पुस्तक समीक्षा : छत्तीसगढ़ी समाज के स्वाभिमान जगाये के एक उदीम " हीरा छत्तीसगढ़ "

    पुस्तक समीक्षा
    • पुस्तक के नाव - हीरा छत्तीसगढ़
    • लेखक - जागेश्वर प्रसाद
    • समीक्षक - जयंत साहू
    • मिले के ठउर - छत्तीसगढ़ी भवन, हांडीपारा, रायपुर

    छत्तीसगढ़ी समाज के स्वाभिमान जगाये के एक उदीम : हीरा छत्तीसगढ़

    जागेश्वर प्रसाद के निबंध पोथी ‘हीरा छत्तीसगढ़’ छत्तीसगढ़ी समाज के स्वाभिमान जगाये के एक जबर उदीम आए। येमा 23 ठी लेख ल समोखे गे हाबे। सबो लेख छत्तीसगढ़ी भासा म हावय जेला पढ़त तन-मन म सोसित छत्तीसगढि़या समाज बर अगाध पीरा उमड़थे। छत्तीसगढि़या मनके अस्मिता अउ स्वाभिमान खातिर छत्तीसगढ़ महतारी के एक हीरा सहिक बेटा जागेश्वर प्रसाद पाछु 55 साल ले मसाल ऊंचाये हावय। उंकरे सहिक पुरखा मनके तियाग, तपस्या अउ समरपन ले आज छत्तीसगढ़ म नवा बिहान आए हावय।

    ‘हीरा छत्तीसगढ़’ म तइहा के कतकोन पय ल पाठक मनके बीच राखे गे हाबे। जेमा पहिली लेख हमार हीरा-छत्तीसगढ़ म लेखक ह मानव जनम ल अनमोल बतावत लिखथे के– ‘जउन छत्तीसगढ़ के माटी अउ संस्कृति म रच-पच जाथे ओहर जरूर हीरा के गुन ल पा जाथे। अऊ जउन छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढि़या संग दोगलई करथे, भेदभाव रखथे ओहर पथरा बनके पथरा जाथे हीरा नइ बन पावय’। ओमन दिसंबर म जनम धरइया छत्तीसगढ़ के हीरा म संत गुरू घासीदास, जमींदार गोविंद सिंह, पं. सुंदरलाल शर्मा, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, धनश्याम सिंह गुप्त, कंगला मांझी, राजा रामानुज सिंहदेव, पं. जगदीश प्रसाद तिवारी, जयनारायण पांडेय संग रविशंकर शुक्ल, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, चंद्रिका प्रसाद पाण्डेय, हरि ठाकुर जी ल सुरता करे हावय। 

    इही रकम ले माटी पूत के लच्छन, छत्तीसगढि़या-गैर छत्तीसगढि़या के बीच लछमन रेखा, छत्तीसगढ़ी के दसा अउ दिसा, छत्तीसगढ़ी पत्रकारिता के बिकास यातरा, करजा ले मुक्त होना, छत्तीसगढ़ी समाज के पीछड़ापन के कारन अउ उपाय लेख म लेखक ह बहुत गंभीरता ले किथे के ‘जउन वर्ग या परिवार हीन भावना ले ऊपर उठके सिक्छा अउ संस्कार ल बदले के उदीम करथे ओही परिवार (समाज) ह आरथिक, सांस्कृतिक अउ राजनैतिक क्षेत्र म तरक्की घलो करिस’। आगू ओमन सहकारिता के जननी : छेरछेरा पुन्नी, पोरा-तीजा परब, घानी के बइला, सत संग, जीवन के असली जातरा- आठ कोसी जातरा जइसन लेख म मनखे ल दुनिया म अवतरे के कर्मकांड अउ मोक्ष कोति लेगे के रसता देखाये हावय। ओमन किथे के ‘ जउन जातरा ले जीवन-मरन के भंवर ले छुटकारा मिलथे। ओ जातरा ह अंदरमुखी, आध्यात्मिक होथे, येही जातरा ले मानव अपन परम लक्ष्य, परम शांति अउ परमानंद ल हासिल करथे। 

    जागेश्वर प्रसाद ल छत्तीसगढ़ी पत्रकारिता के पुरोधा कहे जाथे ओमन 1965 म प्रदेश के पहिली छत्तीसगढ़ी पत्रिका ‘छत्तीसगढ़ी सेवक’ के संपादन करिस। नवा लिखइया मनला एक मंच देके संगे-संग ओमन ल छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढि़या वाद के भावना ल जन-जन म बगराये के अभियान चलाइस। अऊ ये निबंध पोथी ‘हीरा छत्तीसगढ़’ म उही बखत के लिखे 22 ठी आलेख ल 88 पेज के पुस्तक के रूप म संग्रहित करके वैभव प्रकाशन के माध्यम ले पाठक तक पहुंचाये हाबे। ये किताब छत्तीसगढ़ के मूल निवासी मनके सामाजिक, आरथिक अउ राजनैतिक दसा-दिसा ऊपर चिंतन करइया बर घातेच उपयोगी हावय। 0 
    jayant sahu


    वरिष्ठ साहित्यकार आचार्य डॉ. दशरथ लाल निषाद ‘विद्रोही’ जी के व्यक्तित्व अउ कृतित्व‍ उपर जयंत साहू के विशेष लेख-


    दू कोरी ले आगर शोधपरक साहित्य के रचयिता : दशरथ लाल निषाद

    छत्तीसगढ़ के गवई गांव म रहन-सहन, खान-पान, नता-रिस्ता, पहनावा, सिंगार अउ बोली-भाखा के अलगेच महत्ता हावय। हम देखथन, सुनथन, महसूस करथन फेर ओला लिखे के बारे म सोचथन तव बिसय ह छोटकून लागथे। ये डहर काकरो धियाने नइ जाए। अऊ जेन कोति काकरो धियान नइ जावे उही म दशरथ बबा के जबर कलम चलथे। गवई गांव के लोक जीवन ल उजागर करत उं‍कर अब तक दू कोरी किताब छपगे हाबे, अऊ अतकेच कन पांडुलिपि छपे के अगोरा म हावय। दशरथ बबा ह छत्तीसगढ़ के पहिली अइसे साहित्यकार आए जेमन ग्राम्य जनजीवन ल रेखांकित करत सबले जादा किताब लिखे हावय, जइसे- छत्तीसगढ़ी सतसई, छत्तीसगढ़ के भाजी, छत्तीसगढ़ के कांदा, छत्तीसगढ़ के गांधी, छत्तीसगढ़ के पान, छत्तीसगढ़ के भक्तिन, छत्तीसगढ़ के बासी, छत्तीसगढ़ के मितानी, छत्तीसगढ़ के रोटी, छत्तीसगढ़ के फूल, छत्तीसगढ़ के मछरी-मास, छत्तीसगढ़ के चटनी, अऊ गजब अकन। दशरथ बबा के बारे म ये कहना गलत नइ होही के यदि आप डॉ. दशरथ लाल निषाद अऊ उंकर कृति ल जानथो तब तो आप छत्तीसगढ़ ल जानथो, छत्तीसगढ़ के साहित्य-कला-संस्कृति ल जानथव।   
    83 बछर के सियानी उमर म आज ओमन के शरीर जवाब देदे हावय, हांथ-गोड़ नी चले। तभो ले जिपरहा साहित्यकार दशरथ बबा ह अपन खटिया म कंप्यूटर वाला ल बइठा के नवा किताब के सिरजन म लगे हावय। शरीर भले थक गे हावय, फेर मन अउ आत्मा आज भी चेम्मर हावय माटी के लाल के। मगरलोड जिला धमतरी के दुरलवा आचार्य डॉ. दशरथ लाल निषाद ‘विद्रोही’ एक मध्यम किसान परिवार के गुनिक बेटा आए। संगम साहित्य समिति के माई मुड़ी। उंकर जनम तेंदूभाठा म 20 नवंबर 1938 के होइस। महानदी अउ पइरी के कोरा म बसे मगरलोड उंकर कर्मभूमि बनिस। पाख बरोबर अंधियारी अउ अंजोरी के दिन ल तापत अपन मेहनत के दम म दशरथ बबा ह बनि-भूति के संग पढ़ई तको करते रिहिन। हिन्दी साहित्य रत्न के परीक्षा पास करके 'आचार्य' के मानद उपाधि पाइन, अऊ ओ समे म ‘आयुर्वेद विशारद’ के परीक्षा म तको सफल होइन। ओमन अखबारी प्रचार अउ सोशल मीडिया ले कोसो दूरिहा, आंचलिक साहित्यकार अउ एक अनुभवी आयुर्वेद चिकित्सक के रूप म अंचल म जाने जाथे। 

    दशरथ बबा के आज जतके उमर होहे ओतके अकन ओमन सम्मान तको पा डरे हावय जेमा नागपुर, इलाहाबाद, इंदौर, हरियाणा, बिजनौर, हैदराबाद, पानीपत, गाजियाबाद, गुना, तलेन, हिमांचल प्रदेश, खंडवा, राजगढ़ अउ बैतूल जइसन शहर के बड़का संस्था कोति ले उनला सम्मानोपाधि मिले हावय अउ स्थानीय स्तर म सम्मानित होइन तेन अलग। हिन्दी म ओमन देशभर के आन-आन पत्रिका म गजब छपे हावय। फेर उंकर ठोस कृति छत्तीसगढ़ी म दिखथे जेहा किताब के संग छत्तीसगढ़ी के पहिली पत्रिका छत्तीसगढ़ी से‍वक, मयारू माटी, बरछाबारी, अंजोर, अऊ दैनिक समाचार पत्र के विशेषांक म प्रमुखता ले छपे हावय। दशरथ बबा ह साहित्य सिरजन भर नइ करत रिहिसे बल्कि अलग छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन म तको जबर योगदान दे हावय।

    दशरथ बबा के लेखन के जबर विशेषता आए के ओमन शोधपरक तथ्य लिखथे, चिंतन-मनन के बाद ओला कृति के रूप देथे। अब उंकर ‘छत्तीसगढ़ के कांदा’ किताब म देखव 41 प्रकार के कांदा के उल्लेख हावय- जिमी कांदा, कलिहारी कांदा, गुलाल कांदा, केंवट कांदा, ढुलेना कांदा, डांग कांदा, करू कांदा, जग मंडल कांदा, बनराकस कांदा, बरकान्दा, केशरुआ कांदा। अइसने ‘छत्तीसगढ़ के भाजी’ किताब म- गूमी भाजी, कोलियारी भाजी, मकोइया भाजी, भेंगरा भाजी, सेम्भर भाजी मनके सुवाद अउ लाभ तको बताये गे हावय। ‘छत्तीसगढ़ के सिंगार’ किताब म 76 सवांगा के बरनन हावय जेमा गहना गुठा, गोदना अउ ओनहा पहिरे के विधी विधान ह लिखाये हाबे। 

    दशरथ बबा के पुस्तक 'छत्तीसगढ़ के बासी' म अमरित बासी, चटनी बासी, बोरे बासी, दही बासी, कोदो बासी, पेज बासी, बासी भात अऊ केउ किसम के बरनन उंकर विशेषता सहित हावय। ‘छत्तीसगढ़ के मितानी’ ह इहां के लोक जीवन म मानवता के मया के जबर परिभाषा रखथे- महाप्रसाद, भोजली, गंगाजल, जंवारा, गंगाबारू जइसन नता के बंधना के रीति अउ विधि ले आजीवन चले के सीख संग परम्परा ल संजोये के गियान आधुनिक साहित्य समाज ल देवत हाबे दशरथ बबा ह।

    अइसने अड़तालिस पेज के छोटकून ‘छत्तीसगढ़ के चटनी’ किताब ल पढ़े म पढ़ते-पढ़त जीभ ह चटकारा लेथे अउ मुँह ले लार चुचवा जथे। ये विशेषता आए आचार्य डॉ. दशरथ लाल निषाद 'विद्रोही' जी के लेखन शैली के जोन 15 बछर के उमर ले सुरू होके आज 83 साल तक सरलग चलते हावय। भगवान ओमन ल गजब अऊ लम्बा उमर देवय ताकि हमन अइसने उंकर कलम ले शोधपरक साहित्य पढ़त राहन। संगे-संग सरकार ले घलोक गेलौली हावय के ओमन के दीर्घकालीन साहित्य सेवा ल देखत सर्वोच्च सम्मानोपाधि ले अलंकृत करय।

    0 जयंत साहू, रायपुर 9826753304

    Pitru Paksha 2020 : पितर पाख आज ले सुरू, छत्तीसगढ़ म तरपन संग पितर भात म बरा अउ तरोई के महत्ता


    रायपुर.2। छत्तीसगढ़ म आज ले सुरू होवत हाबे पितर पाख, घर के दुवारी म पुरखा मन खातिर चउक पुर के पान, दतुन, तरोई फूल अउ काशी माड़े घरो-घर दिखही। येहा पुरखा मनला सुरता करे के परब आए, जेन मन ए दुनिया म नइये। ‘पितर-बइसकी’ माने गणेश विसर्जन के दिन, भादो के अंधियारी ले लेके लगते कुंवार तक ‘पितर पाख’ मनाथे। पाख भर घर के बिते सियान मन ओसरी पारी आथे कोनो दिन बबा, त कोनो दिन बाबू के बबा। अइसे तीन पीढ़ी के पितर देवता मन धरती म आथे, ‘पितर-खेदा’ के दिन सबो फेर देवधाम चल देथे।


    पितर पाख कब हावय-

    एसो पितर पाख 2 सितंबर ले सुरू होवत हाबे। येला छत्तीसगढ़ के बाहिर पितृ पक्ष, श्राद्ध पर्व के रूप म देशभर म मनाए जाथे, छत्तीसगढ़ म ‘पितर पाख’ के रूप म मनाथे। देवलोक वासी पुरखा मनके सुरता के परब आए पितर ह, केहे जाथे के ये पाख म पुरखा मन धरती म आथे।

    पितर देवता के आसिस- 

    अइसे मानता हावय के जेन मन अपन पुरखा ल सुरता करके पानी नइ देवय ओमन ल पितर दोस लगथे। अऊ श्राद्ध करे ले ही पितरदोस ने मुक्ति मिलथे। येकर ले उंकर मन ल तको शांति मिलथे अउ हासी-खुसी ले पितर देवता मन घर-परिवार के खुसहाली के आसिस देके जाथे।


    कब-कब आही पितर- 

    पितर ह पाख भर चलथे अउ तिथि मुताबिक पुरखा मन ल सुरता करे जाथे। कोन दिन पितर माने जाए ये हा सियान के बिते के दिन ले रिथे। एक्कम, दूज, तिज, चउत पंचमी, छट, साते, आठे जइसे-जइसे बिते रिथे तइसे सियान मन ल पितर माने जाथे। नवमीं के दिन सबो सियनहिन मनला एके दिन मानथे। जेन मनके बिते दिन सुरता नइये तेन मनला आखरी म मान गुन करके पितर खेदे जाथे।

    पितर बर जेवन-

    पितर पाख जइसे के येहा पुरखा मनला सुरता करे के परब आए तव सियान मनके पसंद के तको खियाल करे जाथे। बरा, बोबरा, सोहारी, खीर अउ तरोई साग तो चुरबे करथे अऊ संग म सियान के पसंद के भोजन तको बनाके देथे।  

    पहिली पितर अउ पितर भात-

    छत्तीसगढ़ म बिते सियान ल पहिली पितर माने खातिर नता-गोतर के हियाव करके नेवता पठोय जाथे। डोकरा मनला जेन दिन उंकर स्वर्गवास होए रिथे उही तिथि के पितर मानथे। अउ डोकरी मनला नवमीं के दिन पितर मिलाथे। पितर मिलाथे ते दिन तरपन करके पितर मनला खाए बर देके बाद गांव कुटुम ल तको पितर भात खवाथे। 


    पितर माने के विधी-विधान, जेवन म उरिद दार अउ तरोई के महत्ता : वरिष्ठ साहित्यकार सुशील भोले के अनुसार-:



    ‘पितर पाख के लगते माई लोगिन मन घर के दुवारी ल बने गोबर म लीप के वोमा चउंक, रंगोली आदि बनाथें अउ फूल चढ़ा के सजाथें। वोकर पाछू उरिद दार के बरा बनाथें जेमा नून नइ डारे जाय। संग म बोबरा, गुरहा चीला आदि घलोक बनाए जाथे अउ साग के रूप म तरोई ल आरुग तेल म छउंके जाथे। 

