड़ आन राज के नेता-अभिनेता मन तको जान डारे हाबे के छत्तीसगढ़ म जाके 'छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया' किबे तहान उहां के लोगन मन गदगदा के ताली पिटथे। जेन आथे तेने हा भइगे 'छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया-छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया' का-का बढ़िया हाबे छत्तीसगढ़िया के किके सवाल कोनो ले करबे त एकेच जवाब आथे के छत्तीसगढ़िया मन बड़ सिधवा होथे। माने हमन सिधवा हाबन तेकर सेती कोनो भी 'छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया'  कइके अपन बुता बना लेथे।  दूसर ल काए दोस देबे हमरे भाई-बंद मन पहिली हमर बुता बना देथे अउ बाद म परोसी ल तको लानथे।
देखव ना छत्तीसगढ़ी भाखा संग का होवथाबे। अवसरवादी  मन आयोग म तसमई खात हाबे। बछर भर हिन्दी सम्मेलन म ए राज ओ राज, ए देस ओ देस किंजरत हिन्दी कोति रमे रिथे अउ जब छत्तीसगढ़ राजभासा आयोग के सुरता आथे तव इहू कोति ढरक जथे। उहीं मन सम्मेलन के करता-धरता हो जथे। माने इहू कोति के कलेवा झिन चूके अउ उहू कोति के। बाकी जाय चुक्कूल म।
आयोग ले बने तो पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर हा जबर बुता करे हाबे एम.ए. पाठ्यक्रम सुरू करके। देखते-देखत छत्तीसगढ़ी बिसे म एम.ए. पढ़ईया लइका मनके एक अलंग नाहकगे। जतके झिन मन पढ़के नाहके हाबे ओकर ले आगर लइका मन अबही छत्तीसगढ़ भाखा म एम.ए. के पढ़ई करत हाबे। ओमन ला का पढ़ाय जावथे, का पढ़ाय जाना चाही, अउ का सोज्झे एम.ए. कक्छा सुरू करई का बने होही ये सब बात ल अभी घिरिया देथन अउ एक सूर म सबो छत्तीसगढ़िया मन विश्वविद्यालय अउ कुलपति जी के बड़ई करथन। कम से कम ओमन छत्तीसगढ़ी म एम.ए. सुरू करके स्कूल शिक्षा विभाग ल ये बिसे गुनान करे खातिर मजबूर तो करिन। अब ये स्कूल शिक्षा विभाग के सोच-विचार लगाये के बात आए के जब ओकरे जेवनी बाजू माने विश्वविद्यालय ह कॉलेज म छत्तीसगढ़ी पढ़ई सुरू कर देहे तव स्कूल म काबर नइ हो सकही। जब अंग्रेजी, संस्कृत अउ हिन्दी म एक छत्तीसगढ़ी भाखा बोलइया लइका ह पढ़ई कर सकत हाबे तव छत्तीसगढ़ी ल लिखे अउ पढ़े म का जियान परही। लइका मन बर तो अऊ बने सरल हो जही।
गुने के बात आए के छत्तीसगढ़ राज जिहा दू करोड़ ले आगर छत्तीगसढ़ी के बोलइया हाबे तउन राज म छत्तीसगढ़ी  म पढ़ई-लिखई नइ होवय। अउ तो अऊ स्कूल म एक ठिन किताब तको नइ हे छत्तीसगढ़ी के। नोहर-सोहर म एकका-दूक्का पाठ ल समोख के हमर मन मढ़हावत हाबे। सरकार ह छत्तीसगढ़ी ल परचार के भाखा, वोट मांगे के भाखा बना सकथे। फेर काम-काज के भाखा नइ बना सके। अऊ हमू कुछू केहे नइ सकन सरकार ल काबर के 'छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया' हमर माथा म लिखाय हाबे।