    जानबा राहय के ए पाख म तरोई के विशेष महत्व होथे। घर के दरवाजा म जेन गोबर लीप के चउंक पूरे जाथे वोमा आने फूल मन के संगे-संग तरोई के फूल घलोक चढ़ाए जाथे। वइसने साग तो सिरिफ तरोई ल तेल म छउंक के दिए जाथे अउ पितर मनला जेन जगा हूम-धूप अउ बरा-बोबरा दिए जाथे उहू ल तरोई के पान म रख के दिए जाथे। 
    अइसे मानता हे के तरोई तारने वाला जिनीस आय काबर के ये शब्द के उत्पत्ति तारन ले तरोई होए हे। वइसे तरोई ह पाचक अउ स्वादिष्ट होथे जेमा अनेकों किसम के पुस्टई होथे फेर बने नरम-नरम घलोक होथे, जेला भोभला डोकरा-डोकरी मन आसानी के साथ पगुरा के लील डारथें। आखिर पितर मन ला तो हमन उहिच रूप म सुरता करथन न।

    वइसे तो अपन पुरखा मन के कई पीढ़ी तक के सुरता अउ तरपन करना चाही फेर जे मन अइसन करे म अपन आप ल सक्षम नइ पावंय वोमन पितर पाख म गया जी (बिहार राज्य) म जाके उंकर तरपन करके हर बछर के सुरता अउ तरपन ले मुक्ति पा जथें। अइसे मानता हे के जेकर मन के तरपन ल पितर पाख म गया जी म कर दिए जाथे वोमन ल मोक्ष मिल जाथे, वोकर बाद फेर वोकर मन के तरपन करना जरूरी नइ राहय। वइसे जेकर मन के श्रद्धा अउ सामरथ हे वोमन अपन पुरखा मन के सुरता अउ तरपन गया जी म तरपन करे के बाद घलोक कर सकथें। एमा कोनो किसम के बंधन या दोस नइ माने जाय। तरपन देवइया मनला जल-अरपन करे के बेर उत्ती मुड़ा म मुंह करके जल अरपन करना चाही अउ ए बखत अपन खांध म सादा रंग के कांचा कपड़ा पंछा आदि घलोक रखना चाही।

    वइसे तो हिन्दू धर्म अउ रीति रिवाज के मुताबिक पितर मानये के कई विधी बताये गे हावय, फेर लोक जीवन म ग्राम्य  मानता के अनुसार जेन प्रचिलित हावय तेनो ह गुनिक सियान मनके चलागन आए ये सेती जेन तइहा समे ले घर के सियान मन मानत आवत हाबे उही मुताबिक परब ल मनाना चाहि। आन देश या राज्यक ले देखे जाए तव छत्तीरसगढ़ रीजि रिवाज म जादा कुछ अंतर नइ दिखे।’ 

    पितर देवता मन खातिर नेवता, चउंक पुरे अंगना म पानी अउ पिड़हा मड़ाके आव-भगत, नदिया-नरवा-तरिया म काशी, तरोई ले तरपन। मन पसंद भोजन म उरिद दार के बरा, अऊ छानही म कउवा मनला देख के दू परोसा उपराहा देना, पुरखा मनके सुघ्घर सुरतांजलि आए।

    कोरोना के सेती गांवबंदी



    कोरोना वायरस अब अपन जनम भुइंया चीन के वुहान ले निकलगे हावय सरी दुनिया खुवार करे खातिर। कोनो नी जाने रे भाई कतका के जीव लेके आवत हावय। कोनो नी जाने रे भाई येकर दवई ल। बीमारी होही अउ पट ले मरबे अइसन तको तो नी हे रे भाई। अपन तो जाही अउ संग म जतका झिन सपेड़ा म आही, रपेट के ले जही। अलवा-जलवा झिन जान रे भाई तीन हजार किलोमीटर ले उड़ाके आये हाबे माने हाहाकार मचाके जाही। अइसन गोठबात संग कतकोन गांव के जागरूक लोगन मन गांवबंदी करे हावय। माने अपन गांव म अवइया रद्दा ल ही बंद कर दे हावय। अइसे नहीं के आड़ काट के चैन से सुते हावय बल्कि ओसरीपारी पाहरा तको देवत हावय। जय जय होवय अइसन सोचे बिचारे फइसला के। सबो बने बने रही तव जरूर मेहनत के फल मिलही अउ गांव का सरी जग ये चाइना के कोरोना बीमारी ले उबरही।

    लोगन के मन म सवाल उमड़त हावय के ये बीमारी हमर कोती कइसे आइस। तव बात अइसे हे के कोरोना नाव के वायरस ले हमर देश म विदेश ले अवइया लोगन मन धरके लानिस। कोनो विदेश घुमे बर गे रिहिसे, कोनो पढ़े बर गे रिहिसे अउ कतकोन झिन मन रूपिया कमाये बर गे रिहिसे। अब ये बात सोचव की जेमन विदेश म रिहिन तेन मनला का जानबा नी रिहिसे के कोरोना महामारी सचरत हावय, कम पढ़े अप्पढ़ तो नोहय। सब के सब जानत रिहिसे के ये कोरोना बहुत ही जी लेवा बीमारी आए। इही पाके तो उहां ले धकर-लकर भागिस अउ अपन-अपन घर म आगे। उहां ले बांच के आये के बाद इहां उही लोगन मन जीव बांचगे ददा कहिके गली-गली छैलानी मारिस। इहां-उहां न जाने कहां-कहां वायरस ल बगरा दिस। जबकी ओमन ला कानोकान चेताये रिहिसे के कहूंच नी जाना हे अकेल्ला रहना हाबे। घेरे-बेरी हाथ धोना हे, ते जेकर तिर म जाबे तेकरो उपर ये वायरस खुसरही। 

    पढ़े लिखे अड़हा मन के गलती के भुगतना अब सरी देश भुगतत हावय। देश म 21 दिन के कर्फ्यू लगे हावय। सरकार साफ-साफ चेताय हाबे के कोनो ल बाहिर नी निकलना हाबे। ये मामला म हमर छत्तीसगढ़ के गांव के लोगन म बने चेत करत हावय अपन-अपन गांव के मेड़ों में कांटा छरप के बाहिर के अवइया-जवइया ल रोकत हावय। बहुत अकन गांव के लोगन मन रद्दा म पेड़ गिरा के आन आदमी मनके अवइ ल रोकत हावय। गांव के जवान मन परहरा देवत हावय के कोनो गांव ले बाहिर न जा सके अउ न कोनो गांव भीतर आ सके। अइसने साव चेत राहव हो। गांव म निस्तारी करव। हांसी-खुशी ले दुबर दिन काटव। जेन होही बनेच होही इही आस राखे राहव।

    कोरोना के रोना


    कोरोना नाव के महामारी ह सरी दुनिया ल मउत के तमासा देखावत हावय। अबतक दुनिया के 200 देश म हाहाकार मचे हाबे। किथे के चीन के वुहान शहर म ये महामारी के जनम होहे। जानवर ले मनखे म आये ये कोरोना कोविड- 19 नाव के वायरस के अब तक कोनो ईलाज नी पाये हाबे। दुनिया भर के डाक्टर मन प्रयास म दिन रात लगे हावय। बड़ अंचभा के बात आए के सबले ज्यादा कोरोना के वायरस उही देश म जादा बगरिस जिहा साफ-सफई अउ आधुनिक चिकित्सा विकसीत हाबे। बताथे के येहा अतका खतरनाक वायरस आए के बगरत देरी नी लागय। पल भर म कहां ले कहां बगर जथे। 
    बात सुरूआत के करन तव चीन देश के वुहान शहर ले जनवरी महीना के बात आए। अबतक कोरोना ह तीने महीना म ही दुनिया 200 देश ल अपने चपेट म ले डरे हावय। WHO के ताजा आकड़ा के मुताबिक आज 465,915 केस आगु आए हाबे। अउ 21,031 के मउत के पुष्टि तको हो चुके हावय। ये आंकड़ा तो WHO ल मिले पुख्ता जानकारी के आए, हो सकत हे येकर ले अउ केउ गुना मरीज के मउत होय होही !
    कोरोना के सेती दुनिया के 20 देश ह लॉकडाउन होगे हावय माने कोनो ल कहुंचो नी जाना हाबे। सबो ल दुबक के घरे म रहना हाबे। भारत सरकार 24 मार्च ले पूरा देश म लॉकडाउन लागू करे हावय। अपन कोति ले सरकार तीन हफ्ता के टेम दे हावय मनखे मनला, ये बीच रूक जही बीमारी के फैलाव ह तो बने बात नहीं त चारो कोति मउत ही मउत दिखही। घर म रेहे ले भी ज्यादा जरूरी हे बाहिर के लोगन मन ले बचना हावय। कोन जनि कोन कहां ले आये होही ? ये जरूरी तो नही के अनजान आदमी ही बीमारी लानही, चिनजान के ह तको अनजाने म बीमारी लान देही। तव अइसन म साफ-सफाई के धियान रखना घातेच जरूरी होगे हावय। 
    जब ले देश म 21 दिन लॉकडाउन के घोसना होय हाबे लोगन मन आनी-बानी के गोठ गोठियावत हाबे। फेर कोनो ह उखान के पूरा नी बांध सके। ये पार्टी, ओ पार्टी करे ले कोरोना का लुवाठ मरही। सबो ह सुनता बंधा के कोनो नेक उदीम करव तभे बुता बनही। गुनन त भले 21 दिन जिनगी ले जादा लंबा नी हे फेर रोज कमइया खवइया मनके का होही? अइसन बखत म बीमारी ले लड़े के संगे-संग जेन मनखे के कोनो दोस नी हे ओमन भूख झिन मरे इहू बात ह लॉकडाउन के करार ल पोट्ठाही। 

    सुनइ तो अब इहू बात के आए हाबय के छत्तीसगढ़ म कोरोना के तीसरा स्टेज के लक्षण आगे हावय। तीसरा स्टेज वो हरय जेमा कोनो आन आदमी, जे कोरोना पाजेटिव रिथे ओकर संपर्क म आये ले तीसर ह संक्रमित हो जथे। ये बहुत ही खतरनाक स्थिति आए वुहान म बीमारी सचरिस, उंहा ले कोनो बीमारी धरे आइस अउ इहां बगरा दिस। सोचो अब हाथ ले हाथ अतका दिन म कतका हाथ म बगरगे होही। इही हाथ ले हाथ के कड़ी ल ही लॉकडाउन ह टोरही अउ सरी दुनिया ह कोरोना ले उबरही। बाद म भले बेरा के गोठ निकलही के कोरोना ल हमर छत्तीसगढ़ म कोन लानिस, का ओला जनबा नी रिहिसे? अभी तो भितरेच म राहव।

    चंदैनी गोंदा म खुमान साव जी के भूमिका

    लोकसंगीत के पुरोधा: खुमान लाल साव



    जन मन के गीत ल जन-जन के अंतस म उतारने वाला महान संगीतकार खुमान साव अब हमर बीच नइ रिहिन। 5 सिंतबर 1929 के अवतरे खुमान लाल साव जी ह 90 बच्छर के उमर म 9 जून 2019 के ये दुनिया ल छोड़ दिस अऊ जावत-जावत हारमोनियम अउ तबला के संगत म सबला रोवावत कहिगे- 'माटी होही तोर चोला रे संगी, माटी होही तोर चोला...।' सिरतोन म ये चोला माटी के तो आए अउ सबला एक दिन दुनिया छोड़ उही माटी म जाना हावय। फेर ये नश्वर दुनिया म उंकरे अवई ह सार्थक होथे जेन जावत खानी अपन काम के बुति जबर नाम छोड़ जाथे। लोक संगीत के दुनिया म खुमान लाल साव जी एक अइसे नाम आए जेन ल जन-जन जानथे। 
    साव जी ये मुकाम तक पहुंचे बर गजब मेहनत करे हावय, 14 बच्छर के नान्हे उमर म संगीत के लगन ह उनला नाचा पेखन ले जोड़ दिस। दाऊ मंदराजी के रवेली साज के अलावा अऊ कतकोन नाचा पार्टी, आर्केस्टा उक म अपन संगीत के धाक जमाईस। साव जी आन-आन संगीत समिति ले जुड़े बर तो जुड़िस फेर ओकर मन ह तो छत्तीसगढ़ के लोक संगीत बर कुछ ठोस काम करे बर मनन करते राहय, ठउका उही बखत दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ह उनला अपन संस्था म शामिल करिस अउ फेर ताहन शुरू होइस मिशन चंदैनी गोंदा। साव जी ह अपन बारे म कहाय कि जब मैं दाऊ रामचंद्र देशमुख जी संग जुरेव तव कई महीना ले अपन घर-दुवार, खेती-खार, परिवार सब ल छोड़के संगीत के कठिन साधना करेवं। 



    14 बच्छर के उमर ले सुरू होय संगीत साधना के सफर ह अंतिम सांस तक जारी रिहिस। अऊ ये कला यात्रा म धुप छॉव सही कतकोन दुख-सुख उंकर आगू आइस जेकर ने लड़के छत्तीसगढ़ी लोककला मंच के सर्जक दाऊ रामचंद्र देशमुख जी के बाद चंदैनी गोंदा के सियानी पागा बांधे दाऊ जी के सपना ल पूरे करे म कोनो कसर नइ छोड़िन। कला के प्रति समर्पण ल देखत लोक संगीतज्ञ खुमान साव जी ल हम छत्तीसगढ़ी कला संस्कृति अउ साहित्य के क्रांति युग 1971 के आखरी महारथी कहि सकथन। अऊ अब उंकर जाए ले माने एक युग सिरागे। साव जी घलोक दाऊ रामचंद्र देशमुख के सानिध्य म छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया के अस्तित्व अउ अस्मिता के बात अपन गीत-संगीत अउ गम्मत के माध्यम ले आम जनता के बीच राखे के प्रयास करय। गुनी जन मन कहिथे कि दाऊ रामचंद्र देशमुख के चंदैनी गोंदा सिरिफ सांस्कृतिक संस्था भर नइ रिहिस भलुक एक मिशन रिहिस छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया मनके अस्तित्व अउ अस्मिता जागाए के। जेमा खुमान लाल साव जी के भी अहम भूमिका रिहिसे। 


    अतका साल बाद अब अइसे लगथे कि दाऊ जी के सपना ह साकार रूप लेवथे। गांव-गांव म छत्तीसगढ़ी कला, संस्कृति अउ साहित्य के संस्था बनगे हावय। अलग छत्तीसगढ़ राज बनगे। छत्तीसगढ़ी म गीत, गजल, कहानी, बियंग, उपन्यास सबे कुछ लिखे जावथे। वइसे दाऊ रामचंद्र देशमुख जी ल देखे के सौभाग्य तो नइ मिलिस हमला फेर जतका उनला पढ़े हाबन ते मुताबिक इहिच तो सपना रिहिस दाऊ जी के जेन ल पुरा करे खातिर खुमान साव जी ल अपन संग जोड़ के मिशन चंदैनी गोंदा के माध्यम ले छत्तीसगढ़ म छत्तीसगढ़ी कला संस्कृति अउ साहित्य के अलख जगाइस। दाऊ जी के अधुरा सपना ल खुमान साव जी ह पूरा होवत अपन नजरभर देखे हावय अउ ओमन सरग म जाके ये सब बात ल उनला जरूर बताइन होही। 



    अलग छत्तीसगढ़ राज बने के बाद कई बार चंदैनी गोंदा के कार्यक्रम देखे के अवसर मिलिस। गजब के प्रस्तुतिकरण रिथे, शहर म तो एके दू घंटा के होथे पर असल आनंद तो गांव के मंच म रातभर देखे ले आथे। लगभग 30-40 कलाकार के दल ल अतका साल तक चलाना साव जी के कुशल नेतृत्व क्षमता ल दर्शाथे। चंदैनी गोंदा के कार्यक्रम जेन भी गांव म लगे होही ओमन साव जी के बेवहार ले भी वाकिफ होही। गांव के लोगन जब कार्यक्रम लगाये बर जाथे तो साव जी आगूच म रट-रट माने सोज-सोज बात करय, अतका कन देबे, एदइसे-एदइसे कार्यक्रम होही अउ गांव म तै अइसन बेवस्था बनाके राखबे। साव जी साफ-साफ बात करय भले सामने वाला ल लगय के सियान ह कड़ा जुबान के हावय फेर साव जी तो साफ अउ नेक दिल के स्वाभिमानी व्यक्ति रिहिसे। उन जीवन म कभु अपन स्वाभिमान संग समझौता नइ करिन। स्वाभिमानी अउ सिद्धांतवादी साव जी अनुशासन के पक्का रिहिसे जेन गांव म भी कार्यक्रम लगय उहां कोनो भी विकट परिस्थिति होवय पहुंचय जरूर। चंदैनी गोंदा के अलावा अउ कोई संस्था छत्तीसगढ़ शायद ही होही जेमा 30-40 हजार के दर्शक जुटत होही। अतका भीड़ ल संभालना अउ रातभर मंच ले जोड़े रखना साव जी के कुशल निर्देशन क्षमता अउ प्रतस्तुतिकरण के ऊंचाई ल दर्शाथे। 21 वीं सदी के भारत म पुरातन छत्तीसगढ़ के लोकरंग के अमिट छाप छोड़ना चंदैनी गोंदा के मिशन अउ खुमान साव जी मेहनत ले ही साकार होइस। 
    मिशन चंदैनी गोंदा के कारण ही आज छत्तीसगढ़ के लोक कला कहा ले कहा पहुंचगे हावय। केहे जाथे कि छत्तीसगढ़ के लोक जीवन म कला, संस्कृति अउ साहित्य ह तइहा समे ले अब तक वाचिक परंपरा म संरक्षित हावय। जुन्ना सियान मन भलुक आखर गियान कोति चेत नइ करिन फेर अपन परंपरा अउ संस्कृति के सरेखा करे के बड़ सुघ्घर उदिम करिन किस्सा-कहिनी अउ गीत-गाथा के रूप म अपन लोक कंठ म सहेजे के। पीढ़ी दर पीढ़ी उही लोक कला-संस्कृति अउ साहित्य ह आज मौखिक ले लिखित युग तक पहुंचगे हावय अउ ये समयांतराल म बखत के कतकोन धुर्रा माटी के लबादा ह उनला प्रभावित करे के कोशिश म लगे रिहिस तभे देवता सहीं छत्तीसगढ़ के माटी म दाऊ दुलार सिंह मंदराजी अउ दाऊ रामचंद्र देशमुख के बाना उचइया खुमान लाल साव जइसन व्यक्तित्व के जनम होइस। 



    खुमान साव जी ह अपन जीवन भर लोक म बगरे गीत कर्मा, ददरिया, सुवा, गउरा-गउरी, भोजली, पंथी, फाग, जसगीत, बिहाव गीत, सोहर गीत के अलावा अऊ आन पारंपरिक गीत मनला संकलित करके ओला नवा साज संगत म पिरो के मौलिकता के संग लोकप्रिय बनाये के जबर बुता करे हावय। एक तरह से केहे जाए तव छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोकगीत मन खुमान साव जी के संगीत ले नवा जीवन पाइस नहिते आधुनिकता के बरोड़ा अउ पाश्चात्य संगीत के प्रभाव ह जीलेवा हो जतिस। उकरे मेहनत के परसादे आज घर-घर म चंदैनी गोंदा के गाना बाजथे अउ ओकर गीत बिगर तो कोनो नेंग-जोग पूरा नइ होवय। 
    बिहाव संस्कार के गीत ल ही देखव ना एक डहर दफड़ा, दमउ अउ मोहरी म चुलमाटी, तेलमाटी, मायन भड़उनी, टिकावन अउ बिदाई गीत बाजत रिथे अउ दूसर कोति दाई-माई, ढेड़हिन सुवासिन मन बिहाव के नेंग-जोग करत रिथे। छट्टी छेवारी आगे अब सोहर गाना हावय तव चंदैनी गोंदा के गीत बजाव। परंपरा के निर्वाह अउ धार्मिक  अनुष्ठान बर पंथी, गउरा गउरी, सुवा, जसगीत, फाग, राउत नाचा अऊ उच्छाह मंगल बर कर्मा, ददरिया के लोकधुन। चंदैनी गोंदा अउ खुमान साव के ओढ़र म आज भले हम लोकगीत के बात करत हन फेर येमा छत्तीसगढ़ के कला संस्कृति अउ साहित्य तको समाय हाबे। कला संस्कृति संग साहित्य घलो मिशन चंदैनी गोंदा के हिस्सा रिहिसे। आज के समे म हमर युवा पीढ़ी ह मौखिक ले लिखित परंपरा म आगे हावय तव हमरो जिम्मेदारी बनथे कि अपन पुराखा के करनी करम के सरेखा करन जेकर ले हमर अवइया पीढ़ी तको 1927 अउ 1971 के छत्तीसगढ़ी कला संस्कृति अउ साहित्य के पुरोधा मनके योगदान ल सुरता राखे राहय।  
    - जयंत साहू, डूण्डा, रायपुर 
    [9826753304]
     jayanysahu9@gmail.com

    छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य के चंदैनी शैली के संरक्षण म लोक प्रहसन के भूमिका

    रेडियोवार्ता: अकाशवाणी केन्द्र रायपुर
    छत्तीसगढ़ ल वइसे तो लोक कला अउ साहित्य के गढ़ केहे जाथे। इहां जतेक भी लोक जीवन म कला बगरे हे, साहित्य के जरई फोकियाए हे। ओमा हर प्रकार ले लोक जीवन के छइंहा दिखथे। या लोक कला के बारे म इही कई सकथन के लोक जनमानस जेकर प्रदर्शन करथे उही ह हमर लोक कला के रूप म आगू आथे। अउ संस्कृति ह लोक जीवन के अंग आय काबर की लोक ह जोन जीवन जीथे ओही ह ओकर संस्कृति आए। अबहो घलोक अब कहू हम अपन लोक कला अउ साहित्य ल लिखित रूप म संरक्षित राखे के बारे म विचार करबोन त ये करा जबर अड़चन इही आथे कि हम कतका ल लिख-लिख के राखे राहन। अउ का हम संरक्षण के बात करथन तव ओला लिखेच के गोठ काबर करथन। का संरक्षित करे के दूसर अऊ कोनो रद्दा नइ हो सके। जइसे हमर अंचल के लोक कलाकार मन अपन लोककला मंच के माध्यम ले इहां के लोक परंपरा अउ संस्कृति ल देखाथे। अगर हम वोकर कला ल देख के लिखे सकन तव तो ठीक हे, अउ नइ लिखेन तव का वोहा नंदा जही, अइसन बात नोहे। केहे के मतलब वोहा कभु नइ नंदावे। काबर कि हम अब अपन कला अउ संस्कृति ल जीयत हाबन।



    आज जतेक भी लोककला ह अंतर्राष्ट्रीय अउ राष्ट्रीय मंच म प्रसिद्धी पाए हे वोकर कारण रिहिस के वोकर प्रदर्शन म विविधता रिहिस। समय के संग वोकर स्वरूप म नावा-नावा प्रयोग होवत गीस। इही नवा प्रयोग ले इलौता विधा चंदैनीच भर ह बांचगे हाबे। लोक नाट्य के दूसर विधा याने नाचा हम देखथन तव ओमा आनी-बानी के गीत अउ प्रहसन ह मिंझरगे हाबे। समय के संगे-संग नवा-नवा गीत-संगीत के समावेश होगे हाबे। अब अइसन चंदैनी विधा संग काबर नइ होइस ये हा चिंता अउ चिंतन करे के बात आए।
    जइसे हम कोनो के मुंह ले सुनथन कि फलाना जगा चंदैनी होवत हाबे। तव सुनते साठ हमर मन म एके ठन चित्र दिखथे लोरिक-चंदा के। वास्तव म आज तक जतेक भी कलाकार मन ह चंदैनी विधा ल धरे हे, सुरू ले अब तक सिरिफ उहीच कथा-प्रहसन ल अनेक मंच म खेलत हे। देखइया मन तको उहीच-उही ल बार-बार देखत हे। अब ओमा के प्रहसन के बात करन अउ अन्य दूसर विधा ले ओकर तुलना करन, तव हम जान पाबो के ये लोरिक अउ चंदा प्रहसन ही चंदैनी शैली के बड़वार म अड़चन बनिस। ये विषय म अगर लोक कला अउ संस्कृतिकर्मी मन कइही कि चंदैनी म लोरिक चंदा किस्सा भर ल गाना हे तभे ओ चंदैनी शैली परिपूर्ण होही। कतको झिन के ये मानना हे कि लोरिक-चंदा ही चंदैनी आए। जबकि अइसन नइ हे। जे कलाकर साहित्यकार मन के ये मनना हे कि लोरिक चंदा अउ चंदैनी एक दूसर के परियाए आय तव ऐ मेरन वो बात के पै उघारना जरूरी हे कि अइसन बात रिहिस तव लोरिक चंदा ल लोकगीत, लोकभजन अउ बांस के कलाकार मन काबर गाये। लोरिक चंदा के उहीच किस्सा ल हम गीत नाटक अउ कथा-कंथली के माध्यम ले तको सुनथन। ये बात चिंतन करे के आय कि जब विधा के संरक्षण के बात करथन तव ये बात तको होना चाही के चंदैनी म तको आवत नावा प्रयोग, माने नावा प्रसंग ल लोक नाट्य चंदैनी शैली के संरक्षण म एक नव प्रयास के रूप म देखे जाना चाही। अउ ओकर भरपूर समर्थन होना चाही।




    जइसे के ये बात ल तो सबो कोनो मानथन कि इहां कथा-कंथली के कोनो कमी नइ हे। अउ इहां के लोक नाट्य के नाचा विधा हर ये मामला गजब धनी हे काबर के ओला तो अनेक प्रसंग मिले हे मंचन बर, ओला कोनो बंधन तको नइ हे कि इही लोक प्रहसन ल खेलतेच रहना हे। जइसे चंदैनी वाला मन खेलत आवथे- " जय महामाई मोहबा के वो, अखरा के गुरू बैताले ये मोर, चौसठ जोगनी पुरखा के वो, भुजा पर होई सहाई वो मोर, सिया रामा सिया रामा सिया रामा हो, बंशी के बजइया मन मोहना ये तोर।"
    ये प्रसंग म राजा महर के बेटी राजकुमारी चंदा अउ लोरिक राऊत के प्रहसन निकलथे। एमा एक राजकुमारी ह गांव के चरवाहा संग प्रेम करथे। ओकर कारण, अनेक कथाकार मन अपन-अपन ढंग ले प्रस्तुत करथे। फेर सबो के कथा म इही समानता आथे कि लोरिक एक गांव के चरवाहा होय के संगे-संग एक वीर योद्धा तको रिहिस। लोरिक ह आदमखोर बघवा ल अकेल्ला मार गिराथे। चंदैनी के कलाकर मन चुकि एक मंच नाटक के रूप म प्रस्तुत करथे तेन पाय के ओकर प्रहसन ह हांसी-ठट्ठा के किस्सा ले सुरू होथे। आम जन मानस ह लोरिक-चंदा म चार पात्र ल मंच म देखथे, जेमा सूत्रधार बने लोरिक ह कथा ल आगू बढ़ावत, कथा ल गावत रिथे। ओकर बाद के तीन कलाकार जेन मन चंदैनी के जान आए वोमा हे राजकुमारी चंदा अउ लोरिक राउत के गोसइन दौना मांजर। तीसरइया म पारी आथे लोरिक के डोकरीदाई जेन चंदैनी म मल्लीन दाई के नाम से जाने जाथे। मल्लीन के संवाद ले लोगन म हास्य के उमंग छूटथे। तव राजकुमारी चंदा हा अपन मया ल पाये के नाना उदीम करथे। उहे दौना मांजर घरेलू औरत के किरदार म जीव पारथे। आज के लोक जन मानस ह चंदैनी म इही तीनो-चारो पात्र के माध्यम ले मल्लीन घर के पासा पाली खेलना, दौना मांजर अउ राजकुमारी चंदा के बीच झगरा। ये प्रकार ले अब तक चंदैनी म अतकेच किस्सा ल देखत-सुनत आए हाबन।




    अब कलाप्रेमी मन ल तको पारंपरिक के साथ-साथ ओमा कुछ अऊ देखे-सुने के चुलुक लागत हे। फेर चंदैनी शैली म कुछू अऊ उपराहा करे के गुंजाइसे नइ दिखे। अइसन म अब चंदैनी के तर्ज म दूसर कोनो प्रहसन आथे त वोहा निश्चित ही चंदैनी बर अमृत समान होही। छत्तीसगढ़ राज निर्माण के बाद अब चंदैनी के संरक्षण बर तको बहुत काम होवथे। ये जानके खुशी अऊ बाढ़थे कि प्रयोग म चंदैनी के प्रस्तुतीकरण माने ओकर गीत-संगीत ल मुख्य आधार मान के, प्रहसन माने कथा म आन कथा ल समोख के चंदैनी ल फेर हरियाए के मउका देवत हे। अंचल म अनेक लोक कथा हे जोन ल चंदैनी के तर्ज म पिरो के प्रस्तुती करे के सुरूवात तको होगे हाबे। अभी तक चंदैनी के पच्चासो दल सक्रीय हे जेन मन सिरिफ लोरिक अउ चंदा के प्रसंग के सेती अधिक मंचीय प्रस्तुती नइ दे पावत हे। आज जबकि दूसर विधा मन म अतेक विविधता आगे हे तव चंदैनी संग ये तो होनेच रिहिस। 
    अब अंचल के लोक कला मर्मज्ञ चकोर के प्रयास ले चंदैनी शैली ल फेर नवा दिशा दे के उदीम होवथाबे। लोरिक-चंदा बरोबर टेकहराजा के प्रसंग ल अब वोमन मंच म खेलत हे- " आगुच सुमिरौ में पंच देवा, फेर जे दे जनम परान। सुमिरन करवं में ह पाली पहर, ये दे दिये हे जेन गियान। सुमिरन करवं में ह कुल देवता, दया मया जेन ले लें।। सुमिरन करंव में ह डिहसरी, कुवां डबरी नरवा खेव। डोंगरगढ़ के देवी बमलाई मोर, कुदरगढ़िन माई। खल्लारी गोहरावौं बरन-बरन, गोहरावौ दंतेश्वरी दाई। भोरमदेव ल पठोयेंव नेवता, नेवता नीक राजीम धाम। बारसूर सिरपूर पठोयेंव, बदौ जेकर नाम रे संगवार रे मोर..." अइसन वंदना के बाद सुरू होथे टेकहाराजा प्रहसन ह। टेकहाराजा के प्रहसन सिरसागढ़ राज्य के राजा धनराज अउ रानी पवांरा के इकलौता पुत्र मनसुख के जीवन चरित्र ऊपर केंद्रित हे। टेकहाराजा ह बड़ जिद्दी प्रवृत्ति के रिहिस जेन काम ल करे बर जोंग दय उहीच काम ल फत पारे, इही पाय के ओकर नाम टेकहाराजा परगे। कथा म आगू बताथे कि एक दिन टेकहाराजा हा अपन प्रजा के दुख-दरद जाने बर अपन राज्य म भ्रमण करे बर निकलथे। ओ कोति ढालू अउ केवंरा नाव के प्रेमी-प्रेमिका अपन मन के गोठ गोठियाए बर उही लच्छूखेव म मिले बर आय रिहिस। अइसने बाते-बात म ढालू ह अपन केवंरा ल चार चरितर के बात बताथे। 
    • पहिली बात- अपन के जहिजाद कोनो ल होय कभूच नइ धराना चाही। 
    • दूसर- अपन के माहंगी जीनिस अनचिनहार ल कभूच झन धराय।
    • तीसर- नीच बिचार, नीच बेवहार नइते नीच बुता करइया के चाकरी कभूच नइ करना चाही।
    • चौथा- बिहाव होय सगियान नारी ल जादा दिन ले मइके म झन राखय। 

    ये चारो बात ल ढालू ह अपन केवंरा ल बताथे फेर ओला टेकहाराजा तको सुन डारथे अउ राजा ह अपन नाम के मुताबिक चारो बात के थाह ले बर निकल जथे। ओरी-ओरी सबो बात के परछो लेथे। चारो बात ह सिरतोन हो जथे। अइसन ढंग ले ये कथा ह प्रहसन के रूप म लोगन ल भरपूर मनोरंजन के संगे-संग समाज म गियान के अंजोर तको बगराइस। चंदैनी के अइसने दूसर प्रहसन आथे खोखन खल्लू के झूला-झांझरी म। जेन म एक चतुर ठग ह कइसे ढंग ले लोगन ल अंध विश्वास के जाल म फांस के धोखाधड़ी करथे। भोला-भाला मानुख मन के संगे-संग बने साव मनखे तको ठगी के सिकार हो जथे। ये मेरन प्रहसन के मूल उद्देश्य ल अउ किस्सा ल बताना ये पाय के जरूरी हे काबर की हमन चंदैनी के संरक्षण अउ संवर्धन के गोठ करत हन।




    आज छत्तीसगढ़ अंचल म लोक कथा के अकूत भंडार हे। जेन प्राय: वाचिक परंपरा म फलत-फूलत हे। वर्तमान संदर्भ म कुछ-कुछ अब प्रकाशित घलव होय लगे हवै। एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी लोक कथा गायन के परंपरा के गति ह अब धिरलगहा हो चुके हे। जेखर गजब अकन कारण हे। मूल करण पारंपरिक जाति मन के परिवार के भरण पोषण अउ स्वयं के अस्तिव ल बचाए रखे खातिर लगातार जूझई। आधुनिकता अउ सिनेमा के चलत पारंपरिक लोक कला द्वारा उकर रोजी-रोटी जुटाय म असमर्थ होना, जेला सबो जानथे। इही पाय के आज कलाकार मन तको उही कला कोति लोरघत हे जेन कोति जादा आमदनी होथे या जेन विधा म काम करे से उंखर रोजी रोटी चल सके। चंदैनी के पिछवाय के एक ठिनकारण इहू रिहिस। अब जबकि चंदैनी शैली के उन्नयन बर नवा काम होवथे ओकर गीत-संगीत अउ मंचन ल आरूग रख के सिरिफ ओकर कथा ल परिवर्तित करके जुन्नाए तन म नवा सवांगा पहिराके फेर चंदैनी ल जन जन म लोकप्रिय बनाय जा सकत हे।

    - जयंत साहू 
    ग्राम-डूण्डा, पोस्ट-सेजबहार, रायपुर छ.ग.
     मो. 9826753304

    छत्तीसगढ़ी लोकगाथा

    छत्तीसगढ़ी रेडियो वार्ता || विषय- छत्तीसगढ़ी लोकगाथा || समय- 12 मिनट
    छत्तीसगढ़ के लोक जनमानस म गजब अकन लोकगाथा प्रचलित हावय। आज जतके कन लोकगाथा लिपिबद्ध होय हाबे ओकर ले केऊ आगर ह मुअखरा लोक कंठ म समाये हाबे। चूंकि लोकगाथा के कोनो एक रचनाकार नइ होवे वो तो समकालिक परिशिष्ट म स्वमेंव उध्रित होथे। लोक गाथा के सिरजन के विषय म अनेक विद्वान मन अपन-अपन अनुमान बताथे फेर  कोनो ह एकर सही परमान नइ देवय की ओकर सिरजन कब होय हाबे। लोकगाथा के कथानक मन गजब लंबा होथे अउ लोकगाथा के लंबा होय के कारण तत्कालीन परिवेश अउ लोक व्यवहार आए। जेन व्यक्ति नहीं बल्कि सकल समाज के प्रतिनिधित्व करथे। छत्तीसगढ़ अंचल के लोकगाथा मन सिरिफ मनोरंजन के काम भर नइ करे भलुक सामाजिक कुप्रथा, रीति रिवाज के बोध के संगे-संग लोक साहित्य अउ संस्कृति के सरेखा तको करथे।

    अब आव कुछ छत्तीसगढ़ी लोकगाथा मन ल अलग-अलग खंड म बांट के विस्तार ले वर्णन करथन। तव सबले पहिली सोरियाथन नारी प्रधान लोकगाथा मन ल जेमा दसमत कइना, नगेसर कइना, चंदा ग्वालिन, बिलासा केवटिन, अहिमन रानी, फूलकुंवर, रेवा रानी, केवला रानी, बहादुर कलारिन या कलार सुंदरी जइसन गाथा ल छत्तीसगढ़ म प्रमुखता ले गाये जाथे। ये सबो गाथा मन ले नारी शक्ति के अपने रूप के दर्शन होथे। अइसने प्रेम प्रधान लोकगाथा हावय जेमा ढोला मारू, लोरिक चंदा, रहिमन रानी, काम कंदला, सुतनुका-देवदीन, लीलागर, बोधऊ उक के प्रेम के किस्सा गजब सुने बर मिलथे। अब देखव आगू वीराख्यान लोकगाथा जेमा आल्हा, गोपाल राय, हीराखान, बीरसिह पवाड़ा, पंडवानी, रायसिह पवाड़ा, बीर बंधु आदि गाथा प्रमुखता ले गाये जाथे। इही रकम ले छत्तीसगढ़ म अध्यात्मिक लोकगाथाएं घलोक गाये जाथे जेमा भरथरी, गोपी चंदा, सरवन कुमार के किस्सा लोक म गजब प्रचलित हावय।

    नारी प्रधान लोकगाथा म दसमत कइना के किस्सा ल इहां के कतकोन कलाकार मन अब मंच म तको गाये के शुरू कर दे हावय। कलाकार मन साज संगत के संग गजब सुघ्घर दमसत कइना के किस्सा ल गावत बताथे के ये भोजनगर के राजा भोज के किस्सा आए। राजा भोज के सात झिन बेटी रथे जेमा सबले छोटे बेटी के नाम रथे दसमत। एक दिन राजा अपन सातो बेटी ल बलाके एक सवाल पुछथे कि- बेटी तुमन काकर करम के खाथव, काकर करम के लेथव नाव। बारी-बारी ले छै बेटी मन किथे की पिताजी हमन तोरे करम के खाथन अउ तोरे करम के लेथन नाव। आखिर में दसमत कइना के पारी ल आथे त ओ कइथे कि पिता जी मै अपन करम के खाथवं अउ अपने करम के लेथव नाव। राजा भोज दसमत के बात सुनके गुस्सा जथे। मने मन गुनथे अउ किथे मैं देखिहवं तोर करम ल। राजा अपन सैनिक मनला बलाके दसमत बर अइसन वर तलाश करे बर किथे जेकर कर खाय बर अन्न झिन राहय, पहिरे बर ओन्हा झिन राहय अउ रहे बर घर झिन राहय। राजा के बात मानके सैनिक मन वइसनेच निच्चट गरीब आदमी ल पकड़ के लानथे अउ राजा ह अपन बेटी के बिहाव ल ओकर संग करा देथे। राजकुमारी दसमत अपन करम के लेखा मानके ओ गरीब आदमी संग चल देथे।

    दसमत अपन पति संग गरीबी के जीवन गुजारत रिथे। एक दिन दसमत अपन पति ले पुछथे के तुमन तो रोज अतेक काम बुता करथव तभो ले गरीब के गरीबेच हव। आखिर का काम करथव तुमन। तब ओकर पति बताथे के हमन साहूकार बर पथरा फोड़ के जोगनी धरथन। दसमत किथे के एको ठिन जोगनी लाबे तो महूं देखहू। दूसर दिन एक ठिन जोगनी धर के घर लानथे। दसमत देखके दंग रही जथे। ओ तो हीरा आए अनमोल हीरा। तुरते दसमत ह अपन पति ल लेके ओ साहूकार कना जाथे अउ हीरा म हिस्सा मांगथे। अब हीरा पाये के बाद दसमत मनके गरीबी दूरिहा जथे। दसमत अब तो अपन पिता राजा भोज ले घलो जादा अमीर होगे। ये लोकगाथा ह एक नारी के आत्म सम्मान, राजा के अंहकार के पतन अउ गरीब के शोषण ल उजागर करत हाबे। लोकगाथा के अंत म नारी ह अपन पति के खातिर सति हो जथे, काबर के ओकर पति ह अपने पत्नी के इज्जत के रक्षा खातिर परान गवाए रिथे। दसमत कइना के ये गाथा ल परमुख रूप ले देवार कलाकार मन गाथे। श्रीमती रेखा देवार येकर सिद्धहस्त कलाकार हाबे।

    अब अहिमन रानी के कथा ल देखथन त दुरूग राज के राजकुमारी के बिहाव सारंगढ़ राज के बीरसिंह के साथ होथे। वीरसिह शंकालू प्रवित्ति के रिहिसे। नानकून बात म वो अपनेच पत्नी ल मारे बर लग जथे। अहिमन रानी के ये गाथा म अपन सास के अवेहलना के दुष्परिणाम भोगत देखाय हाबे संगे-संग पतिव्रत धर्म के सेती फेर जीवन मिल जथे। अहिमन रानी के कथा म एक प्रसंग आथे जेमा राजा घोड़ा चोरी हो जथे। जेकर वापसी बर पासा पाली के खेल खेलना अउ अपन सरी गहना ल हार जाना बताये हाबे। बाद अहिमन के मुह बोले भाई ल ओला ओकर गहना ल वापस कर देथे। उही गहना के सेती अहिमन के पति राजा बीरसिंह भाई बहिनी के नता ल आन जानके अपन पत्नी उपर भरम जथे और ओला मार परथे। अंत म ओकर मुंह बोला भाई के सेती फेर ओमन संघर जथे।

    अब प्रेम प्रधान लोकगाथा म लोरिक चंदा के किस्सा ल फरिहाथन। लोरिक चंदा म लोरिक राउत अउ राजकुमारी चंदा के प्रेम के किस्सा गाये जाथे। लोरिक अहिर समाज के बलखर युवा रिथे जेन बघवा ल तको मारे रिथे। तइहा समे म राजकुमारी चंदा के बिहाव राजा बिरबावन संग होय रिथे। जब गवना के बेरा आथे तव राजा ल कोढ़ के बिमारी रिथे। गवना कराये खातिर राजा ह लोरिक ल बिरबावन बनाके भेज देथे। ओ कोति राजकुमारी चंदा ह लोरिक ल ही अपन मन मंदिर म बसा लेथे। लोरिक के बिहाता पत्नी के नाम हे दौना मांजर राहय। लोरिक के मया म राजकुमारी ह ओकर घर मल्लीन दाई के ओड़र म मिले बर जाथे। लोरिक अउ चंदा ल मिलत दौना मांजर देख डारथे। चंदा अउ दौना म झगरा होथे। चंदा ह लोरिक ल बारा साल बर भगा के ले जथे। अइसन रकम ले ये लोरिक चंदा के ये किस्सा म प्रेम के संग हास्य और वीरता के भाव तको देखे ल मिलथे। लोरिक चंदा के किस्सा ल कतकोन नाचा गम्मत वाले मन तको देखाथे अउ चंदैनी दल मन तो लोरिक चंदा प्रसंग ल ही प्रमुखता ले देखाथे जेमा रामाधार साहू एक बड़े नाम हावय।

    अइसनेहे एक अउ प्रेम प्रधान गाथा हावय ढोला मारू के। जेमा राजा ढोला लाल अउ रानी मारू के प्रेम के गाथा ल छत्तीसगढ़ में ढोला मारू के संगे-संग रेवा परेवा के नाम से तको जाने जाथे। ये छत्तीसगढ़ के अइसन लोकगाथा आए जेला आन राज म तको गाये जाथे। छत्तीसगढ़ म 'ढोला-मारू' राजस्थान म 'ढोला-मारू रा दूहा' ब्रज म 'मदारी को ढोला' आदि नाव ले जाने जाथे। गाथा अनुसार नरवर गढ़ के कछवाहा राजा नल के पुत्र के नाम सलह कुमार रिहिसे जेन बाद म ढोला लाल के नाम से प्रसिद्ध होइस। जब उंकर बिहाव होइसे ओ बखत ढोला के उमर तीन साल अउ मारू के उमर ढेड़ साल रिहिस। ढोला अउ मारू के बिहाव के प्रसंग के बाद रेवा नाम के जादुगरनी के प्रसंग आथे। रेवा जादुगरनी ह ढोला उपर मोहित हो जथे। ओहा एक दिन ढोला ल परेवा बनाके अपन संग ले जथे। अइसन ढंग ले ये गाथा ल लोक कलाकार मन सो सुने म बड़ रोचक लागथे। आज के समे म श्रीमती सुरूज बाई खांडे के बाद अब श्रीमती रेखा जलक्षत्रि अउ रजनी रजक येकर प्रमुख कलाकार हावय जेन मन ये किस्सा ल जीवित राखे हावय। 
    अब गोठ करबोन वीराख्यानक लोकगाथा मनके जेमा सबले पहिली नाव आथे आल्हा-उदल के। आल्हा उदल के किस्सा में विरता अउ साहस के कई प्रसंग सुनाये जाथे। वीर पुरूष ह समाज म नारी के सम्मान अउ न्याय खातिर लड़थे। ये गाथा ल अइसन रकम ले गाये जाथे कि सुनइया मन के मन म जोस जाग जथे अपन मातृभूमि खातिर। आल्हा अउ उदल दूनो भाई गजब पराक्रमी रिहिन ओमन अपन मातृभूमि के रक्षा खातिर पृथ्वीराज संग भयंकर युद्ध करिस। ये गाथा म अनठावन लड़ाई के वर्णन हाबे। आल्हा खंड काव्य के गायन छत्तीसगढ़ के बाहिर घलोक होथे। जेन प्रकार ले वेदव्यास जी महाभारत महाकाब्य के रचना करिस, महर्षि बाल्मीकि ह रामायण के। ओइसने रकम ले जगनिक ह आल्हा काब्य के रचना करे हावय।

    अब सोरियाथन लोकगाथा पंडवानी ल। पंडवानी ह हमर छत्तीसगढ़ के अमुल्य धरोहार आए। जेन ल दू शैली म गाये जाथे एक कपालिक अउ दूसर वेदमति। माने कपालिक म कथा के संग काल्पनिकता प्रयोग करे जाथे अउ वेदमति म सिरिफ वेद सम्मत गाथा के गायन होथे। पंडवानी के कलाकार मन हाथ म तंबूरा अउ करतान धरे पांडव मनके किस्सा ल सुनाथे। छत्तीसगढ़ के मूर्धन्य पंडवानी गायक मन म सबले पहिली नाव आथे झाड़ूराम देवांगन, पद्मश्री पुनाराम निषाद, पद्मभूषण डॉ. तीजन बाई, चेतन देवांगन, प्रभा यादव, मीना साहू, प्रभा यादव, रितु वर्मा, शांति बाई चेलक अउ उषा बारले आदि के नाम विख्यात हावय। पंडवानी म महाभारत के मूलकथा ल आंचलिक भाखा म एक दिन, दू दिन, तीन दिन, सात दिन अउ नौ दिन तक घलोक सुनाये जाथे। पंडवानी गायक मन ल भजनहा तको केहे जाथे जेमन सबलसिंह चौहान के लिखे कथा के गायन 18 पर्व म बांट के करथे।पंडवानी में प्रमुख रूप ले आदि पर्व, सभा पर्व, उद्यम पर्व, भीषम पर्व, द्रोण पर्व, करन पर्व, शैल पर्व, तिलक पर्व, अश्वमेघ पर्व, स्वर्ग रोहन पर्व, मूसल पर्व, द्रोपदी स्वंबर, दुशासन वध, कीचक वध, अर्जुन शिव तपस्या, कुंती-गांधारी के शिव पूजा, अभिमन्यु विवाह, देवासुर संग्राम, भरत वंश की कथा, कर्ण जन्म, गीता उपदेश आदि कथा प्रसंग के गायन होथे।

                                            
    अब पारी हावय आध्यात्मिक लोकगाथा भरथरी के। भरथरी म उज्जैन के राजा भर्तहरि के जीवन चरित्र के गायन करे जाथे। येमा राग, विराग के अंतर्द्वन्द अउ तर्क-वितर्क के द्वंद्व ले जुरे राजा भरथरी के नीति, श्रृंगार, वैराग्य के अध्यात्मिक कथा हावय। छत्तीसगढ़ म भरथरी के किस्सा ल तको अलग-अलग खंड म बांट के गाये जाथे। भरथरी के प्रसिद्ध गायिका श्रीमती रेखादेवी जलक्षत्री अउ श्रीमती सुरूज बाई खांडे ह राजा भरथरी के गाथा ल जनम से लेके विवाह अउ वैराज्ञ तक नौ खण्ड म सुनाथे। बताथे कि राजा भरथरी अउ रानी सामदेवी के बिहाव के रात ही ओकर पलंग टूट जथे। जेला देखके रानी हांस परथे। तब राजा ह पलंग टूटे के कारन ल रानी ले पुछथे। रानी किथे के मोर बहिनी पिंगला येकर कारन ल जानथे। राजा ह पिंगल ल बलाके पुछथे तव वो बताथे के पूर्व जन्म म तुमन महतारी बेटा रेहेव इही पाके ये पलंग ह टूटे हावय। अतका ल सुनके राजा दुखी हो जथे। येकर बाद आगू के प्रसंग म राजा के शिकार के किस्सा आथे जेमा ओमन एक काला मिरगा के शिकार कर देथे। एक काला मिरगा के छै आगर छै कोरी मिरगीन मन राजा ल श्राप दे देथे। राजा श्राप ले मुक्ति खातिर गुरू गोरखनाथ के शरण म चल देथे। गोरखनाथ बाबा कहिथे के तोला अपने महल म भिक्षा मांगे बर जाना हावय अउ अपन रानी ल मां कहिके पुराना हाबे। अइसन ढंग ले भरथरी गाथा म राजा के जीवन के अनेक घटना ल बताये जाथे।

    अइसने रकम ले सरवन गाथा तको हावय। सरवन कुमार के गाथा ह रामचरित मानस ले लिये गे हावय। येहू गाथा ल छत्तीसगढ़ के अलावा आन राज के मन तको गाये जाथे। ये गाथा म संतान बर माता-पिता के सेवा ल ही सबसे बड़े धर्म बताये गे हावय। ये कथा सुरू होथे अंधरी अंधरी माता-पिता ले जेकर ऐकच झिन औलाद रिथे सरवन कुमार। सरवन कुमार के पत्नी ह कुलक्षणी रिहिसे। सास ससुर के थोरकोच जतन नइ करत रिहिसे। अतेक दोगलई करे के ओकर भोजन रांधे के बर्तन म तको दू खंड रिहिसे। एकेच बर्तन ल दू किसम के चुरय। एक भाग म 'खीर' त दूसर भाग म 'महेरी'। अपन मन खीर खावय अउ सास ससुर न महेरी। ये बात के पता जब सरवन कुमार ल होथे त ओहा बहुत दुखी होथे अउ अपन पत्नी ल निकाल के माता-पिता ल तिरथ कराये के संकल्प लेके लकड़ी के कांवर बनाथे। सरवन कुमार अपन अंधी-अंधा मां-बाप ल कांवर म बइठार के तिरथ करे बर निकलथे। एक दिन प्रयाग जाये के रद्दा म ओमन ल पियास लागथे तव सरवन कुमार अपन माता पिता ल उही जंगल म छोड़ के सरयू नदी पानी लाने बर जाथे। ओ कोति राजा दशरथ शिकार करे बन निकले रिथे। ये कोति सरवन कुमार पानी के तुमड़ी ल नदी बुड़ोथे त ओ कोति राजा दशरथ पशु पानी पियथे समझके शब्दभेदी बान छोड़ देथे। बान लगते ही सरवन कुमार घायल होके गिर जथे। राजा दशरथ मनखे के आरो पाके दौउड़थे तव देखथे कि बान लगे सरवन कुमार आखरी सास लेवथे। राजा ल जबर दुख हो जथे, ये कोति सरवन मरगे ओ कोति ओकर मां-बाप पियास मरत हाबे। राजा दशरथ पानी लेके जब अंधरी अंधरा कना जाथे अउ पुरा घटना ल बताथे तव ओहू मन राजा ल श्राप देके अपन परान तियाग देथे। राजा दशरथ पछतावत-पछतावत तीनों झिन के अंतिम संस्कार करथे।

    अइसन ढंग ले छत्तीसगढ़ म कतकोन लोक गाथा गाये जाथे जोन इहां के सांस्कृतिक विरासत के संगे-संग इहां के लोक जीवन म समाज के कुप्रथा अउ रूढ़ि वादी रीति रिवाज उपर कटाक्ष तको करथे। कतकोन लोकगाथा मन के गायन गुड़ी म नइ होय के सेती विलुप्त तको होवत होवय। हमर आगू के सियान मन मुअखरा जाने फेर नवा पीढ़ी मन सरेखा नइ करिन तेन पाके कतकोन मन के नावे भर बांचे हावय। कुछ लोकगाथा मन ज्यादा गुड़ी म गाये बजाये के सेती विकृत तको होवत हावय माने ओमा आधुनकिता के प्रभाव देखे बर मिलत हावय। अइसन म हमर जुन्ना तइहा के लोकगाथा मन ला लिपिबद्ध करके सरेजे के जबर उदीम करे के घातेच जरूरत हावय।
    ब्लॉगर के गोठ- ब्लॉग म संकलित एदे लेख ल कतकोन झिन बड़का कलाकार, साहित्यकार अउ पत्रकार मनके वाचिक अउ लिखित तथ्य ल आधार बनाके गढ़े गे हावय जेन म मानवीय भूल हो सकत हावय। क्षमा सहित आप मनके मया आसिस के अगोरा म... जयंत साहू



    छत्तीसगढ़ी साहित्य में कहानी अउ निबंध

    छत्तीसगढ़ राज म कला, साहित्य अउ संस्कृति के अदभुत समागम देखे कर मिलथे। इहां नाव अउ जाति ह लोगन के चिन्हारी नोहय बल्कि ओकर संस्कृति अउ परंपरा ह उंकर स्वांगे चिन्हारी बने हावय। इही चिन्हारी आज साहित्य सिरजन म लगे साधक मनके लेखन के आधार बनिस। नहीं ता अतका बछर बाद कोन गम पातिस के तइहा समे म छत्तीसगढ़ के लोगन मनके दसा-दिसा, रहन-सहन, रीत-रिवाज का रिहिसे? जबकि ओ बखत तो हमर साहित्य ह लेखन म नइ आये रिहिस हावय। हां लेकिन वाचिक परंपरा ह जबर रिहिसे, हरेक परंपरा ह कोनो न कोनो कथा कंथनी ले सुरू होथे अउ नहींते गायन के रूप म ओला धरनाहा राखे के उदिम हमर सियान मन करिन।

    उही तइहा के सियान के मुअखरा साहित्य के सिरजन ल आज हमर राज के साहित्यकार मन लिखित रूप करत हावय। छत्तीसगढ़ी सहित्य के सिरजन सही माइने म अलग नवा छत्तीसगढ़ राज बने के बाद नंगत घऊंरे लागे हावय। छत्तीसगढ़ राज के उदय होय के कारण तको साहित्यिक आंदोलन ल ही माने जाथे। अब इहां के साहित्य लेखन ल एकदम नावा तको नइ केहे सकन काबर के छत्तीसगढ़ी म तको गाथा युग अउ भक्तियुग के बाद आधुनिक युग के परभाव सउहत देखे बर मिलथे।
    छत्तीसगढ़ी साहित्य के परमानिकता के विषय म हमर तिर एकेच ठी थाती हावय हीरालाल काव्योपाध्याय के जोन ह 1890 म प्रकाशित होय हावय। हीरालाल काव्योपाध्याय के लिखे आखर के अंजोर न सिरिफ छत्तीसगढ़ बल्कि बंगाल अउ इग्लैंड तक तको पहुंचिस। छत्तीसगढ़ के जुन्ना साहित्यकार मन तको इही दिन-बादर 1890 ल छत्तीसगढ़ी गद्य लेखन के प्रारंभिक काल माने हावय। येकर पहिली के छुटपुछ आरो म साहित्यकार मनके एकमत नइये।
    छत्तीसगढ़ी साहित्य के गद्य विधा माने कहानी अउ निंबध के विषय म इतिहासकार अउ जुन्ना साहित्यकार मनके कथन हावय के ओ बखत के रचना मन म अब के मानक छत्तीसगढ़ी जइसे रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव के अलावा छत्तीसगढ़ी के उपबोली जइसे खल्टाही, सरगुजिहा, लरिया, सादरी कोरवा, हल्बी, भतरी, गोंडी, भूलिया, बिंझवारी के प्रभाव दिखय। कुछेक शब्द अवधी, बघेली, बुंदेली के ह घलोक छत्तीसगढ़ी साहित्य म दिखथे।
    अब के समे म देखे जाए तव भले ही मानक छत्तीसगढ़ी अउ उपबोली मनके सबो विधा म बरोबर प्रभाव नी दिखे तभो ले नवा रचनाकार मन अपन-अपन अंचल के प्रतिनिधित्व करत साहित्य के सबो विधा म जबर लेखन करत हावय। गद्य विधा ल सजोर करत कहानी लिखइया मनके नाव ल सोरियाबोन तव सबले आगू डॉ. खूबचंद बघेल, शिवशंकर शुक्ला, लखनलाल गुप्त, सुकलाल पांडेय, कपिलनाथ कश्यप, डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा, पं॰ सीताराम मिश्र, केयूर भूषण, टिकेन्द्र टिकरिहा, परदेशीराम वर्मा, नारायणलाल परमार, डॉ॰ पालेश्वर शर्मा, राम कुमार वर्मा, डॉ॰ बिहारी लाल साहू, परमानंद वर्मा, पुनुराम साहू, दादूलाल जोशी, सुशील यदु, राजेन्द्र सोनी, चेतन भारती, पंचराम सोनी, डॉ. गोरेलाल चंदेल, डुमन लाल ध्रुव, हेमनाथ यदु, सुशील भोले, डॉ. बलदेव साव, मंगत रविन्द्र, श्रीमती सुधा वर्मा, हरप्रसाद निडर, चंद्रशेखर चकोर, किसान दीवान, दुर्गाप्रसाद पारकर आदि सहित अऊ केऊ झिन के कृति हमर आगू म हावय।

    तइहा के कहानी के कथानक अउ भाषा शैली कइसन रिहिस होही ये बात के गुनान करत कुछ बड़े कहानीकार मनके कहानी ल अब ओसरी पारी ओरियाके मरम ल जाने के बखत हावय। सबसे पहिली शिवशंकर शुक्ल जी के कहानी ‘फिरंतिन’ ल देखन। शिवशंकर शुक्ल जी छत्तीसगढ़ी के बड़े नाम आए, ओमन के उपन्यास ल लोगन मन छत्तीसगढ़ी के पहिली उपन्यास तको मानथे। शिवशंकर शुक्ला जी ह फिरंतिन कहानी म मोसी दाई के मया के भाव उजागर अइसन ठंग ले लिखे हावय के। एक दिन रतिहा जब फिरंतिन ल सुते छोड़के रजवा ह घर ले निकर गिस। दूसरे दिन मुंधियार फिरंतिन ह रजवा के मांची ल खाली देखते बक्क खागे। अंगना म निकर के देखिस त उहां रजवा ह नइ रहय। बिहनियां गांव म किंजर-किंजर के एक-एक झिन मनखे ल पूछिस, तभ्भो ले ओखर कोनों आरो नइच्च मिलिस। काबर करम के छंडहिन ह ओला बूता बर तियारतेंव, कहूं अइसने गोठ ल नइ चलातेंव त वो ह अपन दाई ल अधवार मा छोड़ के कभू नइ जातिस। वो ह अपने ल जी मारके बखान लेवय। कोन कुबेरा म मेंहा अपने बेटा ल बूता बर कहेंव। नइ कहितेंव त नइ जातिस कहूं। अइसन भाव लेके रचनाकार ह फिरंतिन के ओड़र म समाज म नवा संदेश देवत हावय के सबो मोसीदाई ल बेकार नइ होवय। बियाय लइका नइ राहय तभो ले पर के लइका बर पीरा ल उमड़थे।
    अइसने श्यामलाल चतुर्वेदी ह अपन कहानी ‘सतवंतिन सुकवारा’ म गांव के गरीब के दसा अउ ओकर बेवहार ल बताये हावय। किथे के- चैतु हर घूमारे के मशीन के चक्का ल, अउ सुकवारा हर ओनहा ल खिलय। चिरहा फटहा के पइसा नइ लेवय सुकवारा। ओला पइसा लेहे बर जोजियावै तब कहय भगवान हर मोरे करम ल फुटहा बनाये रहिसे तइसने ओनहा मन फटहा हे। जतके ओला जोर देके खिल दैहों तब सबके देखइया भगवान ह कभ्भू न कभ्भू मोरो फटहा करम ल जोरही। नवा कुरथा के काज बटन लगाय बर अपने अबके सउत अउ पहिली के देरानी ल सिखो डारिस सुकवारा ह। अइसन रकम ले ये कहानी म गरीब ह गरीब के कइसे मदद करथे इही भाव ल बताथे। संगे-संग ये कहानी ह रायपुर अउ बिलासपुर के छत्तीसगढ़ी के फरक ल तको उजागर करत हावय।

    लखनलाल गुप्त ह अपन रचना ‘सुवा हमार संगवारी’ म सुवा पोसे के केऊ ठी कारन बताव किथे के हमर छत्तीसगढ़ घलाव म सुवा के रंग-रंग के कथा कहानी सुनेबर मिलथयं इहां के सुवा गीत ल आप पढ़िहौ तो दंग रहि जाहव। उन का काम नइ करे हे। कहां-कहां संदेसा नइ पहुंचाये हे। सुवा राजा मनके संगवारी राहय अउ रानी मनके सहचर के काम करय। वो अवइया नइते दुर्भाग्य के चिन्हारी दे देत रहिन। हमर इहां के लोककथा म किसिम-किसिम के गोठ बात सुवा के मिलथय। एखरे सेती हमर छत्तीसगढ़ म सुवा हा बड़ मयारूक पक्षी के रूप म घरोघर पोसथय। जेखर घर म बाल बच्चा नइ राहय उन मन तो जरूर सुवा रखथंय। अउ ओखर से किसिक-किसिम के ठिठोली कर करके खेलथंय अउ अपन समय बीताथंव अऊ तो अऊ सुवा ल संतान कस मान लागथंय। ये भाव आए लखनलाल गुप्त जी के छत्तीसगढ़ी रचना के।
    अब डॉ. पालेश्वर शर्मा के कहानी ‘तिरिया जनम झनि देय’ म नारी मनके दसा अउ दिसा के बखान करत समाज ल तको बताये के प्रयास करे हावय के हमर समाज म नारी मनके कतका सम्मान अउ आदर के भाव हावय। छत्तीसगढ़ म नारी मन कभू अपन घर-दुवार, सास-सुसर ल छोड़ा के पति संग अकेल्ला रहे के बात ल बेवहार म नइ लानय भलूक संयुक्त परिवार म सुनता ले रहे के पक्षधर होथे। जेन घर म नारी के सियानी रिथे तेन तो अऊ जबर उदाहरण आए पुरूष प्रधान समाज बर। इहां आजीविका के आधार खेती हरे अऊ एक एकेल्ला नारी तको खेती किसानी करके अपन लोग लइका पालन-पोसन कर लेथे। ये रकम ले रचनाकार ह नारी मनला समाज म सम्मान देवाय के संग आत्म विस्वासी अउ नारी परानी कइसे घर चलाथे इहू बात के जबर उदाहरण रखथे।

    हर पुरखा कलमकार केयूर भूषण तो गद्य विधा के माई मुड़ी आए जोन स्वतंत्रता आंदोलन म भाग लिन अउ केऊ ठी रचना ल जेल भीतरी ल तको करिन हावय। कतको ह प्रकाशित होइस अउ कतकोन तो हस्तलिखित प्रतिलिपि के रूप मे धरनाहा रखाय हावे। उंकर रचना ‘आंसू म फिले अंचरा’ ह पढ़इया-लिखइया लइका मनके स्कूल अउ कालेज के दिन ल लिखथे के कतको हुसियार लइका काबर नइ होये, पहली साल ह उंकर लटेपटे म निभथे। बड़ चउज करथें। जुन्ना लइका मन, नवा लइका मन ल रोवा के छोड़थे। कोनों कहिथे हमला सलाम करके जा। तब कोनो कहिथे गीत गा के बता। कतको झन जुन्ना छोकरी मन तो नवा छोकरी मनके मुंह म काजर नहीं तो केरवस पोछ देथे। अइसे ठोलहीं के आंखी ले आंसू निकले के डउल हो जाथे। फेर धीरे-धीरे हुसियार छोकरा-छोकरी मन के जुत्था बने लगथे। रचनाकार के ये भाव ह नवा पीढ़ी ल शिक्षा ले अपन रद्दा चतवारे के संगे-संग जेन बिपत सुरू म आथे तेकर बरन करे हावय।
    अब छत्तीसगढ़ी साहित्य के गद्य विधा म महिला मनके नाव सोरियावन तो कुछेक नाम ही आगू आथे। जेमा एक बड़े नाम हवय डॉ. सत्यभामा आडिल जेखर कहानी ‘रमिया अउ केतकी’ ह अपन पात्र मन के माध्यम ले तत्कालीन परिदृश्य ल देखाय के उदीम करत हावय। रमिया केतकी बिहाव के लइक होगे। दुनो के रूपरंग सोन जइसे जग-जग ले। उंखर भरे जोबन ल देख के सबो उखरे डाहर खिंचावत आवयं। समय अपन रंग देखइस। धान कटई, मिंजई खतम होगे, तहां ले बर बिहाव खातिर, सब कमइया किसान मन, लड़का-लड़की खोजे बर निकलगे। इहां गांव के काम बूता उरके के बाद बिहाव के गोठ कहे हावय अउ कतका सुघ्घर नोनी के सुंदरता के बखान करे हावय। आगू लिखे हावय के बछर ऊपर बछर बीतगे, रमिया घलो एक बेटा के महतारी बनगे। पिपरदेव म अंचरा के धागा चढ़ायेबर गिस। तब ले लेके आज तक कसही अउ फूंड़र गांव के संग-संग आगू पिछू के गांव के मन घलो पिपरदेव के पूजा करन लगिन। हर बछर अपन-अपन गांव के तरिया तीर म नवा रूख राई रोपत गिन। कहुं नीम, कहुं बरगद, कहुं पिपर अब तो आमा, संतरा, जाम के रूख म सबो के बारी बखरी भरगे, हरियर लागथे। रमिया अउ केतकी के कथा घर-घर सुनाके, गांव वाले मन रूख राई ल पूजन लागिस। अइसे ढंग ले रचनाकार ह अपन कहानी म प्रकृति ल पूजा के रूप म समोखे हावय के पढ़इया तको रूख राई के जतन करे के सुरू कर देथे।

    अइसने रकम ले परमानंद वर्मा के कहानी के कथानक तको सीधा सरल फेर गंभीर बात करथे। कहानी ‘तोर सुरता’ एक मया के बानगी आए। वइसे तो मै गुन के खरीददार नोहवं अउ ना बाजार म खरीददारी करे बर निकले हौ? अइसे तो बजार म एकर जइसे कतको मूरत बिकथे अउ खरीददार मन खरीद के ले जाथे। फेर मै ना ये मूरत ल खरीदना चाहत हौ अउ ना घर ले जाय के इच्छा हे। मैं तो देवी के रूप म पूजा करना चाहत हवं अउ उही तो करथवं। एला मैं कोनो पाप नइ मानो। फेर मोर माने नइ माने ले का फरक पड़ना हे। कानून अउ नीतिशास्त्र के पंडित मन के अदालत म तो एला अपराध अउ पाप के दर्जा दे जाही। ओकर मन के हिसाब से तो फेर कसूरवार हौ। ककरो बहू-बेटी ऊपर गलत निगाह रखना तो पाप हे। अउ पापी बर दंड के विधान हे। तब तो अपराधी ठहरेवं। अइसन ठोस बात ल जब एक बड़े कलमकार ह लिखथे तव ओमा सिरिफ मन-चाहत भर नहीं भलूक आस्था के भाव दिखथे। वहू ल रचनाकार किथे के काकरो बहू-बेटी बर अइसन सोचना तको पाप आए। कहानी के ये भाव युवा मनला सीख के संगे-संग आरूग मया म चिभोरे के दम तको रखथे। येमा एक बात के अऊ देखे भर मिलिस, लेखन म भासा शैली अउ शब्दावली जेन निमगा रायपुरिहा छत्तीसगढ़ी म रिहिसे। 
    अइसने एक झीं अऊ कहानीकार हावय मंगत रवीन्द्र। जेखर रचना म कथानक ठेठ गांव के होथे अउ पात्र मन कोनो न कोनो माध्यम ले सादा जीवन उच्च विचार के बेवहार ल जीथे। कहू-कहू तो धर्म, दर्शन के मरम ल रचनाकार अपन कृति म समोखे के सुघ्घर उदीम करथे। जइसे देखव कहानी ‘संवरा’ के ये भाव ल। हमर छत्तीसगढ़ ककरो मान करे म पाछू नइ रहे। दोना पतरी म भात ल परोस के लोटा म पानी पियाथे। छत्तीसगढ़ के मनखे, लोटा म पानी देथे। खटिया-पिड़हा म बइठार के चरनामृत ल लेथे। सुसर आइस घर म, गोड़ लगरे रात के, ढोंक ठोंक के तरिया नहवाइस एही बेटा बाप के। घमंड फुग्गा तो आय, कतका बेरा ओसकही पता नइ चले। ज्ञानीक जी मनटुटहा फिरत हे। सांप चाबे सांप के मुंह दुच्छा, आज ज्ञानी के घमंड चूर-चूर होगे।
    अइसने रकम के गोठ हरप्रसाद निडर जी तको किथे के छत्तीसगढ़ हर हमर दई ये अउ छत्तीसगढ़ी ह बहिनी, फेर दूनों के मरजाद छत्तीसगढ़िया मन के पागा घलो ये। पागा ल बिना दागी के अदक धौरा रहना चाही, तभे तो मुड़ म जुगजुग ले फबही। बड़ बात तो लिखत हावंय, चाहे कसनो बनय, फेर गवाईहां छत्तीसगढ़ी ह तो असल ये। असल म नकल के गेरू झन घोंसयं, अइसना म असल छत्तीसगढ़ी नंदा जही अउ नकल म रंग चढ़ जही। ये संसो आए एक रचनाकार के जेन छत्तीसगढ़ी म होवत आनतान लेखन के विरोध करत हावय। जब हम छत्तीसगढ़ी साहित्य के बात करथन तो ओमा आरूग पर होना घातेच जरूरी हावय। देखव हरप्रसाद निडर के कहानी ‘ठड़गी’ ल जेमा ओमन कथे- रमला के बिहाव होय तीस बरिस ले आगर होगे हे, फेर ओकर लइका नइ होय हे, तेकर सेती घर-परवार, पारा-गली के मन ओला ठड़गी कथे। रमला के गोसईया रमला ल अपन जीव ले बहुते मया करथे, फेर का करै मयाराम के दई ह ओला निसदिन ठेला मारै के हमर डीह म दीया बरैया एको झन पुतरी नइये, कहां लंग के सरपदोखही ल हमन पतोहू पायेन के हमर कुल ह अंधियार होगे। ये कहानी म ठड़गी के दुख जेला ठगड़ी तको कथे के पीरा ल बताये हाबय रचनाकार ह कि कइसे-कइसे तना सुने ल परथे। संगे-संग एमा गारी बखाना के मर्यादित रूप के प्रयोग होय हाबे। कतकोन शब्द हमर अंचल म अइसने घलोक हावय जेन ल बोलचाल म भले कहि दे जाथे। फेर ओकर भाव ल बने नी माने जाये। हरप्रसाद निडर के कहानी मन म आरूग अउ ठेठ शब्द के भंडार देखे बर मिलथे। 

    इही रकम ले कहानीकार किसान दीवान के रचना हर तको आंचलिक शब्दावली के कोठी रिथे। भले ओमन छोटे-छोटे कहानी गढ़थे फेर पढ़इया ल आनंद देथे। ‘टेंकहा बेंगवा’ म ओमन लिखथे के एक ठन तरिया म आनी बानी के कीरा मकोरा, मछरी जोंख अउ बेंगवा राहय। मजा मारत बिधुन होके जीयंत खात रिहिन। दुख-पीरा नांव नीही। उहंचे एक ठन बेंगचुल मूंगा कस चिकचिकी हरियर अउ ठस्सा राहय। पिला, बकेना, पठरू, बेंदरा, कुकुर, बिलई, बाघ भालू सबे जीव परानी मन नान्हेपन म घात मन मोहना होथंय। तइसने वहू राहय। घात उदबिरिस अउ टेंकहा-जिद्दी। महतारी के बरजना सुन के अऊ टेचराही देखावय। आन के तान करय। उद्दाबादी जावय। अइसन सुघ्घर कहानी के भाव ह लोगन ल प्रकृति के तिर लेगे के उदीम करथे। गांवखेरा के लोगन के मन बिलमथे अइसने कहानी मन म अउ फेर किसान दीवान के रचना मन तो कम शब्द म अपन बात ल फरी फरा कर देथे।
    छत्तीसगढ़ी साहित्य के गद्य विधा म कहानी तो छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद गजब घउरे हावय जेन म लघुकथा, लोककथा, नाटक, उपन्यास अउ बियंग के रचनाकार मनके सूची गजब लंबा हावय। अभी छोट हावय तो थोकिन छत्तीसगढ़ी के निबंध लेखक मनके नावसूची ह। कुछेक साहित्यकार मन सबो विधा म लेखन करत हावय। अउ जब प्रकाशन के बेरा आथे तव सबो ल एके किताब म समोख देथे ते पाके उंकर नाव ह निबंध लेखन के मूल विधा म उल्लेखित नइ हो पावय। तइहा ले केयूर भूषण, टिकेन्द्र टिकरिहा, डॉ. गोरेलाल चंदेल, पंचराम सोनी, पुनूराम साहू, डॉ बलदेव साव आदि रचनाकार मन तो सबो गद्य विधा ल सजोर करे म अपन योगदान दे हावय। अब प्रकाशित कृति अउ सरलग सहराये के लइक बुता ल सोरियाबोन तव आज गद्य लेखन के निबंध विधा म श्रीमती सुधा वर्मा के किताब ‘परिया धरती के सिंगार’ अउ ‘तरिया के आंसू’ हमर करा हावय। ये दूनो कृति म उंकर एक से सेख निबंध पढ़े बर मिलथे। परिया धरती के सिंगार ह मानूख ल प्रकृति ले जोड़े के प्रयास करथे। ओमन किथे के मय प्रकृति म विरचन करथवं। पर्यावरण मोर मन म बहुत असर करथे। तेज आंधी म हवा के पीरा, पेड़, पौधा के दरद अउ समुद्र के हलचल के भितरी खुसरके ओला अनुभव करथवं। जब-जब ये दुख पीरा के अनुभव होथे मोर कलम चले लग जाथे। दुख-पीरा ही नहीं खुसी के अनुभव घलो होथे। उही अनुभव उही पीरा ह मोर आखर म ढलके निबंध के रूप लेथे। इही क्रम एक नवोदित लेखिका म श्रीमती किरण शर्मा के किताब ‘छत्तीसगढ़ के अंगना म बगरत चिन्हारी’ ह तको प्रकाशित कृति के रूप म हमर तिर हावय। जेमा लेखिका ह अपन अंतस के भाव ल समोखे हावय। 
    निबंध लेखन के विधा म वर्तमान म सुशील भोले के कृति ‘भोले के गोले’ घलोक प्रकाशित होय हाबे। सुशील भोले वइसे तो सबो विधा म लेखन करथे फेर लोगन मन उंकर छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति के गोठ ल बने पसंद करथे। भोले के रचना म छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति के पीरा, साहित्यकार मनके पीरा अउ छत्तीसगढ़ी भासा बर अगाध मया दिखथे। ओमन किथे के वाजिब म छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति एक मौलिक संस्कृति आय, जेला हम सृष्टिकाल के या युग निर्धारण के हिसाब ले काहन त सतयुग के संस्कृति कहि सकथन। इहां कतकोन तिहार अउ परब हे, जे ए देश के अऊ कोनो भाग म न तो जिये जाए अउ न मनाए जाय।

    इही रकम ले चंद्रशेखर चकोर के निबंध तको छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति, कला अउ कलाकार मनके दरद ल उजागर करथे। चंद्रशेखर चकोर ह नानपन ले ही लोक खेल कोति सूर लगाये ओकर संरक्षण अउ संवर्धन बर प्रयासरत रिहिन हावय। ओमन लोकखेल ले उरऊती खातिर कतकोन निबंध के रचना करे हावय जेन देश के कतकोन पत्र-पत्रिका म प्रकाशित होय हावय।  
    छत्तीसगढ़ी साहित्य के गद्य विधा म एक अउ बड़े नाम हावय डुमनलाल ध्रुव। जिखर रचना स्कूल अउ कॉलेज के पाठ्यक्रम म समोखे जाथे। डुमनलाल ध्रुव के संगे-संग बीआर साहू, डॉ. जीवन यदु, विनयशरण सिंह, पाठक परदेशी, मंगत रवींद्र, अउ डॉ. मांगीलाल यादव सरीख जुन्ना छत्तीसगढ़ी लेखक मन लइका मन बर पाठ्यक्रम लिखके नवा पीढ़ी ल तको छत्तीसगढ़ी साहित्य ने जोरे के जबर उदीम करे हावय।
    आज अतेक बच्छर बाद भी अब जबकि हम सब लिखे-पढ़े ल जानथन तभो ले अपने लोक साहित्य म रम नइ पावत हावन। इही पाके जादा से जादा ठोस अउ वाजिब बात के लेखन होना चाहि। साहित्य ल समाज के दरपन किथे तव ये दरपन ल घलोक साफ सुथरा राखे के उदीम वर्तमान समाज ल करे बर परही तभेच हमर लोक साहित्य के भूत, भविष्य अउ वर्तमान संरक्षित रही पाही।
    नोट-: ये लेख ह अनेक बड़का साहित्यकार मनके समिलहा लिखित विचार के संकलन आए जेमा अऊ सुधार के जरूरत हावय। अलग-अलग काल म अऊ कतकोन साहित्यकार मनके नाव येमा जोड़े ल परही जानकारी मुताबिक। - जयंत साहू, डूण्डा रायपुर छत्तीसगढ़  9826753304

    छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास यात्रा

    छत्तीसगढ़ी ह छत्तीसगढ़ के महतारी भाखा आए, जेन ल राजभासा के दर्जा तको मिले हावय। छत्तीसगढ़ के साहित्य ह तइहा समे ले कथा कंथली अउ गाथा के रूप म मौखिक रूप ले लोक जीवन म रचे बसे हावय। जब छत्तीसगढ़ ह मध्यप्रदेश म रिहिस हावय तभो, ये अंचल के लोक साहित्य के अलगेच सोर रिहिस हावय। इहां के लोगन मन ज्यादा पढ़े-लिखे नइ रिहिन हावय तभो ले अपन साहित्य ल कथा-कहानी अऊ गाथा के रूप म एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी तक सहेजे के बुता करय। 

    छत्तीसगढ़ी साहित्य के वाचिक परंपरा म सबले सजोर महाभारत के कथा हावय जेकर गायन विधा ल पंडवानी कहे जाथे। अइसने आल्हा गायन के अलावा तइहा के राजा महाराजा मनके तको छत्तीसगढ़ी म कथा-कहानी अउ गाथा मिलथे जेन ल इहाँ के लोगन मन मुअखरा जानथे। इही रकम ले संस्कार गीत मन तको इहां के लोक साहित्य ल सजोर करथे। जनम, विवाह अउ मरन संस्कार के रीति रिवाज गीत के रूप म संरक्षण पाथे। अइसने छत्तीसगढ़ी परंपरा ह तको गीत के रूप म लोक म संरक्षित हावय। ओ जुग ले ए जुग तक वाचिक ह अब धीरे-धीरे लिखित रूप म लहुटे लगे हावयं। येकर सबले बड़े परमान सवांगे छत्तीसगढ़ राज्य आए जेन ल दुनिया तको जानथे कि अलग छत्तीसगढ़ राज ह सांस्कृतिक अउ साहित्यिक संघर्ष के परिणाम आए। 

    तइहा जुग म जब हम जाथन अउ छत्तीसगढ़ी के सुरूआत के साहित्य के जर ल खोधियातन तव सबले पो_ परमान ह इही किथे कि धनीधरम दास जेन ह कबीर दास के चेला आए। उही बखत माने १५ वीं १६ वीं शताब्दी म छत्तीसगढ़ी म पद्य रचना करय। धनीधरम दास के रचना मन के हरि ठाकुर अउ बाबू रेवाराम मन तको संकलन करिन हाबय। १७ वीं शताब्दी के तको दंतेवाड़ा म छत्तीसगढ़ी के कुछ शिलालेख मिले हावय फेर ये शिलालेख के संबंध म अनेक इतिहासकार मनके मत भिन्नता हावय।

    छत्तीसगढ़ी के लिखित साहित्य के इतिहास म सन् १८८५ ओ युग आए जेकर परमान स्वयं इतिहास देथे। १८वीं शताब्दी म छत्तीसगढ़ म अंग्रेज मनके शासन रिहिस। इहां कतकोन स्कूल चलत रिहिस हावय जेन म छत्तीसगढ़िया बेटा मन तको शिक्षा पाइन फेर ओमा सिरिफ हीरालाल चन्नाहू धमतरी जिला के एक नानकुन गांव के रहइया छत्तीसगढ़ के बेटा हा छत्तीसगढ़ी म लिखे के सुरू करिस। हीरालाल चन्नाहू ह सन १८८५ म छत्तीसगढ़ी व्याकरण के सिरजन करिस। जेकर अंग्रेज लेखक सर जार्ज ग्रियर्सन ह अंग्रेजी म अनुवाद करे हावय, अइसे परमान छत्तीसगढ़ के इतिहासकार डां. रमेन्द्रनाथ मिश्र के किताब ले मिलथे। इतिहासकार आचार्य मिश्र जी लिखथे कि हीरालाल चन्नाहू ल १८९० म कोलकाता के एक साहित्यिक संस्था कोति ले काव्योपाध्याय के उपाधि प्रदान करे गे रिहिसे। इही उपाधि के सेती हीरालाल चन्नाहू ल हीरालाल काव्योपाध्याय के नाम ले देश अउ साहित्य समाज ह जानथे। 

    वरिष्ठ साहित्यकार चंद्रशेखर चकोर ह छत्तीसगढ़ी भासा के सरंक्षण अउ संवर्धन बर हीरालाल काव्योपाध्याय ल माई मूड़ी बताये हावय। चकोर जी के अनुसार हीरालाल काव्याोपाध्याय के लिखे के बाद कोनो-कोनो अउ कलमकार मन छत्तीसगढ़ी म लिखे के जोंगिन। छत्तीसगढ़ी साहित्य ल पो_ करइया जम्मो साहित्यकार मनके विधा अउ नाव के गोठ करे म तो बेरा पहा जही तब अइसन म छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास यात्रा ल चार काल म बाट के गोठबात करथन-

    1. छत्तीसगढ़ी भासा के संरक्षण काल जेन म १८८५ ले १९४७ तक रचनाकार मन सामिल हावय।
    2. छत्तीसगढ़ी भासा के स्वाधीनता काल जेन म १९४८ ले १९७० तक के कलमकार मन सामिल हावय।
    3. छत्तीसगढ़ी भासा के जागरन काल जेन म १९७१ ले २००० तक के कलमकार मन सामिल हावय।
    4. छत्तीसगढ़ी भासा के राज्य गठन काल जेन म २००१ ले अब तक के कलमकार मन सामिल हावय। 

    1. छत्तीसगढ़ी भासा के संरक्षण काल- छत्तीसगढ़ी भासा के संरक्षण काल जेन १८८५ ले १९४७ तक के हावय ये काल म देश ल आजादी नइ मिले रिहिस हावय। छत्तीसगढ़ म ठेठ छत्तीसगढ़ियापन दिखय। ये बखत के कलमकार मन म प्रमुख रूप ले पंडित शुकलाल प्रसाद पांडेय, जगन्नाथ प्रसाद भानु, बिसाहू राम सोनी अउ पंडित सुंदरलाल शर्मा के नाम आथे। इंखर लेखनी ह छत्तीसगढ़ी साहित्य बर नवा अंजोर के काम करिन। साहित्य के संगे छत्तीसगढ़ी संस्कृति ह तको चिनहारी पाइस। 

    2. छत्तीसगढ़ी भासा अउ साहित्य के स्वाधिनता काल- छत्तीसगढ़ी भासा अउ साहित्य के स्वाधिनता काल आथे जेन म १९४८ ले १९७० तक के कलमकार मन हावय। देश ल आजादी मिले के बाद सबो डहर उच्छाह उमंग के माहौल रिहिस लोगन मन अपन-अपन मति अनुसार आजादी के जोइदा मनके गुनगान करिन। ये काल म प्रमुख रूप ले डॉ. खूबचंद बघेल, भगवती लाल सेन, गिरवर दास वैष्णव, कपिलनाथ कश्यप, धरमसिंग दानी, गोविंदराम वि_ल, विद्याभूषण, ईश्वर बघेल, बद्री बिशाल परमानंद, कोदुराम दलित, हेमनाथ यदु, डॉ. दशरथलाल निषाद, टिकेन्द्रनाथ टिकरिहा, प्यारेलाल गुप्त, मेहत्तर राम साहू, नरेन्द्र देव वर्मा, श्माम लाल चर्तुवेदी, लक्ष्मण मस्तुरिया, द्वारिका प्रसाद विप्र, रामेश्वर वैष्णव, डॉ. बलदेव साव, पवन दीवान जइसे अउ कतकोन कलमकार मन अपन महतारी भाखा म साहित्य सिरजन करिन। 

    3. छत्तीसगढ़ी साहित्य के जागरण काल- छत्तीसगढ़ी साहित्य के जागरण काल के जेन म १९७१ ले २००० तक के कलमकार मन सामिल हावय। सन् १९७१ ले छत्तीसगढ़ी संस्कृति अउ साहित्य ल नवा सुरूज मिलिस चंदैनी गोंदा के रूप म। बघेरा दुर्ग के रहइया दाउ रामचंद्र देशमुख ह नाचा पेखन के कलाकार मन ल जोड़ के एक अइसन संस्था बनाइस जोन छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत म क्रांति के सूत्रपात करिन। हम ए बात ल गरब ले कहि सकथन के छत्तीसगढ़ी म नाटक-प्रहसन, गीत, कहानी, कविता के सिरजन होय के सुरूआत लोगन मन चंदैनी गोंदा ल देखे के बाद सुरू करिस। गांव-गांव म लोक कला मंच बने लगिस। छोटे-छोटे गांव के लेखक अउ कलाकार मन ल मंच मिलिस, उखर रचना ल मान सम्मान मिलिस। असल म केहे जाए तव सबले जादा साहित्य के सिरजन छत्तीसगढ़ सन् १९७१ के बाद ही होय हावय। 
    इही बखत छत्तीसगढ़ी सेवक नाव के साप्ताहिक पेपर तको छपे के सुरूआत होइस जेकर संपादक रिहिस जागेश्वर प्रसाद। येकर अलावा एक अउ मासिक पत्रिका छपिस मयारू माटी जेकर संपादक रिहिन सुशील भोले। जागरण काल म अवतरे लेखक मन म प्रमुख रूप ले डॉ. राजेन्द्र सोनी, परदेशी राम वर्मा, रामेश्वर शर्मा, मंगत रविद्र, जीवन यदु राही, किसन दीवान, हरप्रसाद निडर, पंचराम सोनी, चंद्रशेखर चकोर, पुनूराम साहू राज, पीसीलाल यादव अउ दुर्गा प्रसाद पारकार जइसन अउ कतकोन साहित्यकार मन छत्तीसगढ़ी साहित्य ल सजोर करे म अपन योगदान दिस। 

    4. छत्तीसगढ़ साहित्य के राज गठन काल- छत्तीसगढ़ साहित्य के राज गठन काल जेन २००१ ले सुरू होथे। नवा छत्तीसगढ़ राज के उदय होय के बाद छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया के एक लहर चलिस अउ युवा मन छत्तीसगढ़ी म लिखे-पढ़े खातिर उमियाइन। ये काल म घातेच छत्तीसगढ़ी लिखे गिस। लगभग सबो विधा म सिरजन होइस। ये काल म गोविंद धनगर, तुकाराम कंसारी, जयंत साहू,  दिनदयाल साहू, चंपेश्वर गिरी गोस्वामी, संतोष सोनकर, रमेश चौहान जइसे कतकोन कलमकार मन अबही घलोक अपन कलम चलावत हावय। 
    छत्तीसगढ़ी म गीत, कहानी, कविता, भजन, गजल, उपन्यास सबे कुछ लिखे जावत हावय। अउ अब तो प्रकाशन के गजब अकन माध्यम तको आगे हावय। तइहा म लोगन मन वाचिक रूप से साहित्य के संरक्षण करय फेर अब लिपिबद्ध होय ले छत्तीसगढ़ी साहित्य ह जुग-जुग तक अम्मर रइही। गजब अकन पत्र-पत्रिका मनके अलावा इंटरनेट म वेबसाइट मन तको छत्तीसगढ़ी साहित्य ल सहेजे के उदीम करत हावय। 
    छत्तीसगढ़ी सेवक, मयारू माटी, लोकाक्षर, बरछाबारी, गुरतुर गोठ, अंजोर जइसन पत्रिका मन कतकोन कलमकार मनके रचना ल प्रकाशित करके साहित्य ल संजोय राखे के संगे-संग नवा नवा लेखक मन अवसर तको देवत हावय आगू आए के।  
    नोट-: ये लेख ह अनेक बड़का साहित्यकार मनके समिलहा लिखित विचार के संकलन आए जेमा अऊ सुधार के जरूरत हावय। आगू अलग-अलग काल म अऊ कतकोन साहित्यकार मनके नाव येमा जोड़े ल परही जानकारी मुताबिक। - जयंत साहू,  डूण्डा रायपुर छत्तीसगढ़ 9826753304

    छत्तीसगढ़ में कृषि संस्कृति


    छत्तीसगढ़ ह एक कृषि प्रधान अंचल आए, इहां के एक तिहाई लोगन मन सिरिफ खेती म निर्भर हावय। खेती ह तइहा ले अब तक छत्तीसगढ़ के आर्थिक विकास के प्रमुख साधन रेहे हावय। कृषि संस्कृति के विकास इहां तभे ले होय हाबे जब लोगन खाये के जिनिस ल गड्डा म गड़िया के बोवय। अउ फेर धीरे-धीरे ओमन देखिन के बीजा ले पौधा बनथे तव उंकर मति ह उही कोति लामिस, अपन निस्तार खातिर खाद्यान्न उपजाए के उदीम उंखर भीतर पनपे लागिस। आदिम संस्कृति ले अब समय के संग धीरे-धीरे खेती ह व्यवसाय के रूप लेवत आज प्रदेश के आर्थिक विकास म मजबूती देवत खड़े हावय। अब तो ये बात ल छत्तीसगढ़ ले सात समुंदर पार के मानखे मन तको मानथे के वाकई 'छत्तीसगढ़ धान के कटोरा' आए। इहां सबले ज्यादा धान के पैदावार होय के साथ सबले ज्यादा धान के किस्म तको इंहचे देखे बर मिलथे।

    कृषि भूमि अउ फसल- छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग म प्रमुख रूप ले धान, गहू, चना, मटर, सरसो, अरहर, सोयाबीन अउ तिवरा जइसन फसल के खेती होथे अउ पहाड़ी, उत्तरी पठार अंचल म लोगन मन प्राकृतिक रूप ले उपजे पेड़ पौधा उपर निरभर रिथे। जइसन इहां के मैदानी भाग म खेती के लायक समतल जमीन हावय वइसन पठार अउ पहाड़ी अंचल म कम हावय, जेकर कना समतल जमीन नइये ओमन फल अउ औषधी कंदमूल के खेती करके अपन जीवका चलाथे। कुछ अंचल म प्रशासन के प्रोत्साहन ले गांव के युवा मन उन्नत खेती ल अपनावत हावय अउ कम रकबा म बागवानी खेती करत हावय।धीरे-धीरे उहू कोति कृषि के विस्तार होवत हाबे अउ लोगन मन व्यवसायिक रूप ले, खेती ल अपन जीवकोपार्जन के जरिया बनावत, जांगर टोर मेहनत करत हाबे। 
    सिचाई प्रबंधन- छत्तीसगढ़ अंचल में आज भी सर्वाधिक किसान मन भगवान भरोसा खेती करथे, माने उंकर कना पानी के साधन नइये, बरसात होथे तव उंकर खेत म अन्न उपजथे। इही पाके साल म एकेच फसल लेथे, बने पाग रेहे म कभू-कभू ओनहारी आगे तव दूसर फसल के जोंगथे। ये काहन के छत्तीसगढ़ म पारंपरिक रूप ले जेन किसान मन खेती करत हाबे ओमन खरीफ के मौसम म धान के खेती करथे अउ उहीच नमी म गहूं या फेर दलहन, तिलहन के खेती करथे जेन अढ़ाई ले दू महीना के होथे। पारंपरिक ल छोड़के वर्तमान म देखे जाए तव कुछ अंचल म बांध बनाके नहर के मांध्यम ले खेत म पानी पहुंचाये जात हावय त कुछ किसान जेन मन आर्थिक रूप ले संपन्न हावय ओमन खेत म कुंआ, तरिया, बोर तको खाने रिथे खेत पानी पलोय बर फेर यहू तो बरसा उपर ही निर्भर रहिथे। बरसात खतम होये के बाद किसान मन बाकी समय ल खेत के तियारी म लगाथे। छै महीना के खेती बर छै महीना के तियारी ह किसान मनके पैदावार म उरवती के रूप दिखथे।

    खेती के नवा दिन- छत्तीसगढ़ परब तिहार वाले प्रदेश आए इही सेती, इहां के सबोच बिसेस काम के पीछू कोनो न कोनो पारंपरिक, धार्मिक अउ अध्यात्मिक विधान के प्रचलन देखे बर मिलथे। जइसे इहां के किसान मनके नवा दिन सुरू होथे अक्ती ले। अक्ती के दिन जोन पुतरी-पुतरा के बिहाव होथे तेन तो अलगे हावय, येकर अलावा गांव म जेन नाउ, धोबी, पाहटिया, बइगा अउ सौंजिया लगे रिथे तेन मन अपन मालिक ठाकुर घर ले मेहनताना पाथे। अक्ती के दिन ही कतकोन मन मालिक घर के काम ल छोड़थे तव कतको मन आन सौंजिया तको लगाथे। इहां मेहनत के सम्मान होते तेन पाके नौकर जइसन शब्द के उपयोग नइ होवय मालिक ठाकुर मन सौंजिया या फेर कमइया कहिके संबोधित करथे अउ जब उकर चुकारा के दिन आथे तव तय मुताबिक अनाज दिये जाथे। छत्तीसगढ़ म सौंजिया मनला रूपिया म नहीं बल्कि धान म लगाये जाथे। अइसने नाउ, धोबी, राउत, बइगा उक मनके तको सालाना तय रिथे, धान ह, जोन पइली काठा, ओ मुताबिक गांव के सबो घर ले देना रिथे। अक्ती के दिन ही गांव के किसान ठाकुर देवता म धान के बीजा ल डूमर पाना के दोना म चड़ाथे। जेला गांव के बइगा ह नेंगहा खेत म बो के जोतई करथे, बांचे धान ल किसान मन ल फेर दोना दोना बांट देथे। इही बीज ल किसान मन प्रमाणित बिजहा मानथे अउ जमो के राखे रिथे।
    खेती के तइयारी- किसान मन कभू ठलहा नइ राहय। असाढ़ अउ अवइया बरसा के अगोरा करत किसान मन जेठ अउ बइसाख के महीना म खेत के जेन भी काम बांचे रिथे तेन ल उरकाथे जइसे के कोनो खेत ल चतवार के बरोबर करना हे, मेड़ सिरजाना हावय। बिड़ा बांधे खातिर पैरा डोरी बरई, खचका डबरा पाटना, कांटा बिनना, खातू पालना, नांगर खापना आदि।
    घुरूवा खातु के महत्ता- छत्तीसगढ़ म पारंपरिक रूप ले जोन खेती करथे किसान मन ओ बहुतेच लाभकारी हावय, जइसे पारंपरिक खाद के उपयोग ह फसल के पैदावार तो बड़ाबे करथे येकर अलावा खेत के उर्वरा क्षमता ल तको बड़ाथे। येकर से जोन अन्न उपजथे वोहा गजब पौष्टिक होथे अउ डाक्टर मन तको तो रासायनिक के बजाय जैविक खाद ले उपजे सब्जी खाए के सलाह देथे। पारंपारिक खाद बनथे कइसे अउ काबर गांव म किसान मन घरोघर तइयार करथे येला देखबे तो अतका साहज हावय के बिगर कोनो विशेष लागत के घर म ये तइयार होथे। किसान मन के घर माल मवेशी होबे करथे, धान के पैरा होथे, चुल्हा के राख निकलथे। इही सब ल फेके खातिर एक ठिन गड्डा खाने रिथे जेन ल घुरूवा किथे। घुरूवा म कोठा के कचरा, जेन म पैरा के अलावा मवेशी मनके मल-मूत्र तको रिथे। घर म चुल्हा के राख निकलथे तेनो ल घर के नारी परानी या सौंजिया मन ह गांव गली म नइ फेके, ओला सकेल के घुरूवा म डारथे। घुरूवा भरे के बाद ओमा पानी डारके माटी म तोप देथे, जेठ-बइसाख के आवत तक बर। जइसे ही खातू पाले के दिन आथे किसान मन गाड़ा बइला म जोर के खेत म बगरा आथे। गांव म स्वच्छता के ये घुरूवा ह जबर उदाहरण आए कि वो समे म तको हमर छत्तीसगढ़ म गांव के किसान मन कचरा फेके बर एक गड्डा के उपयोग करत रिहिन हाबे, आजो करथे। आधुनिकता के दौर म कचरा के निस्पादन अउ ओकर सार्थक उपयोग घुरूवा खाद के रूप म करना ये छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति के देन आए।

    खेती म अधिया, रेगहा अउ सापर- छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति म आपसी भाई चारा तको गजब देखे बर मिलथे। जइसे कोनो किसान ह सवांगे अपन खेती ल नइ कमा सकत हावय तव ओहा आन किसान ल अधिया या फेर रेगहा म दे देथे। अधिया माने ओ खेत म जतेक भी पैदावार होही, दूनो के आधी-आधी अउ रेगहा माने किसान ह आगू ले आठ बोरा दस बोरा अइसे चक अनुसार करार करे रही ओतका देना परही। अउ जेन किसान मन आपस म जुरमिल के काम ल उरकाथे माने दू-तीन किसान मिलगे सझा रूप ले खेती करथे ओला सापर कथे। सापर म एक दूसर के काम उरकाना रथे बिगर कोनो मेहनताना के।
    बनिहार- गांव म तो सिरिफ किसानी बुता होथे तव जेखर घर खेती नइये तेन का करत होही यहू बात मन म आथे। तव खेती ह अइसन बुता आये के एकेच झिन के बुती नइ सिरजय, बनिहार भुतिहार के जरूरत परबे करथे। जेकर घर खेती नइये तेन मन आन घर बनि कमाय बर जाथे। गांव म वइसे भी जात समाज के अनुसार काम सबो बर सपुरन रिथे। जेन मन अपन पुरखौती पारंपरिक बुता ल नइ करे ओमन खेती किसानी कमाथे। 
    दिगर समाज के सहयोग- किसानी के अलावा गांव म पारंपरिक पुरखौती बुता करइया मन जइसे के लोहार ह किसान बर नांगर के लोहा, गाड़ा के पट्टा, रापा, कुदारी, हसिंया बनाथे तव बढ़ई ह नांगर, जूड़़ा, चक्का के संगे-संग गाड़ा बनाये के काम ल करथे। कुम्हरा मन माटी के जिनिस बनाथे जइसे बर्तन भड़वा जेमा साग, भात रांधे के अलावा दूध, दही, मही धरे के मैइरसा अउ पानी बर करसा उक बनाके किसान घर अमराथे। अइसने गांव म लगे नाउ मन तको किसान मनके सावर बनाये खातिर खेत म बियारी के बेरा जाथे। नांगर जोतत बखत किसान के गोड़ म कांटा ठेसा के टूट जथे तेने ह हेरवाय बर नाउ मन कना जाथे।

    पारंपरिक खेती म वैज्ञानिकता- छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति म गजब वैज्ञानिक आधार घलोक देखे बर मिलथे जेकर कृषि वैज्ञानिक मन सवांगे बढ़ई करत नइ थकय। बरसात के पहिली माने जब पहिली खरीफ के नमी रइथे तभेच एक पइत जोतई करके छोड़ देथे। माने अकरस जोतर्इ् करथे इही ल वैज्ञानिक मन प्री मानसून के प्राथमिक जोताई किथे। अइसन करे ले खेत के जोन कीरा-मकोरा अउ दूबी बन रिथे तेन म उफला के उपर आ जथे अउ बइसाख के घाम म भूंजा के मर जथे। छत्तीसगढ़ म किसान मन नांगर ले खेत के जोताई करथे तेन पाके माटी ह बने भरभरा जाए रिथे। कन्हार ले जदा मटासी ल जोताई के जरूरत परथे। कन्हार माटी ह कम पानी म जोतत बन जथे तेन पाके खुर्रा जोतई बने होथे काबर के जदा पानी म भुइंया लटलटा जथे।
    कोंटा कोड़ना- खेती के दिन म लइका मन के मुंह ले अक्सर सुने बर मिलथे कि कोंटा कोड़े बर जानथन। खेत के जोताई नांगर म होय रिथे, नांगर ह गोलाकार रेंगथे तेन पाके खेत के कोंटा ह छु जाये रिथे। इहीं छूटे कोंटा म धान छितके कुदारी म कोड़ के बोए जाथे। 
    मुंही- खेत के मेड़ म कोनो अइसन जगह जिहा ले आन खेत म पानी उतर सके ओ ठउर ल निकासी खातिर छोड़े रिथे। मेड़ के फुटे इही पानी आए जाए के ठउर ल मुंही कथे। मुंही ल बोवई के बखत बांध के राखथे अउ जब पानी जादा हो जथे तव फोर के बाहिर निकाले जाथे।

    निंदई अउ बियासी- बोवई के बाद निंदई कोड़ई के दिन आथे। काबर के हमर इहां बोता पद्धति ले जादा खेती होथे माने बरसात म पानी के गिरे ले खेत ल एक पइत जोत के धान ल छिड़क के फेर नांगर म बो देथे। इही म रोपा पद्धति तको होथे जेन म एक ठी खेत म धान के नर्सरी तइयार करके 20 दिन बाद ओला खेत म लगाये जाथे। रोपा लगाये के पहिली खेत म कोपर तको चलाये जाथे जेकर ले खेत म पहिली ले उपजे दूबी बन मन माटी म दब जथे अउ खेत ह तको बरोबर दिखथे। रोपा म अब कतार बोनी तको सुरू होगे हावय अउ येमा बियासी करे के तको जरूरत नइ परय काबर के ओला नर्सरी ले उखान के खेत म लगाये रिथे। जेन किसान बोता पद्धति ले धान बोथे ओमन ल बियासी करे के जरूरत परथे। बियासी मने धान बोवाय खेत म नांगर चलाना। बियासी म छोटे नास के नागर के उपयोग करे जाथे जेकर ले धान के जर मन टूटे नहीं, बियासी बर पानी घातेच जरूरी रिथे।
    खुमरी अउ मोरा- पानी बादर ले बांचे बर खेत कइमया मन कमरा खुमरी अउ मोरा के उपयोग करथे। खुमरी ह बांस के बने होथे जेकर उपर म प्लास्टिक झिल्ली छवाय रिथे। किसान मन के मुड़ बुलकउ डोरी फंसे रिथे जेकर से आसानी ले किसान के मुड़ म माड़े रिथे अउ काम तको चलत रिथे। अइसने खेत निंदइया बनिहारिन मन मोरा ओड़हे रिथे। खेती के दिन म उपर चक म नांगर के पड़की थामहे नंगरिहा अउ खाल्हे चक ले बनिहारिन के ददरिया के सवाल जवाब के ओड़र ह कड़कत बिजली म जीवरा नइ डराय, ये संस्कृति आए छत्तीसगढ़ के।
    कृषि औजार के पूजा- इहां के कृषि संस्कृति म कृषि औजार के रखरखाव अउ जतन ह एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप म होथे जेन ल हरेली के रूप म जानथ। हरेली ह किसान मन बर सबले प्रमुख अउ बड़का तिहार आए। ये दिन कृषि औजार जइसे नागर, जूड़ा, रापा, कुदारी आदि मनके साफ सफाई करे जाथे, उंकर पूजा होथे। पिसान के हांथा देके बंदन के तिलक लगाथे, चीला चघाथे। जेन नांगर मन के काम उरक जाथे तेन ल परवा म जतन के राख देथे। इही दिन कृषि काम के अलाव आन मावेशी मन ल तको रोग राई ले बचाये खातिर गंवखरा दवई खवाये जाथे। अइसने पोरा म नंदिया बइला के पूजा ह मेहनत कस किसान ल धर्म ले जोरे राखे के संगे संग अपन खेती के संगवारी, माने बइला भइसा के जतन करे के तको सीख देथे।
    रखवार- गांव म खेती ल देखबे तव सबेच के खेत ह खुल्ला रिथे फेर काकरो खेत म मावेशी मन खुरखुंद नइ मतावे येकर कारण ये रिथे के गांव म गाय चरवाहा लगे रिथे जेन ह गांव भर के गाय गरवा ल सकेल के कृषि भूमि ले दुरिहा चरावत रिथे। कतकोन गांव के किसान मन रखवार लगाये रिथे जेन ह खार म किंजरत रिथे अउ काकरो गाय ह खेत म चरत मिल जथे तव घर गोसइया ल हियाव करथे के अपन गरवा ल बांध के राखय। घेरी-बेरी के पकड़ाये ले काठा पइली डांढ तको बांधे रिथे। इही पाके खेती के दिन म गरवा मन ल ढिल्ला नइ छोड़य।
    भंदई अउ अकतरिया- खेत बुता करइया मन खार म हरर्स भरर्स रेंगत रइथे बेरा कुबेरा। इही पाके ओमन बर गांव के मेहर ह पनही बनाथे जेन ह अतेक मजबूत रिथे के कांटा खूंटी कांच अउ लोहा ले तको फरक नइ परय। ये पनही मन ह चमड़ा ले बने रिथे, पुरूष मनके ल भंदई अउ माई लोगिन मनके ल अकतरिया किथे। 
    नाहना- गांव के मेहर मन किसान मन बर खास मजबूती वाला पनही के संगे संग नांगर बर नाहना तको बनाथे। चमड़ा के बने नाहना ह नांगर के डाड़ी अउ जूड़ा ल जोड़े के काम करथे। अइसने मजबूत चमड़ा के बइला गाड़ी के नाहना तको बने रिथे, गाड़ा म कतको भरती भर ले बइला ह तिरत ले हकर रही फेर मेहर के बनाये नाहना नइ टूटे, ये कृषि संस्कृति म इमानदारी के प्रत्यक्ष नमूना आए।

    बियारा बुता- धान के फसल ह तीन महीना बाद पाके ल धर लेथे। तव किसान मन ओकर लुवई करे के पहिली राखे के ठउर तियार करथे, माने बियारा ल सिद्ध पारथे। चतवार के कांटा छरपथे, भाड़ी रुंधथे, राचड़ ल बने करथे। गोबर ले बियारा ल लिपे रिथे काबर के उहचे, खेत ले धान आना हावय। बाली ह टूट के गिरे ले उठावत बन जावय अतेक पान सफई होना चाही। येती जब धान ह पक के तइयार होथे तव लोहार कना ले हंसिया पंजवा के लानथे अउ देवधामी ल सुमर के खेत म हंसिया गिराथे।
    लुवई अउ बोझा डोहरइ- लुवई के बाद जब धान के करपा कर्रा जथे तव ओला पैरा के डोरी म बिड़ा बांध के गाड़ा म भर के बियारा तक लाये जाथे। येमा समय के थोरको चूक होय ले नकसानी होथे तेन पाके किसान मन बेरा म सबो काम ल सिद्ध पारथे। जइसे लुवई अउ करपा उठई म देरी करे ले बाली ह खेते म गिरे के डर रिथे। कचलोइहा लुवे ले धान ह मोटबदरा हो जथे। किसान के परिवार म सबो काम म लगे रिथे सियनहा मन करपा ल बिड़ा बांधके राखथे, लइका मन सिला बिनथे, सियनहिन मन मुड़ म बोह के गांड़ा म अमराथे, खेत दूरिहा रेहे म दोहरा भारा तको डोहारथे। कावर अउ सूल म दूनों कोति बिड़ा फांस के तको डोहारे जाथे। 
    बड़होना पुदकना- आखरी खेत म लुवई के दिन एक कोन्टा म लइका मन बर बड़होना छोड़े जाथे जेन ल लइका मन पुदकथे अउ ओकर मुर्रा बिसाथे। बड़होथे तेन दिन सबोच ल खुशी होथे, लइका मन ल धान मिलथे जेकर ओमन मुर्रा बिसाके खाथे अउ सियान मन ये पाके मगन रिथे के खेत म बगरे लछमी ह अब सकलागे।
    सिला बिनना- लुवाये धान के करपा ल जब बिड़ा बांधथे तव बाली ह टूट के गिर जथे, उठाके गाड़ी तक डोहारे म तको गिरत जाथे। बियारा ह दूरिहा म रेहे ले धान के बाली गिरत गिरत आथे। इही गिरे धान के बाली मन ल सिला कथे जेना घर के लइका उक मन बिनथे।

    मिंजई- बखत म बरसा होय ले फसल बने उतरथे फेर एमा देखरेख अउ सूझबूझ तको घातेच जरूरी होथे। बियारा म राखे खरही ल अइसे तरीका ले रखे जाथे के ओमा कतको पानी परै धान खराब नइ होवय। वइसे धान के खरही ल किसान मन जादा दिन बर नइ बनावे, सबो चक के धान ल सकेले के बाद बेलन म मिंचई सुरू कर देते थे। बेलन के मिंजई ह बने तको होथे काबर के पैरा ह बने मर्रा जथे जेला माल मवेशी मन चाव से खाथे। बेलन म मिंजई करत बखत कलारी ले पैर ल कोड़ा दे बर परथे, माने तरि के ल उपर करना होथे। मिजंई ह रात रात ले चलथे, बेलन चड़े-चड़े आनी बानी के ददरिया तको सुने बर मिलथे। अधरतिहा ले बेलन चले के बाद जब धान के बाली पूरा झर जथे तब बड़े फजर ले अलहोर के पैरा ल अलग करके सकेलथे। आधा पेरउसी तो दतारी म अलहोरे ले अलगा जथे ताहन बियारा म अंगाकर रोटी ल अमटाहा मुरई संग खाके धान ओसाई के काम रिथे। जड़काला के दिन तको आ जाए रिथे तेन पाके बुता बने उसरथे। धान ले कटकरा बदरा ल ओसा के सफा धान ल कोठी म भरके राख दिये जाथे।
    बेलन- बेलन जइसे कि शब्द ले ही ओकर स्वरूप के पता चलत हावय बेलनाकार। धान मिंजे खाजिर किसान मन रोटहा पेड़ के तना न काट के गोल छोले रिथे। दूनो छोर म लोहा के पट्टा लगाके उपर म बइठक बनाये रिथे। ये बइठक के उपयोग बियासी के बखत कोपर के रूप म तको होथे। बेलन ल गाड़ा अउ नांगर सहिक बइला मन तिरथे। धान मिंजई म गाड़ा, छाकड़ा के तको उपयोग होथे।
    धान के नाप- गांव म अइसन किसान जेकर घर के धान चाउर ह बच्छर भर नइ पूरे ओमन आन घर बाड़ही मांगे रिथे, माने उधारी म धान ले रिथे के मोर धान होही तहान लहूटा देहू। ओमन धन ल नाप के लहुटाथे। इहा धान के नाप काठा म होथे। हमर छत्तीसगढ़ म तउल के हिसाब किताब करे के परंपरा इतिहास म नइ दिखे इहां के सियान मन तइहा ले काठा नाप करत आवथे। अब के मुताबिक कइबे तव लगभग तीन किलो के एक काठा होथे। अइसने 20 काठा ल एक खाड़ी, 25 खाड़ी ल एक गाड़ा केहे जाथे। अइसने गिनती के हिसाब ल कोरी म रखथे जेमा 20 ठिन के एक कोरी होथे।
    अइसन हवय हमर छत्तीसगढ़ के कृषि संस्कृति जेन ल विज्ञान संग संघेरबे तव ओमा वैज्ञानिक तथ्य दिखथे। धर्म संग जोड़ के देखे म मानवता अउ भाईचारा दिखथे। प्रकृति संग जोड़बे तव पशु बर प्रेम के व्यवहार नता मितानी, रूख-राई, नदिया-नरवा अउ जल, जंगल, जमीन के सरंक्षण बर न जाने कतको पीढ़ी माटी म मिले होही।
    0 जयंत साहू,
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